
आंध्र प्रदेश मंदिर यात्रा चौदहवाँ पड़ाव – श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर, पेनुगोंडा (पश्चिम गोदावरी)
IndoUS Tribune की “Temples of Andhra Pradesh Yatra” में आपका एक बार फिर हार्दिक स्वागत है।
अब जबकि हमारी यह आध्यात्मिक यात्रा अपने अंतिम चरण की ओर अग्रसर है, आज हम आपको ले चल रहे हैं आंध्र प्रदेश के एक ऐसे पवित्र तीर्थ स्थल पर, जिसे आर्य वैश्य समाज के लिए वही स्थान प्राप्त है जो बौद्धों के लिए बोधगया, जैनों के लिए श्रवणबेलगोला, मुसलमानों के लिए मक्का–मदीना और ईसाइयों के लिए यरुशलम।
इस श्रृंखला के चौदहवें पड़ाव में हम दर्शन कर रहे हैं — श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर, पेनुगोंडा (पश्चिम गोदावरी), जहाँ देवी वासवी माताजी की कथा त्याग, अहिंसा, नारी गरिमा और धर्मरक्षा का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करती है।
पेनुगोंडा : वासवी माता की पावन धरा
गोदावरी की पवित्र सहायक धारा गौतमी नदी के तट पर स्थित पेनुगोंडा प्राचीन काल से ही तप, यज्ञ और साधना की भूमि रही है। मान्यता है कि यहीं महर्षि पुलस्त्य ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के एक साथ दर्शन किए थे। भगवान कुमारस्वामी (स्कंद) ने भी इसी भूमि पर तपस्या की थी।
कालांतर में यह स्थान कोनाकोमल जनार्दन (लक्ष्मीनारायण) और गौरी नागरेश्वर (पार्वती–परमेश्वर) की भी आराधना स्थली बना।
देवी वासवी की उत्पत्ति और जीवन कथा
श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी देवी का जन्म पेनुगोंडा के शासक कुसुम श्रेष्ठी (पेड्डा सेठी) और उनकी पत्नी कुसुमांबा के यहाँ हुआ। उन्होंने संतान प्राप्ति हेतु पुत्रकामेष्टि यज्ञ किया था। देवी का जन्म वैशाख शुक्ल दशमी, पुनर्वसु नक्षत्र में हुआ—उनके साथ उनके भ्राता वीरूपाक्ष भी जन्मे।
बाल्यकाल से ही वासवी देवी में विलक्षण तेज, कला, दर्शन और आत्मिक चेतना के गुण विद्यमान थे। वे सांसारिक वैभव से परे, धर्म और आत्मबल में आस्था रखने वाली थीं।
आत्मबलिदान (आत्मा-बलि) : अहिंसा का सर्वोच्च उदाहरण
जब वंगी देश के शासक विष्णुवर्धन (विमलादित्य) ने देवी वासवी से विवाह का आग्रह किया, तब उन्होंने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया। यह इनकार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि नारी सम्मान, सामाजिक मर्यादा और धर्म की रक्षा का प्रतीक था।
राजा के आक्रमण की आशंका के बीच, देवी वासवी ने युद्ध के स्थान पर अहिंसा और आत्म-त्याग का मार्ग चुना। उन्होंने 102 गोत्रों के दंपतियों के साथ आत्मा-बलिदान (अग्नि प्रवेश) का निर्णय लिया।
अग्निकुंड में प्रवेश से पूर्व देवी ने अपना विश्वरूप दर्शन दिया और स्वयं को आदि पराशक्ति का अवतार घोषित किया। उनका यह त्याग इतिहास में नारी शक्ति, नैतिक साहस और अहिंसा की अमर गाथा बन गया।
इस दिव्य घटना के पश्चात राजा विष्णुवर्धन का अंत हो गया और समाज ने वासवी देवी को कुलदेवी के रूप में स्वीकार किया।
मंदिर का महत्व और स्थापत्य
श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर का निर्माण वास्तु शास्त्र के अनुसार किया गया है।
मुख्य आकर्षण हैं:
- सात मंज़िला, बहुरंगी गली गोपुरम
- पूर्वाभिमुख भव्य महाद्वार
- श्री नागरेश्वर स्वामी, वासवी माता और महिषासुरमर्दिनी के त्रिदेवालय
- विशाल प्राकार, मंडप, गरभगृह और दर्पण मंडप
यहाँ स्थापित शिवलिंग और देवी प्रतिमाएँ पंचधातु से निर्मित मानी जाती हैं और भक्तों के मन में अद्भुत श्रद्धा उत्पन्न करती हैं।
आर्य वैश्य समाज की काशी
पेनुगोंडा को “वैश्य काशी” कहा जाता है।
यह स्थान आर्य वैश्य समाज के लिए उतना ही पवित्र है जितना:
- बौद्धों के लिए बोधगया
- जैनों के लिए श्रवणबेलगोला
- मुसलमानों के लिए मक्का
- ईसाइयों के लिए यरुशलम
हर वर्ष वासवी जयंती और आत्मार्पण दिवस पर यहाँ हज़ारों श्रद्धालु देश–विदेश से दर्शन हेतु आते हैं।
देवी वासवी की अमर विरासत
देवी वासवी का जीवन नारी गरिमा, अहिंसा, सामाजिक उत्तरदायित्व और धर्मपालन का शाश्वत संदेश देता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि शक्ति केवल शस्त्र में नहीं, बल्कि आत्मबल, त्याग और सत्य में निहित होती है।
समापन
श्री वासवी कन्यका परमेश्वरी मंदिर, पेनुगोंडा के दर्शन के साथ IndoUS Tribune की “Temples of Andhra Pradesh Yatra” अपने अंतिम चरण में प्रवेश करती है। यह पड़ाव हमें स्मरण कराता है कि भारत की मंदिर परंपरा केवल आस्था की नहीं, बल्कि मूल्यों, बलिदान और मानवता की भी धरोहर है।
अब हमारी इस पावन यात्रा का अंतिम और 15वाँ पड़ाव होगा —
सोमाराम मंदिर, भीमावरम,
जहाँ भगवान शिव पंचराम क्षेत्रों में से एक के रूप में पूजित हैं।
तब तक के लिए,
माता वासवी का त्याग, शक्ति और करुणा आपके जीवन में धर्म, शांति और सद्बुद्धि का प्रकाश फैलाए —
यही IndoUS Tribune की ओर से मंगलकामना।