गीता स्वाध्याय- मेरी समझ से, अठारहवाँ अध्याय- मोक्ष संन्यास योग (भाग 2)

गीता स्वाध्याय- मेरी समझ से, अठारहवाँ अध्याय- मोक्ष संन्यास योग (भाग 2)

By: Rajendra Kapil 

अठारहवें अध्याय का दूसरा भाग समाज में विद्यमान जाति धर्म ज्ञान से आरंभ होता है.  भारत के आम समाज में यह धारणा है कि, जातिवाद वंशगत है. अर्थात् जो जिस वंश में पैदा हुआ है, उसकी जाति भी वही होगी. ब्राह्मण का बेटा स्वतः ही ब्राह्मण होगा और शूद्र के बेटे पास, उच्च काम करने का कोई अधिकार नहीं होगा. भगवान कृष्ण इस धारणा का खंडन करते हुए कहते हैं कि, जाति धर्म जन्म से नहीं बल्कि स्वभाव से उत्पन्न होता है. भगवद् गीता में, सामाजिक प्राणियों में विद्यमान तीन गुणों (सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक) की खुल कर चर्चा की गई है. यही तीनों गुण, लोगो के स्वभाव को भी प्रभावित करते हैं. इन्ही के आधार पर प्राणिओं का स्वभाव या प्रवृति बनती है. आगे के कुछ श्लोकों में प्रभु, उन जातियों के लक्षण स्पष्ट करते हैं, जिनके आधार पर उनका, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य होने का पता चलता है. 

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥

भावार्थ:  हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं॥41॥

अब भगवान कृष्ण एक एक करके, यह बताने का प्रयास करते हैं कि, ब्राह्मण का स्वभाव कैसा होना चाहिए? क्षत्रिय में कौन कौन से गुण होने चाहिए? वैश्य को किस प्रकार का व्यवहार करना चाहिए? और शूद्रों को केवल सेवा के लिए क्यों चुना गया है? 

ब्राह्मण का सहज स्वभाव ज्ञान अर्जन करना होता है. व्यवहार की सरलता, अहंकार रहित, ब्राह्मण सदा क्षमाशील होता है. जिस ज्ञान को वह युवावस्था में अर्जित करता है, उसे ही वह बाद में, एक आचार्य के रूप में, दूसरों को बाँटने का कार्य करता है. वेद शास्त्रों का पठन पाठन, शास्त्र सम्मत, दिन चर्या, अंतःकरण की शुद्धि, अपनी इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण, एक ब्राह्मण के लक्षण होते हैं. दूसरों पर सदा दयाभाव रखना, प्रभु प्राप्ति में लिए निरन्तर, ध्यान सिमरण करते रहना, सीधा एवं सरल जीवन जीना एक ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म कहे गये हैं. 

क्षत्रिय का सबसे बड़ा गुण शौर्य या शूरवीरता कही गई है. उसमें बल का तेज, धैर्य और सहज चतुरता होती है. रण कौशल उसका सबसे बड़ा शृंगार होता है. समाज में हो रहे किसी भी प्रकार के अन्याय को न सहना, उसके विरुद्ध खड़े होकर युद्ध करना, ग़रीबों और असहाय लोगों की रक्षा करना, क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म कहे गए हैं.

 वैश्यों के बारे में, प्रभु का कहना है कि, उन्हें खेतीबाड़ी और गौ पालन करना चाहिए. लेन देन के व्यापार में सक्षम होना चाहिए. व्यापार में आजकल ग्राहक को लूटने की प्रथा आम हो गई है. लेकिन भगवान कृष्ण कहते हैं कि, असली वैश्य को व्यापार में, शुद्ध एवं ईमानदार होना चाहिए. उसकी दुकान पर चाहे बालक जाए या कोई वयस्क, दोनों को एक तरह का कपट रहित व्यवहार मिलना चाहिए. व्यापारिक शुद्धता से मानसिक शुद्धता बढ़ती है. इसी से आत्मा का पवित्र होती है और ऐसे वैश्य योगी का प्रभु के धाम की ओर जाने का मार्ग सुलभ हो जाता है. 

शूद्र जन वह लोग कहे जाते हैं, जिनकी ज्ञान ध्यान में रुचि नहीं होती. शूद्र स्वभाव से डरपोक होते हैं. उनका अस्त्र शस्त्र चलाने या सीखने में मन नहीं लगता. ऐसे लोग व्यापार की जटिलता को ठीक से समझ नहीं पाते. ऐसे स्वभाव वाले, समाज के हिस्से पर, प्रभु ने सेवा का दायित्व सौपा है. ऐसे समाज के अंग को बाक़ी समाज की सेवा कर, नम्र बने रहना चाहिए. उन्हें इस सेवा से उपलब्धि की संतुष्टि मिलेगी. और यही संतुष्टि उन्हें आंतरिक रूप से शुद्ध बना देगी. कर्म की शुद्धता एवं सेवा की नम्रता उन्हें, प्रभु के परम धाम की ओर ले जाएगी.

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌

अपने अपने स्वाभाविक कर्मों में सजगता से लगे हुए कर्मयोगी भगवद् प्राप्ति को सहज रूप से पा लेते हैं. यही कर्मयोगियों की आधार शिला है, उसकी मूल भावना है. कोई भी कर्म दोष मुक्त नहीं है. लेकिन देखना यह होता है कि, करने वाले की भावना (his/her intention) कैसी है? शुद्ध भाव से किया गया हर काम, हमेशा शुद्ध फल ही देगा. कर्म एक, शारीरिक प्रकिया है, जबकि भावनात्मक शुद्धि एक मानसिक प्रक्रिया है. और प्रभु कृष्ण बड़े दावे के साथ कहते कि, शुद्ध भावना से किया हुआ हर कर्म मुझे अत्यंत प्रिय है, और उसे करने वाले योगी को, मैं अपने परम धाम ले जाता हूँ. मानस में तुलसी बाबा ने भी रामजी के मुख यही कहलवाया है:

निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र भावा

निश्चित रूप से यही एक उचित मार्ग है. इसके साथ अगर हर काम को करके, प्रभु को सौप दिया जाए, तो बात सोने पर सुहागे जैसी हो जाती है. यह एक योगी की आध्यात्मिक यात्रा को सुगम बना देती है. 

यहाँ भगवान कृष्ण अर्जुन को एक चेतावनी भी देते हैं कि, हे अर्जुन, अगर अभी भी मोहवश तू युद्ध नहीं करेगा, तो तू नष्ट हो जाएगा. मोह का परित्याग कर, और अपने स्वाभाविक क्षत्रिय धर्म को पहचान, और युद्ध के लिए तत्पर हो जा. यही तुम्हारे हित में है.  उसमें छिपे किसी भी पाप या दोष की चिंता छोड़ दे. अपने सभी कर्मों को करके, मुझे समर्पित कर दे. आगे मैं सम्भाल लूँगा. तू यह मान कर चल कि, यह शरीर एक यन्त्र की तरह है, और इसमें विराजमान ईश्वर तत्व, उस यन्त्र की ऊर्जा शक्ति है, जो उसे चलायमान रखती है. 

यह जो ज्ञान मैं तुझे दे रहा हूँ, यह बहुत ही गोपनीय एवं दुर्लभ है. मैं यह ज्ञान तुम्हें इसलिए दे रहा हूँ, क्योंकि तू मुझे बहुत प्रिय है.  यह परम हितकारी ज्ञान मैं तेरे कल्याण के लिए दे रहा हूँ. तू मेरे इन वचनों पर ध्यान दे. इन पर गम्भीरता से विचार कर. अगर तू मेरे इन वचनों पर चलेगा, तो तेरा परम कल्याण अवश्य होगा. मेरे मत से यही तुम्हारे लिए सर्वोत्तम मार्ग है. बस तू अपने धर्म को निभाए जा, और सब कर्मों को मुझे समर्पित करता जा.

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

भावार्थ:  संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर॥66॥ 

इस श्लोक में प्रभु अर्जुन के साथ साथ, सभी भक्तों को एक प्रबल संदेश देते हैं कि, तुम सब अपने कर्तव्य कर्मों को, तथा सामाजिक दायित्वों करने के बाद, मुझे समर्पित करते चलो और निश्चिन्त हो जाओ.  मैं आप सब को, हर प्रकार के पापों से मुक्त कर, मोक्ष की ओर ले चलूँगा. किसी प्रकार का शोक या चिंता मत करो. इतना बड़ा आश्वासन, वह भी प्रभु के श्री मुख से. इससे बढ़ कर एक भक्त को भला क्या चाहिए? 

भगवद् गीता के अन्त तक आते आते, प्रभु यह भी बतलाते हैं किं, यह पवित्र ज्ञान सबके लिए नहीं है. यह केवल उन श्रद्धायुक्त भक्तों के लिए है, जिन्हें प्रभु से प्यार है. यह उनके लिए है, जो प्रभु को पाना चाहते हैं. इस ज्ञान को कभी भी अयोग्य प्राणियों को मत सुनाना. जो भगवान में विश्वास नहीं करते, यह ज्ञान उनके लिए कदापि नहीं है. बल्कि ज्ञान की महत्ता को बताते हुए, प्रभु कहते हैं कि, जो भी इस ज्ञान को पढ़ समझ कर, मेरे भक्तों को सुनाएगा, वह मुझे अत्यंत प्रिय होगा. जो कोई योगी इसे प्रेम और श्रद्धा से सुनेगा, उसका उद्धार अवश्य होगा. इसके श्रवण मात्र से, उस योगी में, मेरी भक्ति का ऊद्भाव होगा.

आख़िर में भगवान कृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि, हमारे इस संवाद से तुम्हें कुछ लाभ मिला? अर्जुन प्रभु के चरणों में गिर कर प्रेम विह्वल हो जाता है. कहता है, मेरे केशव, आपने मेरे सब संदेह समाप्त कर दिये हैं. मेरा सारा मोह भँग हो गया है. अब सजग हो गया हूँ और आपकी हर बात को मानने के लिए तत्पर हूँ.

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत

स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव

भावार्थ:  अर्जुन बोले- हे केशव!  आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशय रहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा॥73॥

चूँकि यह गीता संवाद संजय एक दिव्य दृष्टि के माध्यम से राजा धृतराष्ट्र को सुना रहे थे, तो संवाद के अन्त में संजय महाराज को अपना मत सुनाते हुए कहते हैं कि, हे महाराज, मैंने भगवान कृष्ण के इस परम हितकारी स्वरूप को देखा और सुना. यह सब याद करके मैं बार बार हर्षित हो रहा हूँ. मेरा ऐसा मानना है कि, जहाँ जहाँ योगेश्वर कृष्ण होंगे और जहाँ गाण्डीव धारी महायोद्धा अर्जुन होंगे, विजय उसी पक्ष के चरण चूमेगी. 
इन अठारह अध्यायों के परम दिव्य संवाद में, छिपे परम गोपनीय ज्ञान को पढ़ और समझ कर, मैं राजेंद्र कपिल, अपने आप को बहुत सौभाग्यशाली अनुभव कर रहा हूँ. मैंने इस दिव्य ज्ञान को आप सब तक पहुँचाने का प्रयास किया है. मेरे इस प्रयास से अगर कुछ भक्तों में भक्ति की, कोई छोटी सी भी ज्योति जली हो, तो मैं अपने आप को कृतार्थ मानूँगा. परम् दिव्य भगवान कृष्ण को तथा और सभी भक्तों को मेरा कोटि कोटि नमन. “जय श्री कृष्णा”

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