बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: सगर के साठ हज़ार पुत्रों की उत्पत्ति और विनाश

बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: सगर के साठ हज़ार पुत्रों की उत्पत्ति और विनाश

By: Rajendra Kapil

रामजी के रघुकुल में, इश्वाकु और रघु वंश की परम्परा में, एक महान राजा हुए थे. जिनका नाम था, महाराज सगर. उनकी कथा वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में मिलती है. उन्हें साठ हज़ार पुत्रों का आशीर्वाद मिला था. यहाँ हम उसी कहानी का विस्तार से उल्लेख करेंगे.

महाराज सगर की दो रानियाँ थी, लेकिन कोई संतान नहीं थी. एक रानी का नाम था, केशिनी और दूसरी का नाम था सुमति. महाराज सगर को पुत्र की बड़ी अभिलाषा थी. ऐसी दशा में उन्होंने प्रभु से प्रार्थना करनी आरंभ की. वह अपनी दोनों रानियों सहित, हिमालय के घने वनों में, तपस्या करने चले गए. घोर तपस्या के बाद, एक दिन उनके सम्मुख, भृगु ऋषि प्रगट हुए.  

अथ वर्षशते पूर्णे तपसाराधितो मुनिः । सगराय वरं प्रादाद्भृगुः सत्यवतां वरः ।। 1.38.6 ।।

सगर परिवार की तपस्या से प्रसन्न, ऋषि ने वर माँगने को कहा. फिर क्या था, अंधा क्या चाहे दो आँखें? राजा सगर ने पुत्र प्राप्ति की अभिलाषा प्रगट की. ऋषि ने प्रसन्न हो कर कहा राजन, तुम्हें एक नहीं, हज़ारों पुत्रों का योग है. फिर उन्होंने दोनों रानियों की तरफ़ देखा, और बोले, तुममें से एक को एक पुत्र होगा और दूसरी को साठ हज़ार पुत्रों की प्राप्ति होगी. चुनना तुम्हें होगा, कि किसे एक पुत्र चाहिए और किसे हज़ारों?

 एका जनयिता तात पुत्रं वंशकरं तव । षष्टिं पुत्रसहस्राणि अपरा जनयिष्यति ।। 1.38.8 ।।

महाराज सगर की उत्सुकता बढ़ गई. उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया. और फिर ऋषिवर के सामने जा खड़े हुए. रानी केशिनी ने केवल एक पुत्र की कामना की और महारानी सुमति ने हज़ारों पुत्रों कामना सामने रखी.

कुछ समय व्यतीत होने के बाद, दोनों रानियों गर्भवती हुई. केशिनी को असमंजस नाम का एक बेटा हुआ और रानी सुमति ने, एक तूँबी के आकार के, एक पिंड को जन्म दिया. पिण्ड जन्म के कुछ क्षणों के बाद, साठ हज़ार टुकड़ों में बँट गया. 

घृतपूर्णेषु कुम्भेषु धात्र्यस्तान् समवर्द्धयन् ।कालेन महता सर्वे यौवनं प्रतिपेदिरे ।। 1.38.18 ।।

उन टुकड़ों को घी के घड़ों में डाल कर पाला गया. जिनमे से कुछ समय बाद सुंदर राजकुमारों का जन्म हुआ.

जब पुत्र युवा हो गए तो राजा सगर के मन में एक अश्वमेध यज्ञ का विचार आया. विचार आते ही, गुरुओं के आशीर्वाद से, यज्ञ की तैयारी आरम्भ कर दी गई. अश्वमेध यज्ञ में एक अश्व बाहर घुमाया जाता है कि, अगर राजा की प्रजा में से, अगर किसी को कोई शिकायत हो तो, वह अश्व को रोक कर, अपना विरोध प्रगट कर सकता था. बस फिर क्या था, देवताओं को अपनी सत्ता ख़तरे में नज़र आयी, तो इन्द्र ने उस अश्व को रोक कर, कहीं छुपा दिया. महाराजा सगर परेशान हो उठे. पुरोहितों ने अश्व खोज का आदेश दे दिया. महाराज सगर ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को कहा, की धरती का कोना कोना छान मारो और अश्व को ढूँढ कर लाओ.

पिता का आदेश सुन, सगर पुत्र धरती की चारों दिशाओं में फैल गए. जहां कोई मिलता, उसे मार पीट कर पूछते. रास्ते में कोई जीव जन्तु बाधा डालता, तो उसे भी समाप्त कर देते. चारों दिशाओं में, त्राहि त्राहि मच गई. फिर भी अश्व नहीं मिला. निराश वापस अपने घर लौटे, तो पिता क्रोधित हो गए. तुम लोग इतने सारे, और एक छोटा सा काम नहीं कर पाए. पिता की डाँट खाकर पुत्र, क्रोधित भाव से, सगर पुत्र फिर खोज के लिए निकल पड़े. 

तस्य कोपाग्निना दग्धा भविष्यन्ति नृपात्मजाः ।। 1.40.2 ।।

सगर पुत्रों का विनाश:

सगर पुत्रों के अत्याचार से जब देवता गण परेशान हुए, तो सीधा पितामह ब्रह्मा जी के पास, सहायता माँगने पहुँचे. ब्रह्मा जी ने बतलाया कि, इस समय भगवान विष्णु कपिल मुनि के अवतार में प्रगट हो, धरती पर निवास कर रहे हैं. वही तुम्हारी सहायता कर पायेंगे. देवताओं ने कपिल मुनि का आश्रम ढूँढ कर, अश्व को वहाँ छोड़ दिया.

इधर सगर पुत्र जब क्रोधित हो, अश्व को ढूँढ रहे थे, तो उन्हें देवताओं का भेजा एक तेजस्वी पुरुष मिला, जिसने बताया कि, अश्व कपिल मुनि के आश्रम के पास चर रहा है. उसने उन्हें पूर्वोत्तर दिशा में जाने की सलाह दी. जब वे सब, वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने वहाँ कपिल मुनि को एक यज्ञ करते देखा. पास ही अश्व को भी चरते देखा. 

ते तु सर्वे महात्मानो भीमवेगा महाबलाः ।ददृशुः कपिलं तत्र वासुदेवं सनातनम् ।। 1.40.24 ।।

हयं च तस्य देवस्य चरन्तमविदूरतः ।प्रहर्षमतुलं प्राप्ताः सर्वे ते रघुनन्दन ।। 1.40.25 ।।

सगर पुत्रों को लगा यही वह मुनि है, जो उनके पिता के यज्ञ में विघ्न डाल रहा है. यह विचार आते ही वह कपिल मुनि को, भला बुरा कहने लगे. मुनि के समझाने पर भी जब सगर पुत्र शान्त नहीं हुए, तो कपिल मुनि को क्रोध आ गया.

तेषां कपिलो रघुनन्दन ।  रोषेण महता ऽ ऽविष्टो हुङ्कारमकरोत्तदा ।। 1.40.28 ।।

इधर सगर पुत्रों का अभद्र व्यवहार बढ़ता ही गया. ऐसे में, कपिल मुनि ने सगर पुत्रों को तुरन्त भस्म होने का श्राप दे डाला. बस फिर क्या था, सगर के साठ हज़ार पुत्र, एक ही क्षण में भस्म हो कर, राख हो गए. और इस प्रकार उनका युवावस्था में ही विनाश हो गया.

जब राजा सगर को अपने पुत्रों की मृत्यु का समाचार मिला, तो बड़े दुखी हुए. लेकिन उन्हें पता था कि, कपिल मुनि अनावश्यक क्रोधित नहीं होंगे. ऐसे में उन्होंने अपने बड़े समझदार एवं विनम्र स्वभाव वाले, प्रपोत्र अंशुमान को कपिल मुनि के आश्रम पर भेजा. अंशुमान ने कपिल मुनि के आश्रम पहुँच, बड़े आदर सत्कार के साथ ऋषि का अभिवादन किया. और अपने आने का उद्देश्य बताया.

कपिलेनाप्रमेयेन दग्धा हीमे महाबलाः ।सलिलं नार्हसि प्राज्ञ दातुमेषां हि लौकिकम् ।। 1.41.18 ।।

अंशुमान ने अपने चाचों को तिलांजलि अर्पित करती चाही, लेकिन ऋषिवर ने समझाया कि, उसकी आवश्कता नहीं है. सगर पुत्रों ने काफ़ी उत्पात मचा रखा था, इसीलिए उनका मरना समाज के लिए एक मंगलमय घटना थी.  कपिल मुनि ने, अंशुमान को अश्व ले जाने की अनुमति दी और कहा, इसे ले जाओ और अपने दादा जी के यज्ञ को पूर्णाहुति देने में सहायता करो. इसी में सबका मंगल है. 

गच्छ चाश्वं महाभाग तं गृह्य पुरुषर्षभ ।यज्ञं पैतामहं वीर संवर्तयितुमर्हसि ।। 1.41.21 ।।

इस प्रकार इस महान कथा का सुखद अन्त हुआ. इसीलिए यह कथा विश्व प्रसिद्ध हो गई. इस कहानी से यह सीख मिलती है कि, कोई भी काम सोचे समझे बिना नहीं करना चाहिए, नहीं तो उससे मंगल की बजाय अमंगल हो सकता है.  “जय श्री राम”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *