
हनुमान जी की आठ सिद्धियाँ
By: Rajendra Kapil
हनुमान जी के समान रामजी का कोई भक्त नहीं है. रामजी को भी उस पर पूरा भरोसा था. रामजी के हर काम को करने के लिए हनुमान जी सदा तत्पर रहते थे. इसीलिए जब पूरा वानर दल सीता खोज के लिए योजना बना रहा था, तो रामजी ने केवल हनुमान जी को अलग से बुलाया और उन पर भरोसा जताते हुए बोले, हनुमान जब तुम सीता से मिलना, तो उसे मेरी यह मुद्रिका निशानी के रूप में दे देना. इस पर सीता तुम को मेरा विश्वसनीय सेवक मान लेगी. यही विश्वास, हनुमान जी की शक्ति बन गया.
भक्तों में ऐसी मान्यता है कि, हनुमान जी के पास कई प्रकार की सिद्धियाँ थी. उन्हें अष्ट सिद्धि और नव निधि की दाता भी कहा जाता है. उन्हें यह सिद्धियाँ कैसे प्राप्त हुई, इसके बारे में कई मत हैं. कुछ विद्वान मानते हैं कि, हनुमान जी को यह सिद्धियाँ माँ सीता के आशीर्वाद से मिली तो कुछ का कहना है की हनुमान जी ने अपने युवा काल में, खूब तपस्या कर यह सिद्धियाँ बहुत सारे गुरुओं से अर्जित की. मेरा भी मानना है कि, यह पूँजी उनकी अर्जित की हुई थी, जिसे उन्होंने सीता खोज में पूरी तरह से इस्तेमाल किया. उनकी आठ सिद्धियाँ निम्नलिखित हैं.
१) अणिमा २) महिमा ३) गरिमा ४) लघिमा ५) प्राप्ति ६)प्रकाम्य ७) ईशत्व ८) वशित्व
आइये इन सिद्धियाँ का क़रीब से विवेचन करते हैं. बड़ी अच्छी बात यह है कि, इतनी बड़ी उपलब्धि के बाद भी हनुमान जी अत्यंत विनम्र थे. उनकी विनम्रता का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है. एक बार जब हनुमान जी लँका विध्वंस के बाद लौटे, तो रामजी उनके बल की खूब प्रशंसा करने लगे.
कहु कपि रावन पालित लंका, केहि बिधि दहहू दुर्ग अति बँका
हनुमान तुमने लँका जैसे, अति दुर्गम दुर्ग को कैसे जला दिया, तो यह सुन हनुमान जी सकुचा गए, बोले महाराज यह सब आपके प्रताप का परिणाम था. वरना मैं तो एक साधारण सा वानर हुँ जो पेड़ों पर कूदना जानता हूँ.
साखामृग की बड़ मनुसाई, साखा ते साखा पर जाई
सो सब तव प्रताप रघुराई, नाथ न कछू मोरि प्रभुताई
ऐसे प्रिय और विनीत थे मेरे प्यारे हनुमान जी. उनकी विनम्रता को हमारा नमन. अब प्रस्तुत हैं, हनुमान जी की सिद्धियाँ.
अणिमा– शरीर को अणु के समान छोटा बना लेना. हनुमान जी ने इस सिद्धि का प्रयोग, सीता खोज के समय, लँका में प्रवेश के लिए किया. लँका के द्वार पर पहरा था. ऐसे में हनुमान जी ने अपने आप को एक मच्छर के समान छोटा बना, लंका में घुसने का प्रयास किया.
मसक समान रूप कपि धरहि, लंकहि चलेउ सुमिरी नरहरि
फिर भी लँका की सिक्योरिटी ने उन्हें पकड़ लिया. फिर हनुमान जी ने अपने बल का प्रयोग किया और लंका में प्रवेश पा लिया. यह थी उनकी बुद्धिमत्ता.
महिमा- इस सिद्धि के प्रभाव से हनुमान जी अपने आप को इच्छा अनुरूप बड़ा बना लेते थे. इसका प्रयोग भी लँका जाते समय दिखाई पड़ा. रास्ते में सुरसा नाम की एक राक्षसी मिली, जिसे देवताओं ने हनुमान की परीक्षा के लिए भेजा था. उसने हनुमान जी को ख़ाना चाहा. जैसे ही सुरसा ने मुँह खोला, हनुमान जी ने उसके मुँह में पहुँच, अपना शरीर बढ़ाना शुरू कर दिया. सुरसा ने भी, और मुँह बढ़ाना आरम्भ कर दिया. फिर एक समय ऐसा आया कि, सुरसा की पीड़ा इतनी बढ़ गई कि, उन्हें हनुमान जी को रास्ता देना पड़ा. हनुमान जी, यह बाधा अपनी इस सिद्धि के कारण पार कर पाए.
गरिमा- इस सिद्धि के प्रभाव से हनुमान जी अपने शरीर को भारी बना लेते थे. इस सिद्धि का प्रयोग उन्होंने राम रावण युद्ध के दौरान कई बार राक्षसों को परास्त करने में किया. वह कभी कभी अपने शरीर को इतना भारी बना लेते थे कि, राक्षस उन्हें हिला भी नहीं पाते थे. उनके किसी भी प्रहार का उन पर कोई असर नहीं होता था. इसलिए हनुमान जी राक्षसों पर आसानी से विजय पा लेते थे.
लघिमा- इस सिद्धि के प्रयोग से हनुमान अपने शरीर को हल्का यानि भार रहित बना लेते थे. अपने शरीर को पत्ते के समान हल्का बना, वह तुरंत उड़ कर रामजी का हर संभव कार्य कर देते थे. युद्ध में जब लक्ष्मण जी मूर्छित ही गए, तो वह विभीषण के सुझाव से तुरंत उड़ कर लँका जा पहुँचे और वैद्य सुषेण को युद्ध भूमि में ले आए. फिर जब वैद्यराज को संजीवनी बूटी चाहिए थी, तो हनुमान जी उसी हल्के शरीर से उड़, हिमालय के पहाड़ों से संजीवनी बूटी लाए और लक्ष्मण को नया जीवन प्रदान किया.
प्राप्ति- हनुमान जी की यह सिद्धि उन्हें कोई भी वस्तु प्राप्त करने में सहज सहायक होती थी. उन्होंने अपने लिए कभी कुछ पाने का प्रयास नहीं किया. या तो वह हर काम अपने इष्ट रामजी के लिए करते थे या फिर अपने भक्तों के उद्धार के तत्पर रहते थे. जिस किसी ने हनुमान जी को अपना इष्ट मान अपने जीवन में उतारा, उन्हें हनुमान जी अपने रंग में रंग कर, अपना सब कुछ लूटा दिया. ऐसे सरल थे मेरे प्यारे हनुमान जी, उनको मेरा बारम्बार प्रणाम.
प्रकाम्य- इस सिद्धि का अर्थ है कि, किसी की भी मनोकामना को पूर्ण करना. हनुमान जी की यह सिद्धि उनके भक्तों के लिए विशेषरूप लाभदायक है. जो भी उनकी निर्मल हृदय से भक्ति करता है, उसकी हर मनोकामना पूर्ण होती है. एक बार तुलसी बाबा राजा अकबर की बात न मानने के कारण, बंदी बना लिए गये थे. जब कोई और उपाय नहीं सूझा, तो बाबा ने हनुमान जी को गुहार लगाई. बस फिर क्या था, हनुमान जी ने उस जेल आसपास, अपनी वानरों की एक टुकड़ी भेज इतना उत्पात मचवा दिया कि, अकबर को तुलसी बाबा को तुरंत छोड़ना पड़ा. इसे बाबा ने अपने हनुमान चालीसा में लिखा है.
जो शत बार पाठ कर कोई, छूटहि बन्दी महासुख होई और
संकट कटे मिटे सब पीरा, जो सुमिरत हनुमत बलबीरा
जिस मनोकामना को लेकर हनुमान जी लँका की ओर गए, वह सीता जी को अशोक वाटिका में मिलकर पूर्ण की. यह था इस सिद्धि का प्रभाव.
ईशत्व- ईश्वरीय गुण. इसी सिद्धि के कारण, हनुमान जी को अजर और अमर कहा जाता है. वह हर युग और काल में विद्यमान रहते हैं. उन्हें यह वरदान माँ सीता ने रामजी का सकुशल समाचार पाने पर, प्रसन्न होकर दिया था. माँ ने सुंदरकांड में कहा है-
अजर अमर गुण निधि सुत होहू, करहुँ बहुत रघुनायक छोहु
करहुँ कृपा प्रभुअस सुनि , निर्भर प्रेम मगन हनुमाना
यह आशीर्वाद पाकर हनुमान जी अत्यंत प्रसन्न हुए. माँ ने रघुनायक की सेवा का अमर आशीर्वाद जो दे दिया था.
वशित्व- किसी को भी अपने वश में करने मी क्षमता. हनुमान जी कई बार ऐसे दम्भी और कपटी राक्षसों से पाला पड़ा, कि उन्हें जीतने के लिए उन पर वशीकरण का अस्त्र चलाना पड़ा. दम्भी जनों का उद्देश्य होता था, छल से जीतना और हनुमान जी का उद्देश्य रहता था, न्यायपूर्ण ढंग से जीतना. इसीलिए जीत हमेशा हनुमान जी की होती थी. वह इन दुष्टों को रास्ते से हटाने के इरादे से, वशीकरण का प्रयोग कर उन्हें यमलोक पहुँचा दिया करते थे. इसीलिए वह रामजी का हर काम इतनी सहजता से कर पाए.
यह थी हनुमान जी कि आठ सिद्धियाँ, जिनके होते, हनुमान जी में अतुलित बल समाया हुआ था. जितेन्द्रिय वोह बचपन से थे. इसीलिए वानरों के अग्रगण्य मुख्य नायक बने. राम भक्त हनुमान जी को हम सबका सादर नमन!!