
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: सीताजी ने रामजी को अहिंसा का उपदेश क्यों दिया?
By: Rajendra Kapil
रामजी और सीताजी के मधुर सम्बंधों के बारे में महाकाव्य भरे पड़े हैं. हर ग्रन्थ में सीता जी को रामजी की पतिव्रता अनुगामिनी के रूप में दर्शाया गया है. रामचरितमानस में सीता के रूप शील और सुकोमलता की बढ़ चढ़ कर प्रशंसा की गई है. जब रामजी ने पहली बार सीताजी को जनक की वाटिका में देखा तो एकटक देखते ही रह गए. उनके मुँह से एक शब्द नहीं निकला. तुलसी बाबा भी बस इतना ही लिख पाए:
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि, क़हत राम लखन सन रामु हृदय गुनि
मानहु मदन दुंदुंभी दीन्ही, मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही
सीता जी की पायल की मीठी ध्वनि सुन, रामजी के मन में प्रेम की टीस जाग उठी. लखन से मन का भाव कहने लगे. और फिर अपने आप को टटोला. मेरे मन में तो ऐसा विचार कभी आया ही नहीं. यह आज क्या हो रह रहा है? रघुकुल की मर्यादा याद हो आयी:
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ, मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ
रघुवंशी सहज रूप से कभी कुपथ पर पैर नहीं रखते. और मैं यूँहि बहका जा रहा हूँ. सीता जी की भी हालत कुछ कम नहीं थी. रामजी का सौंदर्य देख:
स्याम गौर किमि कहूँ बखानी, गिरा अनयन नयन बिनु बानी
इतना मोहक सौंदर्य कि, जीभ के पास आँखें नहीं हैं, और आँखों के पास वाणी नहीं है. जो देखा जा रहा है, वह वर्णन करना असम्भव है. ऐसा था, राम सीता का प्रथम मिलन, जो स्वयंवर के बाद, विवाह के पवित्र बन्धन में बँध गया.
विवाह के बाद अयोध्या आकर सीता जी बड़े सयंम और मर्यादा के साथ ससुराल में रहने लगी. उन पर रामजी की रानी होने का गौरव भार आ पड़ा, जिसे उन्होंने बड़े प्रेम से निभाया. फिर वह दुर्भाग्य की घड़ी आ पहुँची, जब राजा दशरथ को रामजी के लिए, वनवास का आदेश सुनाना पड़ा. और पूरी अयोध्या शोक सागर में डूब गई.
यह प्रसंग रामचरित मानस और वाल्मीकि रामायण में लगभग समान रूप से है. लेकिन इसके आगे कि कथा, वाल्मीकि रामायण में थोड़ा अलग रूप से है. जब रामजी लक्ष्मण और सीता के साथ वनों में घूम रहे थे, तो उनका सामना बहुत सारे राक्षसों से हुआ. कुछ तो वाक़ई दुष्ट एवं निर्दयी थे, जिन्होंने ऋषियों मुनियों को तंग कर रखा था. लेकिन कुछ उनके साथ निर्दोष भी थे, जो दुष्टों के साथ होने के कारण मारे जाते थे. यह देख सीता जी का हृदय एक दिन इतना द्रवित हो गया. निर्दोषों का वध देख, वह बहुत विचलित हो गई. उन्होंने इस बारे में, रामजी से बात करने की सोची. यहाँ सीता जी का एक ऐसा रूप सामने आता है, जो दूसरों के दुख: से जल्दी पिघल जाती हैं. ऋषि वाल्मीकि ने, सीता के इसी रूप को अरण्यकाण्ड के नौवें सर्ग में चित्रित किया है. यहाँ सीता एक पत्नी नहीं, बल्कि एक उपदेशक के रूप में उभर कर आती है. और रामजी को अहिंसा पर एक अच्छा ख़ासा उपदेश दे डालती हैं. यह लेख सीता जी इसी रूप को उजागर करने का एक छोटा सा प्रयास है.
अधर्मम् तु सुसूक्ष्मेण विधिना प्राप्यते महान् |
निवृत्तेन च शक्यो अयम् व्यसनात् कामजाद् इह || ३-९-२
त्रीणि एव व्यसनानि अत्र कामजानि भवन्ति उत |
मिथ्या वाक्यम् तु परमम् तस्मात् गुरुतरा उभौ || ३-९-३
पर दार अभिगमनम् विना वैरम् च रौद्रता |
मिथ्या वाक्यम् न ते भूतम् न भविष्यति राघव || ३-९-४
एक दिन सीता जी रामजी के पास बैठी थी, तो उन्हें बड़े विनम्र भाव से कहने लगी. हे आर्यपुत्र, आप एक महान पुरुष हैं. काम वासनायों से उपजे विकारों एवं व्यसनों से रहित हैं. लेकिन जिन राक्षसों के वध के काम में आप लगे हुए हैं, वह आपको परोक्ष रूप से, अधर्म की ओर ले जा रहा है. फिर वह और भी गम्भीरता से समझाती है कि, इस जगत में काम वासना से तीन व्यसन उपजते हैं. पहला मिथ्या भाषण अर्थात् झूठ बोलना. आम लोग अपने अपने स्वार्थों को साधने के लिए अक्सर झूठ बोला करते हैं. दूसरा व्यसन है, परस्त्री गमन. और तीसरा व्यसन है, किसी के साथ बिना किसी वैर के क्रूरता पूर्ण व्यवहार करना. मैं भली भाँति जानती हूँ कि, आप कभी मिथ्या नहीं बोलते. पर स्त्री गमन की अभिलाषा आप जैसे संयमी में हो ही नहीं सकती. धर्म को नाश करती वाली यह कुत्सित इच्छा न आप में है और न ही कभी होगी. आप जैसा मर्यादा पुरुष इस संसार में दूसरा कोई और नहीं है. आप केवल एक पत्नीव्रती यानि मुझ में अनुरक्त रहने वाले, एक धर्म निष्ठ एवं सत्य प्रतिज्ञ पुरुष हैं, इसीलिए मैं आपका बहुत आदर करती हूँ.
तृतीयम् यद् इदम् रौद्रम् पर प्राण अभिहिंसनम् |
निर्वैरम् क्रियते मोहात् तत् च ते समुपस्थितम् || ३-९-९
परंतु दूसरों के प्राण हरने का जो कार्य आपके सम्मुख उपस्थित है, जिसे आप भाई लक्ष्मण के साथ मिल कर इस दण्डकारण्य में कर रहे हो, उसे देख मेरा चित्त बहुत व्याकुल होता है. मैं आपके इस कृत्य के बारे में निरंतर सोचती रहती हूँ. फिर आपके कल्याण के बारे सोच कर मुझे डर लगता है, आपका इस तरह प्रतिदिन अहिंसा करना मुझे बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगता.
स्नेहात् च बहुमानात् च स्मारये त्वाम् न शिक्षये |
न कथंचन सा कार्या गृहीत धनुषा त्वया || ३-९-२४
बुद्धिः वैरम् विना हन्तुम् राक्षसान् दण्डक आश्रितान् |
अपराधम् विना हन्तुम् लोको वीर न कामये || ३-९-२५
मेरे मन में आपके प्रति जो स्नेह एवं आदर है, उसी को मध्य नज़र रखते हुए, आपसे विनती करती हूँ कि, आप सब राक्षसों से वैर न करें. और उनकी निरपराध अहिंसा न करें.
क्व च शस्त्रम् क्व च वनम् क्व च क्षात्रम् तपः क्व च |
व्याविद्धम् इदम् अस्माभिः देश धर्मः तु पूज्यताम् || ३-९-२७
कहाँ शस्त्र धारण? और कहाँ वनवास? कहाँ क्षत्रिय का कठोर कर्म और कहाँ प्राणियों पर दया और करुणा? यह दोनों विरोधी जान पड़ते हैं. कृपया आप मेरी इस बातों पर ध्यान देकर, इस हिंसामय कर्म को जितना कम हो सके उतना कम कर दीजिए.
स्त्री चापलात् एतत् उदाहृतम् मे धर्मम् च वक्तुम् तव कः समर्थः |
विचार्य बुद्ध्या तु सह अनुजेन, यत् रोचते तत् कुरु म अचिरेण || ३-९-३३
मैंने अपने नारीगत चपल स्वभाव के कारण आपको यह उपदेश दिया है. आप अपने भाई के साथ मिलकर, इस पर गम्भीरता से विचार करें, और उसके बाद आपको जो भी उचित लगे, वही करें. रामजी ने सीताजी की बातों को बड़ी गम्भीरता से सुना. कुछ देर विचार करने के बाद बोले.
हितम् उक्तम् त्वया देवि स्निग्धया सदृशम् वचः |
कुलम् व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनक आत्मजे || ४-१०-२
रामजी बोले हे देवी, तुम्हारा मुझ पर अत्यधिक स्नेह है, इसीलिए तुमने मुझे अहिंसा का अपना सुझाव दिया. तुमने अपने संवाद में मेरे हित की बात कही, जो मुझे अच्छी लगी. मैं तुम्हारी इन भावनाओं का आदर करता हूँ. लेकिन एक बात तुम भली भाँति जानती हो कि, हम क्षत्रियों का सबसे बड़ा धर्म होता है, निस्सहाय और कष्ट में पड़े प्राणियों की सहायता करना. यदि कोई भी संकट में हो या किसी दुःख से घिरा हो तो, उनकी रक्षा करना.
ते च आर्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशित व्रताः |
माम् सीते स्वयम् आगम्य शरण्याः शरणम् गताः || ४-१०-४
इस वन में बहुत सारे ऋषि मुनि बड़े शान्त भाव से रह कर तपस्या करते हैं. वह किसी को तंग नहीं करते, केवल शांति से जीना चाहते हैं. यह राक्षस लोग प्रतिदिन उनकी दिनचर्या में विघ्न डालने आ जाते हैं. कई बार तो उन्हें मार कर, उन्हें अपना आहार भी बना लेते हैं. यह ऋषि गण मेरे पास शरणागत के रूप में आकर सहायता की माँग करने लगे. तो ऐसे में, मेरा यह धर्म बन जाता है कि, मैं इनकी सहायता करूँ. मेरा यह विरुद है कि, मैं शरणागत को कभी ठुकराता नहीं हूँ.
सरनागत कहूँ जे तज़ाहि निज हित अनहित अनुमानि
ते नर पाँवर पापमय, तिन्हहि बिलोक़त हानि
आज भी मेरी यही स्थिति है. मैं इनसे प्रतिज्ञा कर चुका हूँ कि, मैं इनकी रक्षा करूँगा. अब मैं अपनी इस प्रतिज्ञा से पलट नहीं सकता. रघुवंशी अपने वचन के बड़े पक्के होते हैं-
रघुकुल रीति सदा चली आई, प्रान जाहि पर वचन न जाहि
इस कार्य को करते यदि मैं पाप का भागी भी बनता हूँ, तो वह मुझे स्वीकार है. उस पाप का दण्ड भोगने के लिए भी तत्पर हूँ.
संश्रुत्य न च शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् || ४-१०-१७
मुनीनाम् अन्यथा कर्तुम् सत्यम् इष्टम् हि मे सदा |
मैं इन राक्षसों का विनाश कर के ही रहूँगा. अपनी प्रतिज्ञा और वचन से पीछे नहीं हट् सकता. क्योंकि सत्य का पक्ष लेना मुझे अत्यंत प्रिय है. लेकिन तुमने अपने प्रेम एवं आदरवश जो भी कहा, मैं उसका सम्मान करता हूँ. तुम मिथिलेश कुमारी हो, इसलिए तुम्हें इस तरह का परामर्श देना शोभा देता है. मेरे अंग संग रह कर, जो तुम मुझे सदमार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती रहती हो, उसके लिए मैं तुम्हारा आभार प्रगट करता हूँ.
यह थी रामजी और सीता जी एक प्रेम भारी वार्ता, जिसमें दोनों ने अपना अपना पक्ष बड़ी सुदृढ़ता से एक दूसरे के सामने रखा. दोनों ने एक दूसरे के भावों को समझने का प्रयास किया. यह आज के किसी भी विवाहित युगल के लिए एक उदाहरण रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है. “जय श्री राम “