बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग:

बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग:

By: Rajendra Kapil


रावण ने सीता को हाथ क्यों नहीं लगाया?  
क्या  यह धैर्य था या किसी श्राप का बल?

ऋषि पुलस्त्य कुल में जन्मा, जगत प्रतापी रावण, एक महा बलशाली एवं ज्ञानी राजा था. उसने अपने युवाकाल में भगवान शिव की अनन्य आराधना की. जिसके फलस्वरूप उसे बहुत से सिद्ध अस्त्र शस्त्र प्राप्त हुए. वह महान ऋषि विश्रवा का पुत्र और ऋषि पुलस्त्य का पौत्र था. भारत के विद्वान रावण के गुणों की प्रशंसा करते नहीं थकते. उसकी बस एक ही कमज़ोरी थी, उसकी काम वासना. उसके चलते वह सुंदर स्त्री को देख, अधीर हो उठता था. फिर बहुतों ने रावण की, यह कह कर, प्रशंसा की कि, वह चरित्र का इतना अच्छा था कि, सीता का अपहरण करने के बाद भी, उसने सीता को बल पूर्वक, कभी छूने का प्रयास भी नहीं किया. वह विद्वान इसे रावण के धैर्य का एक सुंदर उदाहरण मानते हैं. क्या यह वाकई उसका धैर्य था या कोई और कारण?

रामचरित मानस के सुंदर कांड में इस प्रसंग का सा थोड़ा वर्णन है. इसमें वह सीता को मंदोदरी से भी बड़ी पटरानी बनाने का प्रलोभन देता है. सारा वैभव उसके चरणों में लुटाने को तत्पर दीखता है. इस पर भी जब सीता, कोई सीधा उत्तर नहीं देती,  तो उसे डराने और धमकाने का पूरा यत्न करता है. यहाँ रावण के धैर्य की परीक्षा थी.

कह रावन सुनु सुमुख सयानी, मंदोदरी आदि सब रानी

तव अनुचरी करउ पन मोरा, एक बार बिलोकु मम ओरा

लेकिन सीता ने उसकी ओर देखा तक नहीं.  बल्कि उसे कहा कि, कहाँ मेरे सूर्य जैसे प्रतापी राम और कहाँ तुझ जैसा निस्तेज जुगनू. रावण को यह सुन क्रोध आ गया. वह चिल्लाने लगा, सीता तुमने मेरा अपमान कर दिया, मैं अभी तुम्हारा सिर काट कर फेंक सकता हूँ.

सीता तैं मम कृत अपमाना, कटिहयूँ तव सिर कठिन कृपाना

नहि त सपदि मानु मम बानी, सुमुखि होति न त जीवन हानि

क्या यह रावण का धैर्य था या फिर कोई और शक्ति उसे रोक रही थी?  बाल्मीकि रामायण में इस प्रसंग को विस्तार से वर्णित किया गया है. इस रामायण में रावण अपने एक सचिव महापार्श्व से सीता के बारे बात करते दिखाया गया है. यह सचिव रावण के बल और प्राक्रम से भली भाँति परिचित है. जब  महापार्श्व रावण को सीता के लिए तड़पता हुआ देखता है, तो वह रावण को सीता के साथ बलात् संबंध बनाने के लिए प्रेरित करता है.

बलात् कुक्कुटवृत्तेन प्रवर्तस्व महाबल।
आक्रम्याक्रम्य सीतां वै तां भुङ्क्ष्व च रमस्व च॥ ४॥

महाबली वीर रावण आप सीता के साथ बलात् संबंध कीजिए. बारम्बार आक्रामक व्यवहार कर, उसके साथ रमण कीजिए. आपको किसी का भय नहीं होना चाहिए.  इसके उत्तर में रावण महापार्श्व को एक रहस्य बताता है.

महापार्श्व निबोध त्वं रहस्यं किंचिदात्मनः।
चिरवृत्तं तदाख्यास्ये यदवाप्तं पुरा मया॥ १०॥

बहुत दिन हुए एक गुप्त घटना घटित हुई थी, उसके परिणाम स्वरूप मुझे एक श्राप मिला था. मैं उसी श्राप के डर के कारण कुछ नहीं कर पा रहा हूँ. आज मैं तुझे वह घटना सुनाता हूँ.  वह कहानी इस प्रकार है:

रावण महापार्श्व को बताता है कि, एक बार वह भ्रमण के लिए वन गया हुआ था. जब वहाँ वह विश्राम कर रहा था, तो वहाँ से पुंजिकस्थला नाम की एक बहुत सुंदर अप्सरा गुजर रही थी. वह अप्सरा, हमारे पितामह ब्रह्मा जी से मिलने जा रही थी. मुझे वहाँ देख, वह छुपने छुपाने लगी, ताकि मेरी नज़र उस पर न पड़े. उसका सौंदर्य अप्रतिम था. जब मैंने उसे छुपते छुपाते देखा, तो मेरी उत्सुकता और बढ़ गई. जैसे जैसे मैं उसे क़रीब से देखता गया, मेरी लालसा उसे पाने की और भी बढ़ने लगी. जैसे ही मैंने उसे पकड़ने का प्रयास किया, तो उसने उसका विरोध किया. लेकिन मेरी काम वासना, उस समय अपनी चरम सीमा पर थी. मैंने उसकी एक नहीं सुनी. जल्द ही मैंने, उसे अपने आलिंगन में ले, उसके साथ बलात् संबंध बनाए. वह मेरे सामने, एक असहाय अप्सरा, के समान विनती करती रही. लेकिन मैंने उसकी कोई बात नहीं सुनी. इस घटना के बाद वह सीधी पितामह ब्रह्मा जी के पास गई. एक दुखी और क्रोधित अप्सरा को देख, पितामह बहुत विचलित हुए. उस अप्सरा का चेहरा एक मुरझाए हुए कमल के समान मलिन लग रहा था.

ब्रह्मा जी ने जब पूँजिकास्थला के दुख का कारण पूछा, तो उसने रावण के साथ घटी पूरी घटना को अक्षरशः पितामह को बता दिया. ब्रह्मा जी यह सुन, बड़े ही क्रोधित हो उठे. उन्होंने अप्सरा को सांत्वना देते हुए कहा कि, बेटी तेरे साथ जो हुआ है, उसे तो ठीक नहीं कर सकता. लेकिन मैं अब कुछ ऐसा करने जा रहा हूँ कि, इसके बाद रावण किसी अन्य स्त्री में साथ ऐसा दुर्व्यवहार न कर सके. फिर उन्होंने हाथ में थोड़ा जल लेकर, रावण को एक श्राप दिया कि, अगर रावण किसी भी स्त्री को उसकी इच्छा के विरुद्ध छुएगा, तो उसके मस्तक के सौ टुकड़े  हो जाएँगे.  कुछ समय के बाद, इस श्राप का समाचार रावण तक पहुँच गया.

रावण यह सब सुनकर बहुत भयभीत हो उठा. रावण ने इस श्राप के रहस्य को गुप्त ही रखा. लेकिन मन ही मन, वह स्त्रियों से थोड़ा दूर रहने लगा. अगर किसी दासी पर उसका दिल आ भी जाता, तो पहले वह उन्हें कई प्रकार के क़ीमती पुरस्कारों से बहलाता फुसलाता. इस तरह उन्हें स्वेच्छा से अपने बस में कर, फिर प्रणय क्रीड़ा करता.

अब इसे सीता के प्रसंग में देखते हैं. सचिव महापार्श्व के फुसलाने पर, रावण जब उसे यह रहस्य बता, स्पष्ट करता है कि, उसे इस श्राप का भय हमेशा सताता रहता है. इसीलिए सीता का अपहरण कर, लँका में लाने के बाद, वह कई बार, सीता के सम्मुख गया. उसने सीता से मंदोदरी से भी बड़ी पटरानी बनाने का भी प्रस्ताव रखा. लेकिन माँ सीता, अपने पतिव्रत धर्म पर अडिग रहते, उसके हर प्रस्ताव को ठुकराती रही. सीता को न छूने के पीछे, उसका धैर्य कम और इस श्राप का भय अधिक हावी था. उसके भय का एक और कारण यह भी था कि, रावण भली भाँति जानता था कि, राम नर नहीं नारायण हैं. उनकी पत्नी के साथ छेड़ छाड़, बहुत बड़ा दंडनीय अपराध है. यह सब उसे केवल सीता के सम्मुख गिड़गिड़ाने के लिए मजबूर करता रहा. वह सीता को छूने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. और अंत में, उसे रामजी साथ युद्ध करके, अपना राज्य और सीता के मोह, दोनों को हारना पड़ा. यह था बाल्मीकि रामायण में छिपा एक रहस्य, जिसे सभी नहीं जानते. “ जय श्री राम”

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