
आंध्र प्रदेश मंदिर यात्रा : अंतिम पड़ाव — सोमाराम (सोमेश्वर) मंदिर, भीमावरम
IndoUS Tribune की “यात्रा और दर्शन” श्रृंखला की आंध्र प्रदेश मंदिर यात्रा आज अपने पंद्रहवें और अंतिम पड़ाव पर पहुँचती है। तिरुमला तिरुपति देवस्थानम से आरंभ हुई यह आध्यात्मिक यात्रा, आंध्र प्रदेश के विविध, प्राचीन और श्रद्धा से परिपूर्ण मंदिरों से गुजरते हुए अब हमें पंचाराम क्षेत्र के दिव्य धाम — सोमाराम (सोमेश्वर) मंदिर, भीमावरम तक ले आई है।
यह केवल एक यात्रा का समापन नहीं, बल्कि शैव परंपरा, पौराणिक इतिहास और चंद्र-तत्व से जुड़े अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव का चरम बिंदु है। पश्चिम गोदावरी ज़िले के भीमावरम नगर में स्थित यह मंदिर भगवान शिव के सोमेश्वर स्वरूप को समर्पित है और पंचाराम क्षेत्रों में एक विशिष्ट स्थान रखता है।
सोमाराम मंदिर का पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व
सोमाराम मंदिर, भगवान शिव के पाँच पवित्र पंचाराम क्षेत्रों में से एक है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, यहाँ प्रतिष्ठित शिवलिंग की स्थापना चंद्रदेव ने की थी, इसी कारण भगवान शिव यहाँ सोमेश्वर स्वामी के नाम से पूजित हैं।
एक प्रमुख कथा के अनुसार, राक्षस राजा तारकासुर के वध के समय उसके कंठ में स्थित शिवलिंग पाँच भागों में विभक्त हो गया। ये पाँचों भाग अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित हुए, जिनसे पंचाराम क्षेत्र अस्तित्व में आए:
- अमराराम — अमरावती
- द्राक्षाराम — पूर्व गोदावरी
- सोमाराम — भीमावरम
- क्षीराराम — पालकोल
- भीमाराम — समरलकोटा
एक अन्य कथा त्रिपुरासुर संहार से जुड़ी है, जिसमें शिवलिंग के अवशेषों से इन पाँच पवित्र शिवालयों की स्थापना मानी जाती है।
चंद्र प्रभाव से बदलता शिवलिंग: एक अद्भुत विशेषता
सोमाराम मंदिर की सबसे विलक्षण विशेषता है यहाँ का शिवलिंग, जो चंद्रमा की कलाओं के अनुसार अपना रंग बदलता है:
- पूर्णिमा के दिन शिवलिंग श्वेत (सफेद) दिखाई देता है
- अमावस्या को यह श्याम (काला) हो जाता है
यह दुर्लभ विशेषता सोमाराम मंदिर को भारत के सबसे विशिष्ट और रहस्यमय शिवालयों में सम्मिलित करती है।
मंदिर परिसर और स्थापत्य वैभव
मंदिर के प्रवेश द्वार पर भव्य गोपुरम और सामने चंद्रकुंडम (सोमा गुंडम) नामक पवित्र पुष्करिणी स्थित है। मंदिर परिसर में:
- विशाल नंदी प्रतिमा
- भगवान श्रीराम, हनुमान, कुमारस्वामी, गणेश, सूर्य और नवग्रहों के मंदिर
- शिव गर्भगृह के ऊपर स्थित देवी अन्नपूर्णा मंदिर, जहाँ देवी पुरुषों की भाँति यज्ञोपवीत धारण किए हुए हैं — जो अत्यंत दुर्लभ स्वरूप है
भगवान सोमेश्वर की अर्धांगिनी राजराजेश्वरी अम्मावारु भी यहीं विराजमान हैं।
पूजा, दर्शन और उत्सव
दर्शन समय:
- प्रातः 5:00 बजे से 11:00 बजे तक
- सायं 4:00 बजे से 8:00 बजे तक
प्रमुख पर्व:
- महाशिवरात्रि (फरवरी–मार्च)
- शरन्नवरात्रि (सितंबर–अक्टूबर)
कैसे पहुँचें
- सड़क मार्ग: APSRTC बसें पालकोल्लू, राजमहेंद्रवरम और विजयवाड़ा से
- रेल मार्ग: भीमावरम रेलवे स्टेशन से लगभग 2 किमी
- वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डे — राजमहेंद्रवरम और विजयवाड़ा
निकटवर्ती दर्शनीय स्थल
- द्वारका तिरुमला (छिन्ना तिरुपति)
- दिंडी बैकवॉटर्स
- पीठापुरम एवं द्राक्षारामम
- भद्राचलम श्री सीतारामचंद्र स्वामी मंदिर
समापन: एक दिव्य यात्रा का पूर्ण विराम और नई शुरुआत का संकेत
सोमाराम (सोमेश्वर) मंदिर के दर्शन के साथ IndoUS Tribune की आंध्र प्रदेश मंदिर यात्रा अपने पवित्र समापन पर पहुँचती है। इन पंद्रह पड़ावों में हमने अनुभव किया कि कैसे आस्था, इतिहास और स्थापत्य एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं — और कैसे मंदिर आज भी भारतीय सभ्यता की आत्मा बने हुए हैं।
IndoUS Tribune अपने सभी पाठकों का हृदय से आभार व्यक्त करता है कि आपने इस आध्यात्मिक यात्रा में हमारा साथ दिया। आशा है कि यह श्रृंखला आपको भारत की दिव्य सांस्कृतिक धरोहर के और निकट ले गई होगी।
अब अगली यात्रा…
अरुणाचल मंदिर यात्रा: जहाँ आस्था सूर्योदय के साथ जागती है
अगले अंक से IndoUS Tribune एक नई आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत कर रहा है —
“अरुणाचल प्रदेश के मंदिरों की यात्रा”।
भारत के पूर्वोत्तर छोर पर स्थित अरुणाचल प्रदेश — जहाँ भारत सबसे पहले सूर्य का स्वागत करता है — आस्था, प्रकृति और आदिम परंपराओं का एक अनोखा संगम है। पार्शुराम कुंड की तपस्वी ऊर्जा से लेकर मालिनीतन की पुरातन कथाओं तक, यह यात्रा उन मंदिरों से परिचित कराएगी जिनकी कहानियाँ कम कही गई हैं, पर जिनकी शक्ति गहराई से अनुभूत होती है।
जहाँ मार्ग कठिन हैं, पर आस्था अडिग है।
जहाँ मंदिर केवल संरचनाएँ नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ संवाद हैं।
अरुणाचल मंदिर यात्रा — शीघ्र ही IndoUS Tribune में।
तब तक, भगवान सोमेश्वर की कृपा आप सभी पर बनी रहे।
हर हर महादेव।