
IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” — बिहार अध्याय
दूसरा पड़ाव — विष्णुपद मंदिर, गया
IndoUS Tribune की विशेष श्रृंखला “भारत के मंदिरों की यात्रा” के अंतर्गत हम बिहार की पावन और ऐतिहासिक धार्मिक यात्रा पर आगे बढ़ रहे हैं। महाबोधि मंदिर, बोधगया की दिव्य यात्रा के बाद अब हमारा दूसरा पड़ाव है — गया का प्रसिद्ध और अत्यंत पवित्र विष्णुपद मंदिर।
बिहार की यह भूमि केवल ज्ञान और तपस्या की धरती ही नहीं, बल्कि मोक्ष, पितृ श्रद्धा और सनातन परंपराओं का भी एक महान केंद्र रही है। गया स्थित विष्णुपद मंदिर हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक माना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है और यहाँ स्थित भगवान विष्णु के चरणचिह्न करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र हैं।
विष्णुपद मंदिर का महत्व
विष्णुपद मंदिर बिहार के गया शहर में फल्गु नदी के तट पर स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में काले पत्थर पर भगवान विष्णु के लगभग 40 सेंटीमीटर लंबे चरणचिह्न बने हुए हैं। इन्हें अत्यंत पवित्र माना जाता है।
मान्यता है कि भगवान विष्णु ने राक्षस गयासुर को दबाने के लिए अपने चरण उसके सीने पर रखे थे। उसी समय उनके चरणों का निशान इस पत्थर पर अंकित हो गया, जिसे आज “धर्मशिला” कहा जाता है।
गयासुर की पौराणिक कथा
पुराणों के अनुसार गयासुर नाम का एक राक्षस था, जिसने कठोर तपस्या करके भगवान विष्णु को प्रसन्न किया। भगवान ने उसे वरदान दिया कि जो भी उसे देखेगा या स्पर्श करेगा, उसे मोक्ष प्राप्त होगा।
इस वरदान के कारण लोग बिना अच्छे कर्म किए ही मोक्ष पाने लगे। इससे संसार का कर्म संतुलन बिगड़ने लगा। तब देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता मांगी।
भगवान विष्णु ने गयासुर से यज्ञ के लिए उसका शरीर मांगा। गयासुर सहमत हो गया और धरती पर लेट गया। तब भगवान विष्णु ने उसके सीने पर अपना पैर रखकर उसे धरती के नीचे दबा दिया।
गयासुर ने अंतिम इच्छा व्यक्त की कि इस स्थान का नाम उसके नाम पर रखा जाए और यहाँ पितरों के श्राद्ध एवं पिंडदान करने से आत्माओं को मोक्ष प्राप्त हो। तभी से यह स्थान “गया” कहलाया और पिंडदान का सबसे बड़ा तीर्थ बन गया।
पिंडदान और पितृ तर्पण का केंद्र
विष्णुपद मंदिर पूरे विश्व में पिंडदान और श्राद्ध कर्म के सबसे प्रमुख स्थान के रूप में जाना जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार यहाँ अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान करने से उनकी आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है।
हर वर्ष पितृपक्ष के दौरान लाखों श्रद्धालु गया पहुँचते हैं और फल्गु नदी के तट पर अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं।
मंदिर में पूजा और धार्मिक अनुष्ठान कराने वाले पारंपरिक पुरोहित “गयावाल पंडा” कहलाते हैं, जिनकी परंपरा सदियों पुरानी है।
मंदिर की वास्तुकला
वर्तमान विष्णुपद मंदिर का निर्माण 1787 में इंदौर की महान महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने करवाया था। मंदिर नागर शैली में बना हुआ है और इसकी ऊँचाई लगभग 100 फीट है।
मंदिर विशाल काले ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित है। गर्भगृह अष्टकोणीय आकार का है और उसके मध्य में भगवान विष्णु के चरणचिह्न स्थित हैं, जिन्हें चांदी से घेरा गया है।
मंदिर परिसर में कई छोटे-छोटे मंदिर, स्तंभ, प्राचीन मूर्तियाँ और एक पवित्र वटवृक्ष “अक्षयवट” भी स्थित है। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से पितरों को अक्षय शांति प्राप्त होती है।
फल्गु नदी और सीता माता की कथा
फल्गु नदी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा रामायण में भी मिलती है। कहा जाता है कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण राजा दशरथ का पिंडदान करने गया आए थे।
जब राम और लक्ष्मण सामग्री लेने गए, तब पितरों का समय समाप्त होने वाला था। तब माता सीता ने स्वयं फल्गु नदी के किनारे पिंडदान किया। बाद में जब प्रमाण मांगा गया, तो केवल अक्षयवट वृक्ष ने सत्य का साथ दिया।
माता सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया कि वह अधिकांश समय सूखी रहेगी। आज भी फल्गु नदी अधिकतर समय रेत से भरी दिखाई देती है।
आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र
विष्णुपद मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि गहरी आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु शांति, भक्ति और आत्मिक संतोष का अनुभव करते हैं।
मंदिर परिसर में भगवान विष्णु, शिव, देवी माँ, हनुमानजी और अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी स्थित हैं। यहाँ की प्राचीन मूर्तियाँ और धार्मिक वातावरण श्रद्धालुओं को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा से जोड़ते हैं।
समापन
गया का विष्णुपद मंदिर भारत की प्राचीन आस्था, पितृ श्रद्धा और मोक्ष परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है। यह मंदिर हमें यह संदेश देता है कि भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान, कर्तव्य और आध्यात्मिक चेतना का भी महान मार्ग है।
IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” का बिहार अध्याय हमें लगातार भारत की अद्भुत धार्मिक विरासत और आध्यात्मिक शक्ति से परिचित करा रहा है।
अब हमारी यह पावन यात्रा आगे बढ़ेगी बिहार के कैमूर जिले स्थित प्राचीन और रहस्यमयी मुंडेश्वरी देवी मंदिर की ओर, जिसे भारत के सबसे पुराने जीवित मंदिरों में से एक माना जाता है। वहाँ हम देवी शक्ति, प्राचीन स्थापत्य कला और सनातन परंपरा के एक और अद्भुत अध्याय से परिचित होंगे।