
मानस में शिव की भक्तिमय स्तुति
By: Rajendra Kapil
जब जब राम भक्ति की बात होती है तो भोले शिव का सिमरन सहज ही हो आता है. ऐसा कहा जाता है कि, भगवान शिव सदा अपने इष्ट रामजी के सिमरन में लगे रहते हैं. तुलसी बाबा ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कहा है कि, शिव द्रोही कभी राम भक्त नहीं हो सकता. जब गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित मानस की रचना की तो उनसे पूछा गया कि, आपको इसे लिखने की प्रेरणा कहाँ से मिली? तो उनका उत्तर था कि, भगवान शिव से. बाबा ने बताया कि, एक रात शिव उनके सपने में आए और उन्हें राम कथा को लोकभाषा (अवधी) में लिखने की प्रेरणा दी. उसके बाद ही गोस्वामी तुलसीदास ने राम चरित मानस की रचना की. लेकिन यह विद्वान तो केवल संस्कृत ग्रंथों की मान्यता में विश्वास रखते थे. इसीलिए बनारस के संस्कृत विद्वानों ने इस पर भरोसा नहीं किया, और इस बात की प्रामाणिकता माँगी. तुलसी बाबा ने मानस की पांडुलिपि विश्वनाथ के मंदिर में रख दी, और संस्कृत विद्वानों ने मंदिर को ताला लगा दिया. अगली सुबह जब कपाट खोले गए, तो पांडुलिपि पर “ओम् नम: शिवाय” की सही लिखी मिली. इसके बाद सभी को रामचरित मानस की प्रामाणिकता पर भरोसा हो गया.
भवानी शङ्करौ वन्दे
श्रद्धा विश्वास रूपिणौ।
याभ्यां विना न पश्यन्ति
सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम्
मानस का आरंभ भी शिव आराधना से होता है. मैं श्रद्धा और विश्वास की मूरत शिव पार्वती को प्रणाम करता हूँ, जिनकी कृपा के बिना सिद्ध और योगी जन प्रभु को नहीं पा सकते. तुलसी बाबा ने सारी राम कथा में जगह जगह पर शिव के मंगल रूप, उनके आशुतोष रूप की चर्चा की है.
नाम प्रसाद संभु अबिनासी, साजु अमंगल मंगल रासी
लेकिन जिस प्रसंग और स्तुति की चर्चा इस आलेख में की जा रही है, उसका वर्णन उत्तरकांड में है. उस काण्ड में पक्षिराज गरुड़ और काकभुशुण्डी के बीच एक वार्तालाप है. वहाँ काकभुशुण्डी अपनी गलतियों को सहज रूप से करते हुए बताते हैं कि, एक बार वह बड़ी दीन हीन स्तिथि में उज्जैन गए.
गयऊँ उजेनी सुनु उरगारी, दीन मलीन दरिद्र दुखारी
गएँ काल कछु संपत्ति पाई, तहँ पुनि करऊं संभु सेवकाई
विप्र एक वैदिक सिव पूजा, करइ सदा तेहि काज न दूजा
वहाँ काकभुशुण्डी की भेंट एक ऐसे ब्राह्मण से हुई, जो सदा शिव पूजा में संलग्न रहता था. बड़ा ही परमार्थी प्राणी था. मैं उसके संपर्क में आया और उस भले ब्राह्मण ने मुझे शिव पूजा की विधि सिखानी शुरू कर दी. वह मुझे पुत्रवत मान हर प्रकार से शिक्षा दीक्षा देने लगा. लेकिन मेरे मन में दम्भ और अहंकार बहुत था. मैं उसकी बात ऊपर ऊपर से मान लेता, लेकिन मन ही मन मैं उसका बिल्कुल आदर नहीं करता.
गुर नित मोहि प्रबोध, दुखित देखि आचरन मम
मोहि उपजइ अति क्रोध, दंभिही नीति कि भावई
गुरु जी मुझे नित्य समझाते रहते थे, लेकिन मैं उनकी कोई बात समझता नहीं था.
बल्कि उनकी बातें सुन मुझे क्रोध आता. यह ऐसा ही था कि, जैसे किसी भी अहंकारी व्यक्ति को नीति की बातें अच्छी नहीं लगती. फिर एक दिन ऐसा हुआ कि, मैं शिव मंदिर में बैठ शिव नाम का जप कर रहा था, ठीक उसी समय मेरे गुरु जी अंदर आए. मैंने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया. उनका अभिवादन भी नहीं किया. अपने अभिमान में इतना डूबा रहा कि, उठा तक नहीं.
एक बार हर मंदिर जपत रहऊँ सिव नाम
गुर आयउ अभिमान ते उठि नहीं कीन्ह प्रनाम
मेरे इस अभद्र व्यवहार को देख, गुरु जी ने तो कुछ नहीं कहा, बल्कि वे क्रोधित भी नहीं हुए. लेकिन मेरे दुर्व्यवहार से भगवान शिव कुपित हो गए. उनसे गुरु का अपमान सहा नहीं गया. उसी समय मंदिर में आकाशवाणी हुई:
मंदिर माँझ भई नभबानी, रे हतभाग्य अग्य अभिमानी
जद्यपि तव गुरु कें नहीं क्रोधा, अति कृपाल चित सम्यक बोधा
उस आकाशवाणी को सुन मेरे गुरु घबरा गए. शिव को प्रणाम कर बारम्बार दण्डवत करते हुए बार बार मेरी ओर से क्षमा माँगने लगे.
करि दंडवत् सप्रेम द्विज, सिव सम्मुख कर जोरि
बिनय करत गदगद स्वर, समुझि घोर गति मोरि
उसके बाद गुरु जी ने गद गद स्वर में, भगवान शिव की संस्कृत में, एक बड़ी भावपूर्ण स्तुति गाई, जो हर शिवभक्त के हृदय में आज भी विराजती है. इस शिव स्तुति में आठ श्लोक हैं, इसीलिए इसे रुद्राष्टक भी कहा जाता है.
रुद्राष्टक यहाँ प्रस्तुत है:
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥
निराकारमोङ्करमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥२॥
तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभिरं मनोभूतकोटिप्रभाश्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥३॥
चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ॥४॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशं ।
त्र्यःशूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥५॥
कलातीतकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्दसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥६॥
न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥७॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जराजन्मदुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥८॥
इस स्तुति का सरल भाषा में भावार्थ इस प्रकार है. हे ईशान के परम सौम्य देवता, भोले शिव बाबा, आपकी महिमा अद्भुत है. आप महा कृपालु हैं. स्वच्छ आकाश के समान आपका रूप निर्मल एवं स्वच्छंद है. आपकी शोभा करोड़ों कामदेवों की आभा से भी अधिक है. मस्तक पर अर्ध चन्द्र सुशोभित है. गले में सर्पों की माला विराजमान है. कानों में कुंडल चमक रहे हैं. प्रचंड एवं तेजस्वी स्वरूप, भक्तों के हृदय को प्रसन्न कर रहा है. आप भक्तों की तीनों प्रकारों के (आध्यात्मिक, भौतिक एवं मानसिक) दुखों को हरने वाले हैं. भक्तों की शत्रुओं से रक्षा करने के लिए, त्रिशूल धारण किए हुए हैं. हर प्रकार मी कलाओं से ऊपर, सज्जनों को आनंद देने वाले प्रभु आप, शत्रुओं के लिए काल रूप हैं. हे पार्वतीनाथ, जब तक भक्त गण आपको नहीं भजते, तब तक उन्हें, इस लोक या परलोक में सुख और शांति प्राप्त नहीं होती. हे आशुतोष, मैं आपके सामने करबद्ध विनम्र भाव से खड़ा, केवल यही कह सकता हूँ कि, न तो मुझे जप तप आता है. न ही कोई पूजा विधि आती है. न ही मैं कोई योग जानता हूँ. लेकिन एक बात, मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूँ कि, आप परम दयालु हैं. मेरी आपसे हाथ जोड़ कर यही विनम्र प्रार्थना है कि, आप मेरे इस शिष्य पर अपनी अहेतुकी कृपा बनाएँ. इसके इस अक्षम्य आपराध को क्षमाकर दें. इसे अपनी शरण में ले लें.
तुलसीबाबा इस रुद्राष्टक के अंत में यही लिखते हैं कि, जो कोई भक्त भगवान शिव के इस रुद्राष्टक का पाठ करेगा, उस पर भोले बाबा अवश्य प्रसन्न होंगे और प्रसाद रूप, शंकर जी अपनी भक्ति का आशीर्वाद प्रदान करेंगे.
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥९॥
तुलसीदास जी द्वारा रचित इस भक्तिमय स्तुति के लिए बाबा एवं भगवान शिव में चरणों में मेरा कोटि कोटि प्रणाम!!