आंध्र प्रदेश: ग्यारहवां पड़ाव – श्री कुर्मम मंदिर (Srikakulam)

आंध्र प्रदेश: ग्यारहवां पड़ाव – श्री कुर्मम मंदिर (Srikakulam)

IndoUS Tribune की “यात्रा और दर्शन” श्रृंखला में आपका पुनः स्वागत है! हमारे पिछले पड़ावों में तिरुमला वेंकटेश्वर और श्रीकालहस्ती मंदिरों के दिव्य दर्शन कर आप आध्यात्मिक अनुभव से भर चुके हैं। अब हम आगे बढ़ रहे हैं आंध्र प्रदेश के श्रीकुर्मम मंदिर की ओर, जो भगवान विष्णु के कूर्मावतार को समर्पित एक प्राचीन और अद्वितीय मंदिर है। यह मंदिर अपने स्थापत्य, धार्मिक महत्व और अनोखी परंपराओं के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध है।

पौराणिक कथा और इतिहास

श्रीकुर्मम मंदिर का इतिहास बहुत प्राचीन है। पुराणों के अनुसार, यह वही स्थान है जहां देवताओं और राक्षसों ने क्षीरसागर मंथन के समय अमृत प्राप्त करने के लिए भगवान विष्णु की सहायता पाई। इस घटना में विष्णु का कूर्मावतार प्रकट हुआ, जो समय पर प्रयासरत भक्तों की सहायता का संदेश देता है।

कहानी के अनुसार, सत्य युग में स्वेता महाराज नामक एक धर्मात्मा राजा ने वर्षों तक कठोर तपस्या की। उनकी श्रद्धा पूर्ण हुई और भगवान विष्णु ने यहाँ स्वयंभू रूप में कूर्मावतार धारण किया। ब्रह्मा जी ने स्वयं पूजा-अर्चना कर मंदिर की स्थापना की और गोपाल यंत्र से इसे पवित्र किया। चूंकि कूर्मनाधा शनि ग्रह के नियंत्रण देवता माने जाते हैं, इसलिए भक्त यहाँ दर्शन करके अपने सनी दोष से मुक्ति पाते हैं।

माना जाता है कि मंदिर श्रीराम के स्वर्ण युग से पहले का है। हज़ारों वर्षों से यह श्रद्धालुओं की यात्रा सूची में शामिल है।

मंदिर की विशेषताएँ

  1. सदियों पुराना मंदिर – वर्तमान संरचना 700 से अधिक वर्षों पुरानी है, जबकि बाहरी ढांचे कई बार पुनर्निर्मित किए गए।
  2. पुराणों में संदर्भ – कुर्म, विष्णु, पद्म, ब्रह्मांड पुराणों में उल्लेख।
  3. एकमात्र स्वयंभू कूर्मावतार मंदिर – विश्व में विष्णु के दूसरे अवतार के रूप में पूजा जाता है।
  4. दो ध्वजस्तंभ – मुख्य देवता पश्चिम की ओर मुख किए होने के कारण, मंदिर में पूर्व और पश्चिम दिशा में दो ध्वजस्तंभ हैं।
  5. दैनिक अभिषेक – अन्य विष्णु मंदिरों में ऐसा नहीं होता, यहाँ नियमित रूप से किया जाता है।
  6. दीर्घकालीन भित्ति चित्र – अजंता-एलोरा की गुफाओं जैसी पेंटिंग्स।
  7. दुर्गा माता की विशेष प्रतिमा – वैश्णो देवी के रूप में।
  8. गांधर्व शिल्प कला – 108 अनोखी पत्थर की स्तंभें।
  9. मोक्ष स्थान – मृतकों के अंतिम संस्कार के लिए प्रसिद्ध, जैसे वाराणसी और पुरी।
  10. इतिहास में प्रमुख व्यक्तियों के दर्शन – जैसे लव-कुश, बालराम, संत दुर्वास आदि।

विशिष्ट स्थल और पूजन परंपरा

मंदिर में स्वेत पुष्करिणी नामक पवित्र सरोवर है, जिसमें से श्री महालक्ष्मी (कूर्मनायकी) प्रकट हुईं। यहाँ मृतकों के अंतिम संस्कार और उनकी अस्थियों का विसर्जन होता है, जिससे ये सालग्राम में परिवर्तित हो जाती हैं।

मंदिर का संरक्षण और संरक्षण प्रयास भी अद्वितीय है। यहाँ वयस्क और युवा स्टार कछुओं के लिए पार्क स्थापित किया गया है। भक्त उन्हें अर्पण और आहार देकर सम्मानित करते हैं।

मंदिर में चार दैनिक अनुष्ठान और चार वार्षिक उत्सव आयोजित होते हैं। तीन दिवसीय डोलोत्सवम प्रमुख है। अन्य उत्सवों में कामदहनम, कल्याणोत्सवम और कुर्म जयंती शामिल हैं।

स्थापत्य और वास्तुकला

श्रीकुर्मम मंदिर की वास्तुकला अद्वितीय है – 108 एकसिला स्तंभ, गुप्त मार्ग, स्वेत पुष्करिणी, और गोपुरम संरचना अन्य विष्णु मंदिरों से भिन्न हैं। मुख्य देवता पश्चिम की ओर मुख किए हैं, इसलिए भक्त गरभगृह में सीधे प्रवेश कर देवता के निकट दर्शन कर सकते हैं।

मंदिर में कुर्मावतार के रूप में विष्णु और कूर्मनायकी लक्ष्मी की मूर्तियाँ हैं। उनके साथ उत्सव देवता राम, सीता, लक्ष्मण और गोविंदराज स्वामी हैं।

यात्रा का सार

श्रीकुर्मम मंदिर के दर्शन हमारे आंध्र प्रदेश यात्रा का आध्यात्मिक महत्त्वपूर्ण पड़ाव हैं। यहाँ की कथाएँ, स्थापत्य और पूजा परंपरा हमें भारतीय संस्कृति, पुरातन विश्वास और मंदिर स्थापत्य कला से जोड़ती हैं।

IndoUS Tribune आशा करता है कि इस यात्रा के माध्यम से आप भी इस दिव्य अनुभव का हिस्सा बनेंगे और भारतीय आध्यात्मिक विरासत का गहन अनुभव करेंगे।

अगला पड़ाव: लेपाक्षी मंदिर (अनंतपुर) – जहाँ वीर रामभक्त हनुमान की अद्भुत प्रतिमा और मंदिर की भव्य वास्तुकला आपका स्वागत करेगी।

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