IndoUS Tribune : असम के मंदिरों की यात्रा — चौथा पड़ाव (ताम्रेश्वरी मंदिर, सादिया)

IndoUS Tribune : असम के मंदिरों की यात्रा — चौथा पड़ाव (ताम्रेश्वरी मंदिर, सादिया)

हाजो के पावन हयग्रीव माधव मंदिर की आध्यात्मिक अनुभूति और धार्मिक समरसता के संदेश को अपने हृदय में संजोए IndoUS Tribune की यह विशेष यात्रा अब असम के पूर्वोत्तर छोर की ओर बढ़ती है। पिछले पड़ाव पर जहाँ हमें हिंदू और बौद्ध आस्था के अद्भुत संगम का दर्शन हुआ, वहीं अब हमारी यात्रा हमें ऐसे रहस्यमयी और ऐतिहासिक शक्ति-स्थल तक ले आती है, जिसने सदियों तक असम की शक्ति साधना, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक इतिहास को दिशा दी।

हमारा चौथा पड़ाव है तिनसुकिया जिले के सादिया क्षेत्र के निकट स्थित प्राचीन ताम्रेश्वरी मंदिर — जिसे “कॉपर टेम्पल” अथवा “दिक्कारवासिनी मंदिर” के नाम से भी जाना जाता है। आज भले ही यह मंदिर खंडहरों में परिवर्तित हो चुका हो, किंतु इसकी ऐतिहासिक महत्ता, स्थापत्य कला और रहस्यमयी शक्ति परंपरा आज भी असम और पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक चेतना में जीवित है।

शक्ति, इतिहास और जनजातीय आस्था का केंद्र

ताम्रेश्वरी मंदिर 13वीं से 16वीं शताब्दी के बीच शक्तिशाली सुतिया (चुटिया) साम्राज्य का प्रमुख धार्मिक और राजनीतिक केंद्र था। यह मंदिर देवी केचाईखाती को समर्पित था, जिन्हें स्थानीय जनजातीय परंपराओं में अत्यंत शक्तिशाली देवी माना जाता है। “केचाईखाती” का अर्थ है — “कच्चा मांस खाने वाली देवी”, जो विनाश, सुरक्षा और उर्वरता की प्रतीक मानी जाती थीं।

समय के साथ इस देवी की पहचान हिंदू शक्ति स्वरूपा माँ शक्ति और बौद्ध देवी तारा से भी जोड़ी गई। यही कारण है कि ताम्रेश्वरी मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि जनजातीय और हिंदू परंपराओं के अद्भुत समन्वय का प्रतीक बन गया।

ताम्रेश्वरी नाम की कहानी

मंदिर की सबसे विशेष पहचान इसकी तांबे से बनी छत थी। कहा जाता है कि मंदिर की छत तांबे की चादरों से ढकी हुई थी, जिसके कारण इसे “ताम्रेश्वरी” अर्थात “तांबे का मंदिर” कहा जाने लगा। मंदिर की दीवारें बिना चूने या गारे के विशेष तकनीक से निर्मित थीं, जो उस समय की स्थापत्य कुशलता का अद्भुत उदाहरण मानी जाती हैं।

मंदिर परिसर विशाल ईंट और पत्थरों की दीवारों से घिरा हुआ था। मुख्य द्वार पर चांदी के दांतों वाले विशाल हाथियों की प्रतिमाएँ स्थापित थीं, जो इसकी भव्यता और समृद्धि को दर्शाती थीं।

देवरी पुजारियों की अनूठी परंपरा

असम के अधिकांश मंदिरों से अलग, ताम्रेश्वरी मंदिर ब्राह्मण पुजारियों के अधीन नहीं था। इसकी देखरेख देवरी समुदाय के पुजारियों द्वारा की जाती थी, जो सुतिया साम्राज्य के पारंपरिक जनजातीय पुजारी माने जाते थे।

देवरी पुजारियों के चार प्रमुख वर्ग — बार भराली, सरू भराली, बार देवरी और सरू देवरी — मंदिर की व्यवस्थाओं और अनुष्ठानों का संचालन करते थे। यह व्यवस्था इस मंदिर की विशिष्ट जनजातीय पहचान को दर्शाती है।

बलि प्रथा और रहस्य

ताम्रेश्वरी मंदिर अपने समय में मानव और पशु बलि की परंपराओं के लिए भी प्रसिद्ध था। माना जाता था कि देवी को बलि अर्पित करने से युद्ध में विजय और राज्य की सुरक्षा सुनिश्चित होती है। बाद में अहोम शासकों ने इन प्रथाओं पर रोक लगा दी।

यद्यपि आज यह परंपरा इतिहास का हिस्सा बन चुकी है, लेकिन इससे मंदिर की रहस्यमयी छवि और भी गहरी हो जाती है।

ऐतिहासिक पतन और वर्तमान स्थिति

सन् 1524 में अहोम साम्राज्य द्वारा सादिया पर अधिकार करने के बाद मंदिर का राजनीतिक प्रभाव धीरे-धीरे कम होने लगा। बाद में बर्मा के आक्रमणों और प्राकृतिक आपदाओं के कारण यह मंदिर उजड़ गया।

1959 की विनाशकारी बाढ़ के बाद मंदिर का अधिकांश भाग पया नदी की मिट्टी और जल में समा गया। आज वहाँ केवल कुछ अवशेष ही दिखाई देते हैं, किंतु वे भी असम के गौरवशाली अतीत की कहानी कहते हैं।

शिलालेख और ऐतिहासिक प्रमाण

मंदिर परिसर में मिले एक शिलालेख से ज्ञात होता है कि सन् 1442 में सुतिया राजा मुक्त धर्मनारायण ने मंदिर की ईंट और पत्थरों से बनी प्राचीर का निर्माण कराया था। यह शिलालेख आज भी इस मंदिर के ऐतिहासिक महत्व का साक्ष्य माना जाता है।

निष्कर्ष

ताम्रेश्वरी मंदिर की यह यात्रा हमें यह एहसास कराती है कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जनजातीय परंपराओं, लोक आस्थाओं, शक्ति साधना और इतिहास के गहरे अध्यायों से भी जुड़ी हुई है।

सादिया की धरती पर स्थित यह प्राचीन शक्ति पीठ आज भले ही खंडहरों में परिवर्तित हो चुका हो, लेकिन इसकी गूंज आज भी असम की सांस्कृतिक स्मृतियों और लोककथाओं में जीवित है। ताम्रेश्वरी मंदिर हमें यह संदेश देता है कि सभ्यताएँ बदलती हैं, साम्राज्य समाप्त होते हैं, लेकिन आस्था और इतिहास की छाप सदियों तक अमिट बनी रहती है।

IndoUS Tribune की असम यात्रा का यह चौथा पड़ाव हमें पूर्वोत्तर भारत की उस विरासत से परिचित कराता है, जहाँ रहस्य, अध्यात्म, शक्ति और संस्कृति एक साथ प्रवाहित होते हैं।

अब हमारी यह आध्यात्मिक यात्रा आगे बढ़ेगी गुवाहाटी के प्रसिद्ध नवग्रह मंदिर की ओर, जहाँ ब्रह्मांडीय शक्तियों, ज्योतिषीय मान्यताओं और प्राचीन वैदिक परंपराओं का अद्भुत संगम हमारा इंतजार कर रहा है।

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