IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का तीसरा पड़ाव: तारा तारिणी मंदिर

IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का तीसरा पड़ाव: तारा तारिणी मंदिर

IndoUS Tribune की “Temples of Arunachal Yatra” का तीसरा पड़ाव हमें पूर्वोत्तर की सीमाओं से आगे भारत की शक्ति-परंपरा के एक और महान धाम तक ले आता है—ओडिशा के गंजाम जिले की कुमारी पहाड़ियों पर अवस्थित तारा तारिणी मंदिर। यह पावन शक्तिपीठ न केवल प्राचीन आस्था का केंद्र है, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक निरंतरता, समुद्री परंपरा और देवी-उपासना की जीवंत विरासत का प्रतीक भी है। यहाँ आकर यह अनुभव होता है कि भारत की आध्यात्मिक यात्रा किसी एक भूभाग तक सीमित नहीं, बल्कि संपूर्ण राष्ट्र की चेतना को एक सूत्र में पिरोती है।

यह मंदिर दक्षिण ओडिशा के पुरुषोत्तमपुर के निकट, रुषिकुल्या नदी के तट पर स्थित कुमारी पर्वत पर विराजमान है। लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित ब्रह्मपुर—जिसे ओडिया संस्कृति का प्रमुख केंद्र माना जाता है—से यहाँ पहुँचा जा सकता है। 999 सीढ़ियाँ चढ़कर भक्त माँ के दर्शन करते हैं; साथ ही अब रोपवे और मोटरमार्ग की सुविधा भी उपलब्ध है। पर्वत की चोटी से रुषिकुल्या नदी और हरित वादियों का दृश्य मन को आध्यात्मिक शांति से भर देता है।

शक्तिपीठ के रूप में महिमा

तारा तारिणी को भारत के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब दक्ष यज्ञ के उपरांत देवी सती ने आत्माहुति दी और भगवान शिव उनके विखंडित शरीर को लेकर तांडव करने लगे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को विभाजित किया। जहाँ-जहाँ वे अंग गिरे, वहाँ शक्तिपीठ स्थापित हुए। मान्यता है कि सती के वक्षस्थल (स्तन) कुमारी पहाड़ियों पर गिरे और यह स्थान “स्तनपीठ” के रूप में विख्यात हुआ।

देवी तारा और तारिणी को आदि शक्ति का स्वरूप माना जाता है। वे शक्ति, करुणा और रक्षण की प्रतीक हैं। दक्षिण ओडिशा के अधिकांश लोग इन्हें अपनी इष्टदेवी के रूप में पूजते हैं।

तांत्रिक, बौद्ध और जैन साहित्य में उल्लेख

तारा की उपासना का उल्लेख ब्रह्मांड पुराण के ललितोपाख्यान में मिलता है, जहाँ उन्हें जल-नियंत्रण और नाविकों की अधिष्ठात्री देवी बताया गया है। तांत्रिक परंपरा में वे “नौकेश्वरी”—नावों की स्वामिनी—मानी जाती हैं, जो भक्तों को जीवन-सागर से पार लगाती हैं।

बौद्ध परंपरा में तारा को बुद्धों और बोधिसत्त्वों की माता के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जबकि जैन साहित्य में भी उनका उल्लेख मिलता है। इस प्रकार तारा-तारिणी की उपासना भारतीय धार्मिक परंपराओं के विविध आयामों को समेटे हुए है।

समुद्री व्यापार और देवी की आराधना

प्राचीन काल में रुषिकुल्या नदी का मुहाना समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण केंद्र था। व्यापारी समुद्री यात्रा पर निकलने से पूर्व तारा तारिणी की पूजा करते थे। लोककथा के अनुसार, एक व्यापारी जब समुद्र में संकट में घिर गया, तो उसने माँ से प्रार्थना की और सुरक्षित लौट आया। कृतज्ञता स्वरूप उसने अपनी समस्त आय देवी को अर्पित कर दी। इस कथा ने तारा तारिणी को समुद्री यात्रियों की संरक्षिका देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया।

लोककथाएँ और किंवदंतियाँ

मंदिर से जुड़ी अनेक लोककथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, देवी ने दो बालिकाओं के रूप में प्रकट होकर एक निसंतान दंपति को आशीर्वाद दिया और अंततः रत्नागिरि पर्वत पर अपने दिव्य स्वरूप में स्थापित हुईं। एक अन्य कथा में वे राजा के लोभ से बचने हेतु नदी में विलीन हो जाती हैं और पत्थर-प्रतिमाओं के रूप में प्रकट होती हैं।

ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में एक ब्राह्मण भक्त बसु प्रहराज ने मंदिर का निर्माण/पुनर्निर्माण कराया। बाद में स्थानीय दानदाताओं और समाज-सुधारकों के प्रयासों से मंदिर का विस्तार हुआ तथा पशुबलि की परंपरा समाप्त की गई।

पर्व और परंपराएँ

चैत्र मास के मंगलवार विशेष रूप से शुभ माने जाते हैं। इस अवधि में हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। प्रथम संतान के मुण्डन संस्कार की परंपरा यहाँ अत्यंत लोकप्रिय है। स्वर्ण एवं रजत आभूषणों से अलंकृत देवी की दो पाषाण प्रतिमाएँ मुख्य गर्भगृह में प्रतिष्ठित हैं, जिनके अतिरिक्त उत्सवों के लिए चल-प्रतिमाएँ भी स्थापित हैं।

निष्कर्ष: शक्ति-परंपरा से संवाद की यात्रा

IndoUS Tribune की इस आध्यात्मिक यात्रा का तीसरा पड़ाव हमें यह अनुभव कराता है कि शक्ति-उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक धारा का अभिन्न अंग है। तारा तारिणी मंदिर में आस्था, लोककथाएँ, समुद्री इतिहास और तांत्रिक साधना एक साथ मिलकर भारत की बहुरंगी आध्यात्मिक चेतना को प्रकट करती हैं।

अब हमारी “Temples of Arunachal Yatra” अपने अंतिम और विशेष पड़ाव की ओर अग्रसर है—अरुणाचल प्रदेश में स्थित नक्सा परवत मंदिर के खंडहर (Khandahar), जहाँ इतिहास के मौन पत्थर हमें प्राचीन सभ्यता की एक और अनकही कथा सुनाएँगे।

हमारे साथ जुड़े रहिए—क्योंकि यह यात्रा केवल मंदिरों की नहीं, बल्कि भारत की सनातन आत्मा को समझने और उससे संवाद करने की यात्रा है।

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