मालिनीथान मंदिर

मालिनीथान मंदिर

IndoUS Tribune की Temples of Arunachal Yatra का दूसरा पड़ाव हमें अरुणाचल प्रदेश के लोअर सियांग जिले के लिकाबाली क्षेत्र में सियांग पहाड़ियों की तलहटी पर स्थित मालिनीथान मंदिर के प्राचीन अवशेषों तक ले आता है—एक ऐसा पावन स्थल जहाँ इतिहास, पुरातत्व और आस्था एक साथ सजीव हो उठते हैं। 10वीं से 14वीं शताब्दी के मध्य निर्मित माने जाने वाले इस पत्थर-निर्मित मंदिर के अवशेष उस कालखंड की उत्कृष्ट शिल्पकला, स्थापत्य कौशल और सांस्कृतिक समृद्धि के सशक्त प्रमाण हैं।

लोकमान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण और रुक्मिणी द्वारका की ओर जाते समय यहाँ ठहरे थे। कहा जाता है कि माता पार्वती ने उनका पुष्पमालाओं से स्वागत किया, और उन मालाओं की अनुपम सुंदरता से प्रभावित होकर भगवान कृष्ण ने पार्वती को “मालिनी”—अर्थात् उपवन की स्वामिनी—कहा। तभी से यह स्थान “मालिनीथान” के नाम से विख्यात हो गया।

IndoUS Tribune की श्रृंखला “यात्रा: अरुणाचल प्रदेश के मंदिरों की” का उद्देश्य ऐसे ही अल्पज्ञात, किंतु अत्यंत समृद्ध आध्यात्मिक स्थलों को पाठकों के समक्ष लाना है, जो भारत की सांस्कृतिक एकता और सनातन परंपरा की गहराई को उजागर करते हैं। परशुराम कुंड के दिव्य और आत्मशुद्धि से जुड़े अनुभवों के बाद यह दूसरा पड़ाव हमें एक ऐसे तीर्थ से परिचित कराता है, जहाँ पौराणिक कथाएँ, ऐतिहासिक विरासत और प्रकृति की शांत छटा मिलकर आध्यात्मिक अनुभूति को और भी गहन बना देती हैं।

इतिहास और पुरातात्त्विक महत्त्व

मालिनीथान एक महत्वपूर्ण पुरातात्त्विक स्थल है, जहाँ प्रारंभिक मध्यकालीन हिंदू मंदिर के भव्य अवशेष पाए गए हैं। 1968 से 1971 के बीच अरुणाचल प्रदेश सरकार के शोध निदेशालय द्वारा किए गए उत्खननों में इस मंदिर का अनावरण हुआ।

यह मंदिर पूर्णतः ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित था—एक ऐसी विशेषता जो इसे उत्तर-पूर्व भारत के अधिकांश ईंट-निर्मित मंदिरों से अलग करती है। “अश्ममय” शैली में निर्मित इस मंदिर की वास्तुकला में ओड़िशा की शास्त्रीय परंपरा की झलक मिलती है, जो उस समय विभिन्न क्षेत्रों के बीच सांस्कृतिक संपर्क को दर्शाती है।

खुदाई में लगभग 2.4 मीटर ऊँचा मंदिर चबूतरा मिला, जिसमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप की संरचना स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे के डॉवेल का प्रयोग इस बात का संकेत देता है कि संभवतः 13वीं–14वीं शताब्दी में चुटिया साम्राज्य ने इसका निर्माण कराया होगा।

यहाँ से प्राप्त मूर्तियों में देवी दुर्गा, भगवान शिव, गणेश, कार्तिकेय, सूर्य देव और एक विशाल नंदी की प्रतिमा विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। मंदिर के चारों कोनों पर हाथियों पर आरूढ़ सिंहों की मूर्तियाँ इसकी भव्यता और कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाती हैं। नृत्य करती यक्षिणियों, पुष्प आकृतियों और पशु-प्रतिमाओं से सुसज्जित शिल्प उस युग की उन्नत कला का परिचय देते हैं।

मंदिर परिसर में प्राप्त मैथुन मूर्तियाँ तांत्रिक परंपरा की उपस्थिति का संकेत देती हैं—एक ऐसी परंपरा जो स्थानीय जनजातीय उर्वरता अनुष्ठानों और शक्तिपूजा के साथ विकसित हुई। इस प्रकार मालिनीथान न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय का भी प्रतीक बनकर उभरता है।

पौराणिक कथा और नाम की उत्पत्ति

मालिनीथान की पहचान उसकी पौराणिक कथा से और भी समृद्ध हो जाती है। लोकमान्यताओं के अनुसार, जब भगवान कृष्ण ने विदर्भ की राजकुमारी रुक्मिणी से विवाह हेतु उनका हरण किया, तब वे द्वारका की ओर जाते हुए इस क्षेत्र से गुज़रे।

कहा जाता है कि भगवान शिव और माता पार्वती ने इस स्थान पर नवविवाहित दंपति का स्वागत किया। माता पार्वती ने अपने उपवन के सुगंधित पुष्पों से बनी मालाएँ उन्हें अर्पित कीं। उन मालाओं की सुंदरता से प्रभावित होकर भगवान कृष्ण ने पार्वती को “सुचारु मालिनी”—अर्थात् सुंदर मालाएँ गूँथने वाली देवी—कहा। तभी से यह स्थान “मालिनीथान,” यानी मालिनी का उपवन, कहलाने लगा।

यह भी माना जाता है कि यहाँ पूजित मुख्य देवी दुर्गा थीं, जिन्हें कुछ परंपराओं में जनजातीय शक्ति स्वरूपा केचाई-खैती के रूप में पूजा जाता था। यह तथ्य इस स्थल को वैष्णव, शक्त और स्थानीय जनजातीय आस्थाओं के अद्भुत संगम के रूप में स्थापित करता है।

वर्तमान स्वरूप और आध्यात्मिक आकर्षण

1981 में मालिनीथान को राज्य संरक्षित स्मारक घोषित किया गया। आज यह स्थल इतिहासकारों, पुरातत्व प्रेमियों और श्रद्धालुओं के लिए समान रूप से आकर्षण का केंद्र है। खुदाई में प्राप्त देवी दुर्गा की प्रतिमा को समीप निर्मित एक नए मंदिर में स्थापित किया गया है, जहाँ नियमित पूजा होती है।

दुर्गा पूजा और मालिनीथान मेला के दौरान यहाँ विशेष उत्सव का वातावरण रहता है, जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन स्थल पर पहुँचते हैं। सियांग पहाड़ियों की हरियाली, शांत वातावरण और ब्रह्मपुत्र के निकटता इस स्थान को आध्यात्मिक चिंतन के लिए आदर्श बनाती है।

मालिनीथान केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक सेतु की तरह है जो सादिया (चुटिया) साम्राज्य की विरासत, प्राचीन हिंदू परंपराओं और जनजातीय संस्कृति को एक सूत्र में बाँधता है।

निष्कर्ष: यात्रा जो आत्मा से संवाद करती है
अरुणाचल प्रदेश की इस पावन यात्रा का दूसरा पड़ाव, मालिनीथान, हमें यह अनुभव कराता है कि भारत की आध्यात्मिक विरासत केवल जीवित मंदिरों में ही नहीं, बल्कि उन अवशेषों में भी सांस लेती है जो समय के साथ इतिहास बन चुके हैं। यह स्थल हमें बताता है कि आस्था, कला और संस्कृति मिलकर किस प्रकार सभ्यता की अमिट पहचान गढ़ते हैं।

IndoUS Tribune की इस आध्यात्मिक श्रृंखला में यह यात्रा यहीं नहीं रुकती। हमारे अगले पड़ाव में हम पहुँचेंगे ‘तुपिन तारिन मंदिर’ (Tupin Tarin Temple)—जहाँ स्थानीय परंपराएँ, प्रकृति और आध्यात्मिकता मिलकर पूर्वोत्तर भारत की एक और अनकही कथा सामने लाएँगी।

हमारे साथ बने रहिए इस दिव्य यात्रा में—क्योंकि यह केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि भारत की आत्मा को जानने की यात्रा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *