
आंध्र से अरुणाचल तक: आस्था की निरंतर यात्रा: IndoUS Tribune की “मंदिरों की यात्रा” श्रृंखला का नया अध्याय
आंध्र प्रदेश के भव्य, प्राचीन और आस्था से परिपूर्ण मंदिरों की एक अत्यंत सफल, भावनात्मक और स्मरणीय यात्रा के समापन के पश्चात्, IndoUS Tribune अब अपनी आध्यात्मिक खोज को भारत के सुदूर उत्तर-पूर्व की ओर विस्तार दे रहा है। दक्षिण भारत की दिव्य स्थापत्य कला, वैदिक परंपराओं और गहन भक्ति-अनुभवों के बाद अब हम प्रवेश कर रहे हैं उस भूभाग में, जहाँ प्रकृति और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं—अरुणाचल प्रदेश।
“उगते सूरज की भूमि” के नाम से विख्यात अरुणाचल प्रदेश हिमालय की गोद में बसा वह राज्य है, जहाँ पर्वत, नदियाँ, घने वन और प्राचीन कथाएँ एक अद्भुत आध्यात्मिक वातावरण रचती हैं। यहाँ छिपे मंदिर और तीर्थ केवल स्थानीय आस्था के केंद्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन परंपरा के जीवंत प्रमाण हैं। IndoUS Tribune की नई श्रृंखला “यात्रा: अरुणाचल प्रदेश के मंदिरों की” का उद्देश्य इसी अल्पज्ञात किंतु अत्यंत समृद्ध आध्यात्मिक विरासत को पाठकों के समक्ष प्रस्तुत करना है।
अरुणाचल प्रदेश: पहला पड़ाव – पावन परशुराम कुंड
IndoUS Tribune की “यात्रा और दर्शन” श्रृंखला की इस नई कड़ी में आपका हार्दिक स्वागत है। अरुणाचल प्रदेश की इस आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ हो रहा है लोहित जिले में स्थित, लोहित नदी के तट पर बसे अत्यंत पूजनीय और पौराणिक तीर्थ—परशुराम कुंड—से।
घने वनों, पर्वतीय शांति और प्रवाहमान नदी के मध्य स्थित यह कुंड केवल एक प्राकृतिक स्थल नहीं, बल्कि प्रायश्चित, मोक्ष और आत्मशुद्धि की सनातन अवधारणा का प्रतीक है। यह स्थान भगवान विष्णु के छठे अवतार, महर्षि परशुराम, से जुड़ी उस पौराणिक कथा का साक्षी माना जाता है, जिसने इसे अखिल भारतीय महत्व का तीर्थ बना दिया।
पौराणिक कथा: पाप से प्रायश्चित तक
हिंदू पुराणों के अनुसार, ऋषि जमदग्नि के आदेश पर परशुराम ने आज्ञाकारिता में अपनी माता रेणुका का वध कर दिया। यह मातृहत्याकांड उन्हें जीवन भर कचोटता रहा। इस महापाप के दंडस्वरूप उनका परशु (कुल्हाड़ी) उनके हाथ से चिपक गया—जो उनके अपराध का स्थायी स्मरण बन गया।
प्रायश्चित की खोज में परशुराम ने अनेक ऋषियों से मार्गदर्शन लिया। अंततः उन्हें लोहित नदी के पवित्र जल में स्नान कर अपने पाप से मुक्ति पाने का उपाय बताया गया। जैसे ही उन्होंने इस स्थान पर अपने हाथ नदी के जल में डाले, चमत्कारिक रूप से परशु उनके हाथ से अलग हो गया। यही स्थान कालांतर में परशुराम कुंड के नाम से विख्यात हुआ और आत्मशुद्धि का प्रतीक बन गया।
धार्मिक महत्व और श्रद्धा का केंद्र
परशुराम कुंड को जीवनभर के पापों से मुक्ति देने वाला तीर्थ माना जाता है। कालिका पुराण में भी इस स्थल का उल्लेख मिलता है, जहाँ कहा गया है कि यहाँ स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसी कारण इसे अक्सर “पूर्वोत्तर भारत का कुंभ” भी कहा जाता है।
प्रत्येक वर्ष मकर संक्रांति (14–15 जनवरी) के अवसर पर यहाँ विशाल मेला लगता है, जिसमें भारत के विभिन्न राज्यों—असम, मणिपुर, नेपाल सहित—से हजारों श्रद्धालु और साधु पवित्र स्नान हेतु पहुँचते हैं। अनुमानतः हर वर्ष 70,000 से अधिक भक्त इस कुंड में आस्था की डुबकी लगाते हैं।
इतिहास, संरचना और प्राकृतिक परिवेश
परशुराम कुंड लोहित जिले के कामलांग रिज़र्व फ़ॉरेस्ट क्षेत्र में, तेज़ू से लगभग 48 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। 1950 के विनाशकारी असम भूकंप में मूल कुंड नष्ट हो गया था, किंतु बाद में नदी तल में चट्टानों के प्राकृतिक वृत्ताकार जमाव से वर्तमान कुंड का निर्माण हुआ—जिसे आज भी रहस्यमय माना जाता है।
यहाँ भगवान परशुराम को समर्पित मुख्य मंदिर के साथ-साथ माता रेणुका का मंदिर और भगवान विष्णु के दशावतारों को समर्पित दशावतार मंदिर भी स्थित है। आसपास फैले रुद्राक्ष वृक्षों के घने वन इस स्थल को और अधिक पावन वातावरण प्रदान करते हैं।
आस्था, प्रकृति और संस्कृति का संगम
परशुराम कुंड केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्व भारत की सांस्कृतिक विविधता और प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत संगम है। मकर संक्रांति के मेले में स्थानीय जनजातियाँ अपनी पारंपरिक वस्तुएँ, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक झलकियाँ प्रस्तुत करती हैं। इसके साथ ही क्षेत्र में ट्रेकिंग, नदी-राफ्टिंग और प्राकृतिक पर्यटन की भी संभावनाएँ हैं।
निष्कर्ष: यात्रा जो आत्मा से संवाद करती है
अरुणाचल प्रदेश की इस पावन यात्रा का पहला पड़ाव, परशुराम कुंड, हमें यह स्मरण कराता है कि भारत की आध्यात्मिक चेतना केवल प्रसिद्ध तीर्थों तक सीमित नहीं, बल्कि उसके दूरस्थ अंचलों में भी उतनी ही जीवंत और प्रभावशाली है। यह स्थल प्रायश्चित, क्षमा और आत्मपरिवर्तन की उस परंपरा का प्रतीक है, जो सनातन धर्म की आत्मा है।
IndoUS Tribune की इस आध्यात्मिक श्रृंखला में यह यात्रा यहीं विराम नहीं लेती। हमारे अगले पड़ाव में हम पहुँचेंगे ‘मालिनीथान मंदिर’ (Malinithan Temple Ruins)—जहाँ पत्थरों पर उकेरी गई प्राचीन कलाकृतियाँ और मंदिर के अवशेष हमें द्वापर युग की स्मृतियों में ले जाएँगे, और जहाँ भगवान कृष्ण व माता रुक्मिणी से जुड़ी कथाएँ इतिहास और आस्था के संगम को जीवंत कर देती हैं।
हमारे साथ बने रहिए इस दिव्य यात्रा में—क्योंकि यह केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को जानने की यात्रा है।