राजा परीक्षित और कलियुग: धर्म, समय और मानव चेतना का शाश्वत संदेश

राजा परीक्षित और कलियुग: धर्म, समय और मानव चेतना का शाश्वत संदेश

भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में पुराण कथाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं हैं, बल्कि मानव जीवन के गहन मनोवैज्ञानिक, नैतिक और सामाजिक सत्य को प्रकट करने वाले दर्पण हैं। राजा परीक्षित की कथा इसी श्रेणी में आती है। यह कथा हमें बताती है कि धर्म का संरक्षण केवल राजाओं या ऋषियों का दायित्व नहीं, बल्कि प्रत्येक मनुष्य की चेतना और आचरण पर निर्भर है।

राजा परीक्षित, महान धनुर्धर अर्जुन के पौत्र और वीर अभिमन्यु के पुत्र थे। पांडवों के स्वर्गारोहण के पश्चात उन्होंने धर्म, न्याय और सत्य के आधार पर राज्य चलाया। वे आदर्श शासक थे—प्रजा सुखी थी, यज्ञ सम्पन्न हुए, और समाज में व्यवस्था थी। किंतु इतिहास और धर्मग्रंथ बार-बार स्मरण कराते हैं कि समय का चक्र परिवर्तनशील है। जैसे ही भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी से प्रस्थान करते हैं, द्वापर युग समाप्त होता है और कलियुग का आरंभ होता है—एक ऐसा युग जिसमें धर्म के चार स्तंभों में से केवल सत्य शेष रह जाता है।

धर्म और पृथ्वी का संवाद: युग परिवर्तन का प्रतीक

दिग्विजय के दौरान राजा परीक्षित ने एक अद्भुत दृश्य देखा—एक बैल (धर्म) एक पैर पर खड़ा था और एक गाय (पृथ्वी) विलाप कर रही थी। धर्म के तीन पैर—दया, तप और पवित्रता—टूट चुके थे। यह दृश्य केवल प्रतीकात्मक नहीं था; यह समाज में घटते नैतिक मूल्यों का चित्रण था। पृथ्वी माता का शोक इस बात का प्रतीक था कि जब ईश्वर की चेतना से मानव दूर हो जाता है, तब सत्य, करुणा और सदाचार क्षीण होने लगते हैं।

कलियुग का प्रवेश और अधर्म के निवास स्थान

राजा ने देखा कि एक क्रूर व्यक्ति गाय और बैल को पीड़ित कर रहा है। वह स्वयं को कलियुग बताता है। राजा उसे राज्य से निकालना चाहते हैं, किंतु वह निवास स्थान की प्रार्थना करता है। अंततः राजा परीक्षित उसे पाँच स्थान देते हैं—जुआ, मद्यपान, अनैतिक संबंध, हिंसा और अन्यायपूर्ण धन (स्वर्ण)। यह निर्णय गहन प्रतीकात्मक अर्थ रखता है: जहाँ लोभ, वासना, हिंसा और असत्य का वास है, वहीं कलियुग सक्रिय होता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक सत्य प्रकट होता है—कलियुग बाहरी शक्ति नहीं, बल्कि मानव प्रवृत्तियों में प्रवेश करने वाली मानसिक अवस्था है।

स्वर्ण का मोह और विवेक का क्षय

कलियुग को स्वर्ण में स्थान देने के पश्चात राजा परीक्षित एक स्वर्ण मुकुट धारण करते हैं। यह मुकुट पूर्वकाल से खजाने में रखा था और पांडवों ने उसे कभी नहीं पहना। स्वर्ण यहाँ केवल धातु नहीं, बल्कि लोभ और अहंकार का प्रतीक है। मुकुट धारण करते ही राजा की बुद्धि भ्रमित हो जाती है और वे शिकार के लिए निकल पड़ते हैं—एक ऐसा कार्य जो उनके स्वभाव के विपरीत था। यह प्रसंग बताता है कि अनैतिक धन और अहंकार मनुष्य की विवेक शक्ति को क्षीण कर देते हैं।

क्रोध का क्षण और जीवन परिवर्तन

वन में प्यासे और थके हुए राजा एक तपस्वी ऋषि की कुटिया पहुँचते हैं। ऋषि समाधि में लीन होते हैं और उत्तर नहीं दे पाते। क्रोध में आकर राजा मृत सर्प को उनके गले में डाल देते हैं। यह क्षणिक क्रोध जीवन की दिशा बदल देता है। ऋषि पुत्र द्वारा दिया गया श्राप—सातवें दिन तक्षक नाग के दंश से मृत्यु—राजा के जीवन का निर्णायक मोड़ बन जाता है।

यह घटना बताती है कि क्रोध एक क्षणिक प्रतिक्रिया है, किंतु उसके परिणाम दीर्घकालिक और गंभीर हो सकते हैं।

पश्चाताप से वैराग्य तक

जब राजा मुकुट उतारते हैं, उनका विवेक लौट आता है। वे अपने अपराध पर पश्चाताप करते हैं और श्राप को ईश्वर की कृपा मानते हैं। वे राज्य त्याग कर गंगा तट पर चले जाते हैं और जीवन के अंतिम सात दिनों को ईश्वर स्मरण और ज्ञान प्राप्ति में समर्पित करने का संकल्प लेते हैं। यह परिवर्तन दर्शाता है कि पश्चाताप आत्मशुद्धि का प्रथम चरण है।

मृत्यु का प्रश्न और जीवन का उत्तर

गंगा तट पर एकत्रित ऋषियों के समक्ष राजा एक सार्वभौमिक प्रश्न रखते हैं—मृत्यु समीप होने पर मनुष्य को क्या करना चाहिए? यह प्रश्न केवल परीक्षित का नहीं, बल्कि प्रत्येक मानव का है। उसी समय महान ज्ञानी शुकदेव प्रकट होते हैं और सात दिनों तक श्रीमद्भागवत कथा का उपदेश देते हैं। कथा के माध्यम से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का मार्ग स्पष्ट होता है।

राजा परीक्षित को सात दिन मिले; हमें यह भी ज्ञात नहीं कि हमारे पास कितना समय है। यही इस कथा का आध्यात्मिक केंद्र है।

कलियुग का महान वरदान

यद्यपि कलियुग को अधर्म का युग कहा जाता है, फिर भी इसमें एक महान वरदान है—भगवान के नाम का स्मरण ही मुक्ति का साधन है। पूर्व युगों में कठोर तप, यज्ञ और दीर्घ साधनाएँ आवश्यक थीं; कलियुग में श्रद्धा और नामस्मरण पर्याप्त हैं।

आधुनिक जीवन में कथा की प्रासंगिकता

आज का समाज तकनीकी प्रगति के शिखर पर है, परन्तु मानसिक अशांति, लोभ, हिंसा और नैतिक संकट भी बढ़ रहे हैं। जुआ अब डिजिटल प्लेटफॉर्म पर है, मद्यपान सामाजिक स्वीकृति पा चुका है, हिंसा विचारों में प्रवेश कर चुकी है और अनैतिक धन को सफलता का प्रतीक समझा जाता है। इस संदर्भ में राजा परीक्षित की कथा हमें चेतावनी देती है कि कलियुग बाहरी समय नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना की अवस्था है।

जीवन के लिए धर्मिक संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि:

  • सत्य और करुणा धर्म के आधार हैं
  • लोभ विवेक को नष्ट करता है
  • क्रोध निर्णय शक्ति को भ्रष्ट करता है
  • संतों और ज्ञान का सम्मान आवश्यक है
  • मृत्यु का स्मरण जीवन को सार्थक बनाता है
  • नामस्मरण और सत्संग आत्मशुद्धि का सरल मार्ग है

निष्कर्ष: धर्म का संरक्षण भीतर से आरम्भ होता है

राजा परीक्षित की कथा हमें यह समझाती है कि मनुष्य त्रुटि कर सकता है, परंतु पश्चाताप, ज्ञान और भक्ति उसे पुनः प्रकाश की ओर ले जा सकते हैं। धर्म का पतन बाहर से नहीं होता; वह मनुष्य के भीतर से क्षीण होता है। उसी प्रकार धर्म का पुनर्जागरण भी भीतर से ही आरम्भ होता है।

कलियुग में यदि मनुष्य सत्य, करुणा और ईश्वर स्मरण को जीवन में स्थापित कर ले, तो वही युग उसके लिए मुक्ति का मार्ग बन सकता है।

धर्म की रक्षा शस्त्र से नहीं, चरित्र से होती है।

और कलियुग में—हरि नाम ही सबसे सरल साधना है।

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