IndoUS Tribune की भारत के मंदिरों की यात्रा — छत्तीसगढ़ अध्याय (चौथा पड़ाव)

IndoUS Tribune की भारत के मंदिरों की यात्रा — छत्तीसगढ़ अध्याय (चौथा पड़ाव)

राजीव लोचन मंदिर, राजिम — छत्तीसगढ़ का प्रयाग और भगवान विष्णु का दिव्य धाम

IndoUS Tribune की विशेष श्रृंखला “भारत के मंदिरों की यात्रा” के अंतर्गत हम आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, असम और बिहार के अनेक दिव्य, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक मंदिरों की यात्रा पूर्ण कर चुके हैं। इन यात्राओं ने हमें भारत की अद्भुत सांस्कृतिक विविधता, प्राचीन परंपराओं, लोक आस्थाओं और सनातन विरासत की गहराई को समझने का अवसर प्रदान किया है।

अब हमारी यह पावन यात्रा छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक भूमि पर आगे बढ़ रही है। इस अध्याय में हमने प्रथम पड़ाव पर माँ दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा के दिव्य शक्तिपीठ के दर्शन किए, दूसरे पड़ाव पर भोरमदेव मंदिर, कबीरधाम की अद्भुत नागर शैली की स्थापत्य कला का अवलोकन किया और तीसरे पड़ाव पर डोंगरगढ़ स्थित माँ बम्लेश्वरी मंदिर में शक्ति उपासना और प्रकृति के अनुपम संगम का अनुभव किया। अब IndoUS Tribune की यह आध्यात्मिक यात्रा अपने चौथे पड़ाव पर पहुँच चुकी है—राजिम स्थित प्राचीन श्री राजीव लोचन मंदिर, जहाँ भगवान विष्णु के कमलनयन स्वरूप की आराधना, त्रिवेणी संगम की पवित्रता और हजारों वर्षों की धार्मिक विरासत आज भी जीवंत दिखाई देती है।

छत्तीसगढ़ का प्रयाग — त्रिवेणी संगम पर स्थित दिव्य धाम

राजिम, महानदी, पैरी और सोंढूर नदियों के पवित्र त्रिवेणी संगम पर स्थित है। तीन पवित्र नदियों के इस संगम के कारण इसे श्रद्धापूर्वक “छत्तीसगढ़ का प्रयाग” कहा जाता है। इसी पावन भूमि पर स्थित है आठवीं शताब्दी का राजीव लोचन मंदिर, जो भगवान विष्णु के “राजीव लोचन” अर्थात् कमल के समान सुंदर नेत्रों वाले स्वरूप को समर्पित है। सदियों से यह मंदिर वैष्णव श्रद्धालुओं का प्रमुख तीर्थ रहा है और जगन्नाथ पुरी धाम की यात्रा करने वाले भक्तों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है।

इतिहास के पन्नों में अंकित गौरवशाली विरासत

मंदिर परिसर में प्राप्त प्राचीन शिलालेख बताते हैं कि इसका निर्माण नल वंश के राजा विलासतुंग ने सातवीं-आठवीं शताब्दी के दौरान अपने पुत्र की स्मृति में कराया था। बाद में सोमवंशी तथा कलचुरी शासकों ने भी मंदिर के विस्तार और संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1145 ईस्वी के एक अभिलेख में कलचुरी सामंत जगपालदेव द्वारा कराए गए निर्माण कार्यों का उल्लेख मिलता है।

कुछ इतिहासकार इसकी मूल संरचना को पाँचवीं शताब्दी तक पुराना मानते हैं, जबकि अधिकांश विद्वान इसे सातवीं और आठवीं शताब्दी के बीच निर्मित मानते हैं। समय-समय पर हुए जीर्णोद्धार के कारण यह मंदिर आज भी अपनी भव्यता और प्राचीन स्वरूप को सुरक्षित रखे हुए है।

पंचायतन शैली की अनुपम स्थापत्य कला

राजीव लोचन मंदिर भारतीय मंदिर वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण है। यह पंचायतन शैली में निर्मित है, जिसमें मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार उपमंदिर स्थापित हैं। ये भगवान विष्णु के नृसिंह, वामन, वराह और बद्रीनाथ स्वरूपों को समर्पित हैं।

ऊँचे चबूतरे पर निर्मित मंदिर में विशाल मंडप, अंतराल और गर्भगृह है। गर्भगृह के ऊपर स्थित पिरामिडाकार शिखर बिहार के प्रसिद्ध महाबोधि मंदिर की स्थापत्य शैली से साम्य रखता है। मंदिर के अलंकृत द्वार, स्तंभ और दीवारों पर भगवान विष्णु, लक्ष्मी, शिव, गंगा, यमुना, दुर्गा, वराह, नृसिंह तथा अनेक देवी-देवताओं और पौराणिक पात्रों की अद्भुत नक्काशी भारतीय शिल्पकला की उच्चतम परंपरा का परिचय देती है।

विशेष बात यह भी है कि मंदिर परिसर में भगवान बुद्ध की एक प्राचीन प्रतिमा भी स्थापित है, जो उस युग में विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व और सांस्कृतिक समन्वय का प्रतीक मानी जाती है।

भगवान राजीव लोचन की दिव्य कथा

इस मंदिर से अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। एक मान्यता के अनुसार इसका निर्माण स्वयं देवशिल्पी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। दूसरी कथा के अनुसार पौराणिक राजा जगतपाल ने इस भव्य मंदिर का निर्माण एक ही रात में करा दिया।

सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान विष्णु के परम भक्त रत्नाकर से संबंधित है। कहा जाता है कि रत्नाकर ने वर्षों तक भगवान विष्णु की कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु राजीव लोचन स्वरूप में प्रकट हुए। जब भगवान ने वरदान माँगने को कहा तो रत्नाकर ने प्रार्थना की कि प्रभु सदैव इसी स्वरूप में इस स्थान पर विराजमान रहें। तभी से यह स्थान राजीव लोचन धाम के रूप में प्रसिद्ध हो गया।

राजिम कुंभ — छत्तीसगढ़ का आध्यात्मिक महोत्सव

त्रिवेणी संगम के कारण राजिम केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ का प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र है। प्रत्येक वर्ष माघ पूर्णिमा से प्रारंभ होने वाला राजिम कुंभ (राजिम कल्प) राज्य के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक है। इस अवसर पर देशभर से हजारों साधु-संत, श्रद्धालु और पर्यटक यहाँ एकत्र होकर संगम में पवित्र स्नान करते हैं तथा भगवान राजीव लोचन के दर्शन कर आध्यात्मिक पुण्य प्राप्त करते हैं।

सनातन संस्कृति की अमूल्य धरोहर

राजीव लोचन मंदिर केवल भगवान विष्णु का प्राचीन मंदिर ही नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी धार्मिक परंपरा, स्थापत्य कला, सांस्कृतिक समन्वय और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत प्रतीक है। इसकी भव्य मूर्तिकला, ऐतिहासिक अभिलेख, त्रिवेणी संगम का दिव्य वातावरण और राजिम कुंभ की परंपरा इसे छत्तीसगढ़ के सबसे महत्वपूर्ण वैष्णव तीर्थों में स्थान दिलाती है।

यात्रा आगे बढ़ती है…

IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा — छत्तीसगढ़ अध्याय” का यह चौथा पड़ाव हमें यह अनुभव कराता है कि छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक विरासत केवल शक्ति उपासना तक सीमित नहीं है, बल्कि यहाँ वैष्णव, शैव और शाक्त परंपराओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। राजिम का राजीव लोचन मंदिर हमें इतिहास, आस्था, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक समृद्धि का ऐसा दर्शन कराता है जो सदियों से भारत की सनातन परंपरा को जीवंत बनाए हुए है।

माँ दंतेश्वरी की शक्ति, भोरमदेव की अद्भुत स्थापत्य विरासत, माँ बम्लेश्वरी की दिव्य आराधना और अब राजिम के भगवान राजीव लोचन के दर्शन के साथ हमारी यह आध्यात्मिक यात्रा एक और महत्वपूर्ण पड़ाव पूर्ण करती है।

अब IndoUS Tribune की यह पावन यात्रा आगे बढ़ेगी अपने पाँचवें पड़ाव की ओर—महादेव मंदिर, देवबलोदा, जहाँ भगवान शिव की प्राचीन आराधना, उत्कृष्ट शिल्पकला और छत्तीसगढ़ की समृद्ध शैव परंपरा की एक नई और प्रेरणादायक गाथा हमारा इंतजार कर रही है।

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