
महाभारत की महान गाथा: शान्तनु और गंगा की कहानी – (१)
आज से हम महाभारत की महान गाथा आरम्भ करने जा रहे हैं. महाभारत जैसा की नाम में ही निहित है, एक महान भारत की कहानी है. यह उस भरत वंश की संतानों की कहानी है, जोकि दुष्यन्त और शकुन्तला के पुत्र थे. उन्हीं के नाम पर हमारा देश भारत कहलाया. यह एक ऐसे देश के इतिहास की कहानी है, जिसमें भीष्म जैसे महानायक पैदा हुए. यह एक ऐसे परिवार की कहानी है, जिसमें परिवारों में केवल प्रेम ही नहीं, बल्कि आम परिवारों की तरह कलह और द्वेष भी था. इसमें एक अन्धे राजा रानी का अपनी सन्तान के प्रति अन्धामोह भी है. इसमें भगवान कृष्ण भी हैं और विदुर जैसे निष्पक्ष ज्ञानी भी हैं. यहाँ कृष्ण जैसे समृद्ध राजा भी है, तो सुदामा जैसे गरीब ब्राह्मण भी हैं. और साथ ही है, उनकी अद्भुत मित्रता, जिसका दूसरा कोई उदाहरण नहीं मिलता. इसमें पारिवारिक दुश्मनी की चरम सीमा भी नज़र आती है, तो करण का अपने मित्र के प्रति बिना किसी शर्त पर आधारित, एक अतुलनीय पूर्ण समर्पण भी, दिखाई पड़ता है. इसमें जुआ भी है, स्त्री को दाँव पर लगा हार जाने की लज्जा जनक कथा भी है. इसमें अतुलनीय योद्धा भी हैं, तो इसमें लाचार और हारे हुए पति भी हैं, जो सबको कुछ होने पर भी, हार की विवशता से कमजोर, सिर पर हाथ धरे दिखाई पड़ते हैं.
यह एक ऐसे अर्जुन की कहानी है, जो विश्व का सबसे बलशाली धनुर्धारी होने के बावजूद, युद्ध से इंकार कर देता है. तो इसमें उसका एक सकुशल सारथी (कृष्ण) भी है, जिसने न केवल अर्जुन के घोड़ों की लगाम सँभाली, बल्कि मानवता के मन के निराश घोड़ों की, लगाम भी सँभाली. यह कहानी विश्व के सबसे सुसंस्कृत देश भारत की है, जिसने विश्व को मर्यादित ढंग से जीवन जीना सिखाया. पारिवारिक कलह में भी, किस तरह सन्तुलन बनाया जा सकता है, यह कला भारत के गौरवशाली इतिहास ने, विश्व के सम्मुख एक उदाहरण के रूप में रखी.
आख़िर यह कहानी कहाँ से आरम्भ हुई? यह कहानी शान्तनु और गंगा की प्रेम कहानी से आरम्भ होती है. हस्तिनापुर का राजा शान्तनु एक दिन शिकार के लिए निकला, तो उसे एक गंगा नदी के किनारे एक अप्सरा जैसी सुंदर स्त्री, जिसका नाम भी गंगा था, दिखाई पड़ी. राजा अपनी सुध बुध भूल बैठा. शान्तनु उसके सौंदर्य पर मोहित हो गया. वास्तव में गंगा ब्रह्मलोक की एक बेटी थी, जो एक शापवश, धरती पर विचरण कर रही थी. राजा शान्तनु से जब रहा नहीं गया, तो वह गंगा के समीप जा, अपना प्रेम निवेदन करने लगे. गंगा को भी शान्तनु पसन्द आ गए.
थोड़ी देर बातचीत के बाद, शान्तनु ने गंगा के सम्मुख विवाह का प्रस्ताव रख दिया. गंगा ने प्रस्ताव स्वीकार करते समय, एक शर्त सामने रख दी. शर्त यह थी कि, विवाह के बाद, गंगा जो भी करेगी, उस पर शान्तनु, कभी प्रश्न नहीं उठायेंगे. शान्तनु को यह शर्त बड़ी साधारण लगी. गंगा ने यह भी जोड़ दिया कि, जिस दिन शान्तनु उसे किसी काम करने से रोक देंगे, ठीक उसी दिन, वह उन्हें छोड़ कर चली जाएगी. शान्तनु प्रेम में इतने डूबे हुए थे कि, उन्होंने थोड़ा विचार कर, हर शर्त की स्वीकृति दे दी. इसके बाद वह गंगा को अपने साथ महल में ले आए और उसके साथ विधिवत विवाह सम्पन्न कर लिया.
उनका दाम्पत्य जीवन बड़े आनन्द से गुजरने लगा. लगभग दो वर्ष के बाद, उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ. चारों ओर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. कुछ दिन बाद, एक दिन, गंगा अपने पुत्र को गोद में लिए, अकेली गंगा नदी की ओर निकल पड़ी. राजा शान्तनु ने उसे देखा, लेकिन कारण नहीं पूछा. वह अपनी शर्त से बँधे थे. सेवकों को पीछे भेज दिया कि, पता करो, गंगा करती क्या है? सेवकों ने देखा कि, गंगा ने अपने पुत्र को गंगा नदी में बहा दिया था. जब राजा तक यह समाचार पहुँचा, तो शान्तनु को, मन ही मन बहुत बुरा लगा. लेकिन वह प्रश्न करने की स्थिति में नहीं थे.
एक वर्ष के बाद, गंगा ने फिर एक पुत्र को जन्म दिया. और कुछ दिन पश्चात उसे भी चुपचाप गंगा में बहा आई. ऐसा करते करते दिन, महीने, वर्ष बीतने लगे. शान्तनु के घर एक एक करके सात पुत्र जन्मे और सातों को गंगा ने चुपचाप गंगा में बहा दिया. शान्तनु को इससे मन ही मन बड़ी पीड़ा होने लगी. मन में हज़ारों प्रश्न जन्म लेने लगे , लेकिन वह एक ऐसी शर्त से बंधे थे, कि पत्नी के इस कृत्य के लिए उससे कुछ पूछ नहीं सकते थे. मन का द्वन्द चरम सीमा पर जा पहुँचा था.
अगले वर्ष गंगा ने आठवें पुत्र को जन्म दिया. जब गंगा इस पुत्र को भी, गंगा नदी की ओर ले जाने लगी, तो शान्तनु अपने आप को रोक नहीं पाए. शान्तनु ने गंगा से बड़े दुखी मन से कहा, तुम कैसी माँ हो? जो अपनी नवजात सन्तान को चुपचाप गंगा में बहा देती हो? तुम्हें पीड़ा नहीं होती? तुम्हारा वात्सल्य तुम्हें धिक्कारता नहीं? गंगा वहीं रुक गई, थोड़ा मुस्कुराने लगी. सहज होकर बोली, राजन आज आपने अपना वचन तोड़ दिया. आपने इस पुत्र को तो बचा लिया है. लेकिन अब मैं आपको इनका रहस्य बताती हूँ. मैं गंगा, ब्रह्मा जी की बेटी, एक शापवश धरती पर भेजी गई थी. और यह आठ पुत्र भी ब्रह्मलोक के वसु थे, इन्हें भी धरती पर जन्म लेने का श्राप था. मुझे इन्हें इस श्राप से मुक्त कराना था. इसीलिए मैंने वही किया, जो नियति में निर्धारित था. यह आठवाँ पुत्र अब श्राप मुक्त नहीं हो पाया. यह आपका बेटा बन कर जियेगा. इसे मैं इच्छामृत्यु का वरदान देती हूँ. जब तक यह नहीं चाहेगा, इसकी मृत्यु नहीं होगी. मैं इसको देवव्रत नाम प्रदान करती हूँ. साथ ही चूँकि यह मेरी कोख से जन्मा है, इसे जगत गंगापुत्र के नाम से भी जानेगा.
यह सब कहानी सुन शान्तनु प्रसन्न भी हुए और दुखी भी. प्रसन्न इसलिए कि, उन्होंने एक पुत्र को बचा लिया था, साथ ही दुखी इसलिए कि, उन्होंने गंगा को दिया वचन तोड़ दिया था. उसी दुखी मन से, वह गंगा से क्षमा माँगने लगे. लेकिन गंगा ने कहा, राजन अब मैं शाप मुक्त हो गई हूँ. अब मुझे ब्रह्मलोक लौटना पड़ेगा. मैं अब आपके साथ नहीं रह सकती. इस नवजात शिशु को मैं अपने साथ लिए जा रही हूँ. अभी इसे माँ की आवश्यकता है. कुछ वर्षों में, मैं वापस लौट कर आऊँगी, और आपके पुत्र को आप को लौटा जाऊँगी. यह कह कर गंगा और उसका बेटा दोनों अंतर्ध्यान हो गए.
राजा शान्तनु महल में उदास लौट आए. अब उनका मन राजकाज में भी नहीं लगता था. निरन्तर गंगा की याद उन्हें परेशान करती रहती थी. अपने बेटे का भी उन्हें ध्यान आता रहता था. ऐसा करते करते सोलह वर्ष बीत गए. एक दिन वह अपने महल से गंगा नदी को निहार रहे थे कि, अचानक उन्हें गंगा के किनारे एक स्त्री और एक युवक दिखाई पड़े.
वह अधीर मन से उस दिशा को चल पड़े. निकट जाकर देखा तो, वहाँ गंगा खड़ी थी. साथ ही एक सुंदर सुकुमार राजकुमार भी था. गंगा ने अभिवादन के बाद, राजा शान्तनु से कहा, महाराज यह आपका पुत्र देवव्रत है. मैंने इसे अपनी योग्यता अनुसार पाला पोसा है. इसे ऋषि वशिष्ठ के गुरुकुल से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त हुई. ऋषि ने इसे शास्त्रों का गहन ज्ञान प्रदान किया है.
फिर इसे ऋषि परशुराम के आश्रम में शस्त्र विद्या के लिए भेजा गया. वहाँ परशुराम जी ने इसे शस्त्र विद्या में पारंगत किया. अब यह जीवन की हर छोटी बड़ी लड़ाई के लिए सजग है.
इसका ब्रह्मलोक में समय समाप्त हो गया है. अब यह आपके पास रहेगा. मैंने अपना वचन पूरा किया. इसे अब आप सम्भालिए, यह आपके वंश का गौरव बनेगा. राजा शान्तनु अपने युवा पुत्र को पाकर अति प्रसन्न हुए. और गंगा वहाँ से अंतर्ध्यान हो गई. आगे की कथा, नई कड़ी में. जय महाभारत !!!!!