
चौथा पड़ाव: नक्सा परवत मंदिर के खंडहर IndoUS Tribune की “मंदिरों की यात्रा” श्रृंखला का चौथा अध्याय
आंध्र प्रदेश के भव्य, प्राचीन और आस्था से परिपूर्ण मंदिरों की अत्यंत सफल और स्मरणीय यात्रा के उपरांत, IndoUS Tribune अब अपनी आध्यात्मिक खोज को भारत के सुदूर उत्तर-पूर्व की ओर विस्तार दे चुका है। दक्षिण भारत की दिव्य स्थापत्य परंपराओं और गहन भक्ति-अनुभवों के बाद अब हम प्रवेश कर रहे हैं उस भूमि में, जहाँ प्रकृति, इतिहास और रहस्य एक साथ सांस लेते हैं—अरुणाचल प्रदेश।
“उगते सूरज की भूमि” के नाम से विख्यात यह राज्य हिमालय की गोद में बसा है, जहाँ पर्वतों की ऊँचाइयाँ, नदियों की कलध्वनि और घने वन एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण रचते हैं। IndoUS Tribune की श्रृंखला “यात्रा: अरुणाचल प्रदेश के मंदिरों की” का उद्देश्य इन्हीं अल्पज्ञात किंतु अत्यंत महत्वपूर्ण स्थलों को प्रकाश में लाना है। इस यात्रा के चौथे पड़ाव पर हम पहुँचते हैं नक्सा परवत मंदिर के खंडहर—एक ऐसा स्थल, जिसे “माउंटेन मार्क्स” और “भूली हुई सभ्यता” के अवशेष के रूप में भी जाना जाता है।
इतिहास और उत्पत्ति
पक्के-केसांग जिले में स्थित यह मध्यकालीन पुरातात्विक स्थल 14वीं–15वीं शताब्दी का माना जाता है। इतिहासकारों और स्थानीय परंपराओं के अनुसार, इन संरचनाओं का संबंध असम के प्राचीन चुटिया (Chutia) साम्राज्य से जोड़ा जाता है। विशेष रूप से राजा मुक्ताधर्मनारायण का नाम सामने आता है, क्योंकि यहाँ मिले पत्थरों पर अंकित राजमिस्त्री चिह्न (mason marks) सादिया स्थित ताम्रेश्वरी मंदिर के अवशेषों से साम्य रखते हैं।
यह अनुमान लगाया जाता है कि यह स्थल राजाओं का ग्रीष्मकालीन शिविर, दुर्ग अथवा विश्रामस्थल रहा होगा। पर्वतीय भूभाग में चार स्तरों पर फैली यह बसावट लगभग पाँच किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है। सबसे ऊपरी भाग “तापोसो” कहलाता है, जबकि निचला भाग पासो नदी और डिसिंग-पासो प्रशासनिक क्षेत्र के निकट है।
स्थापत्य और पुरातात्विक विशेषताएँ
आंशिक उत्खनन में यहाँ विशाल जल-संग्रहण कुण्ड (रिंग वेल), पत्थर के स्तंभ, घरों के चबूतरे, नहरों के अवशेष तथा एक लघु रंगमंच (अम्फीथिएटर) जैसी संरचनाएँ प्राप्त हुई हैं। पत्थरों पर उकेरे गए विशिष्ट चिह्न उच्च कोटि की स्थापत्य योजना और संगठित निर्माण प्रणाली का संकेत देते हैं।
“नक्सा” शब्द का अर्थ है—चिह्न या नक़्क़ाशी। संभवतः इसी कारण इस पर्वत को “नक्सा परवत” कहा गया, क्योंकि यहाँ की चट्टानों और पत्थरों पर बने चिन्ह एक सुविकसित सभ्यता की गवाही देते हैं।
यह स्थल आज भी आंशिक रूप से रहस्य में डूबा हुआ है। स्थानीय लोककथाएँ इसे एक प्राचीन, शक्तिशाली साम्राज्य की सीमा-स्थली बताती हैं, जिसने अरुणाचल की तलहटी में उन्नत और सुदृढ़ बसावट स्थापित की थी।
ट्रेकिंग और रोमांच
नक्सा परवत मंदिर के खंडहर आज साहसिक पर्यटन और ट्रेकिंग प्रेमियों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुके हैं।
- ट्रेक मार्ग: नामोरा गाँव से प्रारंभ होने वाला ट्रेक घने वनों और पर्वतीय पगडंडियों से होकर गुजरता है।
- कठिनाई स्तर: मध्यम (Moderate) – लगभग 2–3 घंटे की चढ़ाई।
- सर्वश्रेष्ठ समय: अक्टूबर से अप्रैल के बीच, जब मौसम सुहावना और आकाश स्वच्छ रहता है।
- वर्षा ऋतु में मार्ग फिसलनभरा हो सकता है, इसलिए स्थानीय गाइड के साथ जाना उपयुक्त माना जाता है।
ट्रेक के दौरान प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक अवशेषों का संयोजन एक अनूठा अनुभव प्रदान करता है।
कैसे पहुँचे
- निकटतम हवाई अड्डा: लीलाबाड़ी (असम) या गुवाहाटी।
- निकटतम रेलवे स्टेशन: हरमुट्टी (असम)।
- वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा पक्के-केसांग जिले के नामोरा या डिसिंग-पासो तक पहुँचा जा सकता है।
- अंतिम चरण में स्थानीय वाहन या पैदल ट्रेक के माध्यम से स्थल तक पहुँचना होता है।
दर्शन समय
चूँकि यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्थल है, यहाँ कोई औपचारिक मंदिर-समय निर्धारित नहीं है। सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक भ्रमण किया जा सकता है। यात्रियों को स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करना आवश्यक है।
निष्कर्ष: इतिहास की शिला-लिपियों से संवाद
IndoUS Tribune की इस आध्यात्मिक-ऐतिहासिक यात्रा का चौथा पड़ाव हमें यह स्मरण कराता है कि आस्था केवल जीवंत मंदिरों में ही नहीं, बल्कि उन खंडहरों में भी विद्यमान है जो समय की धूल में दबे हैं। नक्सा परवत के पत्थरों पर अंकित चिह्न हमें एक ऐसी सभ्यता की कहानी सुनाते हैं, जो कभी यहाँ फली-फूली थी और आज भी अपनी उपस्थिति का संकेत देती है।
अब हमारी “Temples of Arunachal Yatra” अपने अंतिम और विशेष पड़ाव की ओर अग्रसर है—भीष्मकनगर मंदिर परिसर, जहाँ प्राचीन किलों, राजवंशों और पौराणिक कथाओं का अद्भुत संगम हमारा इंतजार कर रहा है।
हमारे साथ बने रहिए—क्योंकि यह यात्रा केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि भारत की उस अमिट आत्मा को जानने की यात्रा है, जो पर्वतों, नदियों और शिलाओं में आज भी जीवित है।
Revise as this is a 4th stop of the yatra. It is not a new series.
चौथा पड़ाव: नक्सा परवत मंदिर के खंडहर
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का विस्तार
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” अब अपने चौथे महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँच चुकी है। परशुराम कुंड की आध्यात्मिक पवित्रता, मालिनीथान की ऐतिहासिक आभा और तारा-तारिणी की शक्ति-परंपरा के बाद अब हमारी यात्रा हमें अरुणाचल प्रदेश के पक्के-केसांग जिले की पर्वतीय गोद में स्थित नक्सा परवत मंदिर के खंडहरों तक ले आई है।
अरुणाचल प्रदेश—“उगते सूरज की भूमि”—के इस दुर्गम क्षेत्र में प्रकृति और इतिहास एक साथ जीवंत प्रतीत होते हैं। यहाँ के घने वन, पर्वतीय पगडंडियाँ और रहस्यमयी पत्थर-चिह्न एक ऐसी सभ्यता की कहानी कहते हैं, जो समय के प्रवाह में कहीं विलुप्त हो गई, पर अपने निशान आज भी छोड़ गई है।
इतिहास और उत्पत्ति
नक्सा परवत के ये अवशेष 14वीं–15वीं शताब्दी के माने जाते हैं और इतिहासकार इन्हें असम के प्राचीन चुटिया (Chutia) साम्राज्य से जोड़ते हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार, यह स्थल संभवतः चुटिया राजाओं का ग्रीष्मकालीन शिविर, दुर्ग या विश्रामस्थल रहा होगा।
विशेष रूप से राजा मुक्ताधर्मनारायण का उल्लेख मिलता है, क्योंकि यहाँ पाए गए राजमिस्त्री चिह्न (mason marks) सादिया स्थित ताम्रेश्वरी मंदिर के अवशेषों से साम्य रखते हैं। यह समानता दर्शाती है कि उस काल में इस क्षेत्र में उन्नत स्थापत्य और संगठित निर्माण परंपरा विद्यमान थी।
स्थापत्य संरचना और पुरातात्विक खोज
यह स्थल लगभग पाँच किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है और चार स्तरों (लेयर्स) में विकसित बसावट का स्वरूप प्रस्तुत करता है।
- सबसे ऊपरी भाग “तापोसो” कहलाता है।
- निचला और अपेक्षाकृत सुलभ भाग पासो नदी तथा डिसिंग-पासो प्रशासनिक मुख्यालय के निकट स्थित है।
आंशिक उत्खनन में यहाँ विशाल जल-संग्रहण कुण्ड (रिंग वेल), पत्थर के स्तंभ, घरों के चबूतरे, नहरों के अवशेष तथा एक लघु रंगमंच (अम्फीथिएटर) जैसी संरचनाएँ मिली हैं। पत्थरों पर अंकित विशिष्ट नक़्क़ाशी और चिह्न इस स्थल के नाम—“नक्सा परवत” (अर्थात् पर्वत पर अंकित चिह्न)—को सार्थक करते हैं।
यह स्थल अरुणाचल प्रदेश के शोध निदेशालय के संरक्षण में है, किंतु अब भी व्यापक ऐतिहासिक अध्ययन की प्रतीक्षा कर रहा है।
लोककथाएँ और रहस्य
स्थानीय लोकमान्यताओं में नक्सा परवत को “भूली हुई सभ्यता” का प्रतीक माना जाता है। किंवदंतियाँ बताती हैं कि यहाँ एक शक्तिशाली राजवंश ने दुर्गनुमा संरचनाएँ निर्मित की थीं, जो प्राकृतिक आपदाओं या ऐतिहासिक संघर्षों के कारण समय के साथ नष्ट हो गईं।
इन पत्थर-चिह्नों और स्थापत्य अवशेषों के कारण यह स्थल इतिहासकारों, शोधकर्ताओं और साहसिक यात्रियों के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
ट्रेकिंग और भ्रमण
नक्सा परवत मंदिर के खंडहर आज साहसिक ट्रेकिंग के लिए प्रसिद्ध हैं।
- प्रारंभिक बिंदु: नामोरा गाँव
- ट्रेक अवधि: लगभग 2–3 घंटे (मध्यम कठिनाई स्तर)
- सर्वश्रेष्ठ समय: अक्टूबर से अप्रैल
- वर्षा ऋतु में मार्ग फिसलनभरा हो सकता है; अतः स्थानीय गाइड के साथ जाना उपयुक्त है।
घने वनों और पर्वतीय ढलानों से होकर गुजरता यह ट्रेक प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक जिज्ञासा का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है।
कैसे पहुँचे
- निकटतम हवाई अड्डा: लीलाबाड़ी (असम) या गुवाहाटी
- निकटतम रेलवे स्टेशन: हरमुट्टी (असम)
- वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा पक्के-केसांग जिले के नामोरा या डिसिंग-पासो पहुँचा जा सकता है।
- अंतिम चरण में स्थानीय वाहन अथवा पैदल ट्रेक द्वारा स्थल तक पहुँचना होता है।
दर्शन समय
यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्थल है, अतः कोई औपचारिक मंदिर-समय निर्धारित नहीं है। सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक भ्रमण किया जा सकता है। यात्रियों को स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।
निष्कर्ष: शिलाओं में अंकित इतिहास का आह्वान
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का यह चौथा पड़ाव हमें यह अनुभूति कराता है कि भारत की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत केवल जीवंत मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि उन खंडहरों में भी सहेजी हुई है जो समय के साक्षी हैं। नक्सा परवत के पत्थरों पर उकेरे गए चिह्न हमें एक ऐसी सभ्यता की कहानी सुनाते हैं, जो भले ही इतिहास के पन्नों में धुंधली हो गई हो, पर अपनी उपस्थिति आज भी दर्ज कराती है।
अब हमारी यह यात्रा अपने अंतिम और विशेष पड़ाव की ओर बढ़ रही है—भीष्मकनगर मंदिर परिसर—जहाँ प्राचीन किलों, पौराणिक कथाओं और राजवंशीय इतिहास का अद्भुत संगम हमारा इंतजार कर रहा है।
हमारे साथ बने रहिए—क्योंकि यह यात्रा केवल स्थलों की नहीं, बल्कि भारत की उस सनातन आत्मा की खोज है, जो समय, प्रकृति और इतिहास के पार भी जीवित है।
Revise accordingly : our last stop was Tupin Tarin or Tara Tarini Temple nor Paeshuram kund
चौथा पड़ाव: नक्सा परवत मंदिर के खंडहर
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का चौथा अध्याय
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” अब अपने चौथे महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुँच चुकी है। तुपिन तारिन मंदिर की आध्यात्मिक गरिमा और तारा तारिणी की शक्ति-परंपरा से जुड़ी गहन अनुभूतियों के पश्चात्, हमारी यात्रा अब हमें अरुणाचल प्रदेश के पक्के-केसांग जिले की पर्वतीय गोद में स्थित नक्सा परवत मंदिर के खंडहरों तक ले आई है।
अरुणाचल प्रदेश—“उगते सूरज की भूमि”—के इस दुर्गम और रमणीय क्षेत्र में प्रकृति और इतिहास एक साथ सजीव हो उठते हैं। घने वन, ऊँची-नीची पहाड़ियाँ और पत्थरों पर उकेरे गए रहस्यमयी चिह्न एक ऐसी प्राचीन सभ्यता का संकेत देते हैं, जो समय के प्रवाह में कहीं विलुप्त हो गई, पर अपने निशान आज भी सुरक्षित रखे हुए है।
इतिहास और उत्पत्ति
नक्सा परवत के ये अवशेष 14वीं–15वीं शताब्दी के माने जाते हैं। इतिहासकार इन्हें असम के प्राचीन चुटिया (Chutia) साम्राज्य से जोड़ते हैं। स्थानीय परंपराओं में यह उल्लेख मिलता है कि संभवतः यह स्थल चुटिया राजाओं का ग्रीष्मकालीन शिविर, दुर्ग अथवा विश्रामस्थल रहा होगा।
विशेष रूप से राजा मुक्ताधर्मनारायण का नाम लिया जाता है, क्योंकि यहाँ पाए गए राजमिस्त्री चिह्न सादिया स्थित ताम्रेश्वरी मंदिर के अवशेषों से साम्य रखते हैं। यह समानता उस युग की संगठित निर्माण प्रणाली और उन्नत स्थापत्य कौशल की ओर संकेत करती है।
स्थापत्य संरचना और पुरातात्विक खोज
यह स्थल लगभग पाँच किलोमीटर क्षेत्र में चार स्तरों में फैली बसावट को दर्शाता है।
- सबसे ऊपरी स्तर “तापोसो” के नाम से जाना जाता है।
- निचला भाग पासो नदी और डिसिंग-पासो प्रशासनिक मुख्यालय के निकट स्थित है।
आंशिक उत्खनन में यहाँ विशाल जल-संग्रहण कुण्ड (रिंग वेल), पत्थर के स्तंभ, घरों के चबूतरे, नहरों के अवशेष तथा एक लघु रंगमंच (अम्फीथिएटर) जैसी संरचनाएँ प्राप्त हुई हैं। पत्थरों पर अंकित विशिष्ट नक़्क़ाशी और निर्माण-चिह्न इस स्थल के नाम—“नक्सा परवत” (अर्थात् पर्वत पर अंकित चिह्न)—को सार्थक करते हैं।
यह स्थल अरुणाचल प्रदेश के शोध निदेशालय के संरक्षण में है, किंतु अभी भी व्यापक ऐतिहासिक अध्ययन और उत्खनन की प्रतीक्षा कर रहा है।
लोककथाएँ और रहस्य
स्थानीय लोकमान्यताओं में नक्सा परवत को “भूली हुई सभ्यता” का प्रतीक माना जाता है। किंवदंतियाँ बताती हैं कि यहाँ एक शक्तिशाली राजवंश ने सुदृढ़ पर्वतीय बसावट स्थापित की थी। समय, संघर्ष या प्राकृतिक कारणों से यह नगर उजड़ गया, किंतु उसके पत्थरों पर अंकित चिह्न आज भी उस गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं।
ट्रेकिंग और भ्रमण
नक्सा परवत मंदिर के खंडहर साहसिक ट्रेकिंग के लिए प्रसिद्ध होते जा रहे हैं।
- प्रारंभिक बिंदु: नामोरा गाँव
- ट्रेक अवधि: लगभग 2–3 घंटे (मध्यम कठिनाई स्तर)
- सर्वश्रेष्ठ समय: अक्टूबर से अप्रैल
- वर्षा ऋतु में मार्ग फिसलनभरा हो सकता है; अतः स्थानीय गाइड के साथ जाना उचित है।
घने वनों और पर्वतीय पगडंडियों से होकर गुजरने वाला यह ट्रेक प्रकृति और इतिहास के अनूठे संगम का अनुभव कराता है।
कैसे पहुँचे
- निकटतम हवाई अड्डा: लीलाबाड़ी (असम) या गुवाहाटी
- निकटतम रेलवे स्टेशन: हरमुट्टी (असम)
- वहाँ से सड़क मार्ग द्वारा पक्के-केसांग जिले के नामोरा या डिसिंग-पासो पहुँचा जा सकता है।
- अंतिम चरण में स्थानीय वाहन अथवा पैदल ट्रेक द्वारा स्थल तक पहुँचना होता है।
दर्शन समय
यह एक संरक्षित पुरातात्विक स्थल है, अतः कोई औपचारिक मंदिर-समय निर्धारित नहीं है। सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक भ्रमण किया जा सकता है। यात्रियों को स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के दिशा-निर्देशों का पालन करना चाहिए।
निष्कर्ष: शिलाओं में अंकित इतिहास का संदेश
IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का यह चौथा पड़ाव हमें यह स्मरण कराता है कि आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत केवल जीवंत मंदिरों तक सीमित नहीं होती। नक्सा परवत के खंडहर हमें बताते हैं कि इतिहास की मौन शिलाएँ भी सभ्यता, आस्था और स्थापत्य कौशल की गाथा सुनाती हैं।
अब हमारी यह यात्रा अपने अंतिम और विशेष पड़ाव की ओर अग्रसर है—भीष्मकनगर मंदिर परिसर—जहाँ पौराणिक कथाओं, प्राचीन किलों और राजवंशीय इतिहास का अद्भुत संगम हमारी प्रतीक्षा कर रहा है।
हमारे साथ जुड़े रहिए—क्योंकि यह यात्रा केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि भारत की उस सनातन आत्मा की खोज है, जो समय और इतिहास के पार भी जीवित है।