
IndoUS Tribune की भारत के मंदिरों की यात्रा — गुजरात अध्याय
दूसरा पड़ाव: द्वारकाधीश मंदिर, द्वारका
सोमनाथ से द्वारका तक — भगवान श्रीकृष्ण की पवित्र नगरी की ओर
असम से गोवा तक की आध्यात्मिक यात्रा पूरी करने के बाद अब IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” गुजरात पहुँच चुकी है। गुजरात अध्याय की शुरुआत हमने अरब सागर के किनारे स्थित सोमनाथ मंदिर से की, जो भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक और भारत की आस्था तथा सांस्कृतिक निरंतरता का महत्वपूर्ण प्रतीक है। अब हमारी यात्रा गुजरात के दूसरे प्रमुख तीर्थ द्वारकाधीश मंदिर तक पहुँचती है।
गुजरात केवल व्यापार, उद्योग और प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण, भगवान शिव और देवी उपासना से जुड़े अनेक प्राचीन तीर्थों के लिए भी प्रसिद्ध है। इनमें द्वारका का विशेष स्थान है। द्वारकाधीश मंदिर, जिसे जगत मंदिर भी कहा जाता है, भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है और हिंदू धर्म के चार प्रमुख चार धाम तीर्थों में पश्चिम दिशा का धाम माना जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण की नगरी द्वारका
धार्मिक मान्यता के अनुसार, मथुरा छोड़ने के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने समुद्र के किनारे द्वारका नगरी बसाई और इसे अपने राज्य की राजधानी बनाया। गुजरात सरकार के देवभूमि द्वारका जिला प्रशासन के अनुसार, द्वारका का उल्लेख महाभारत और प्राचीन परंपराओं में मिलता है और इसे भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के रूप में विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है।
पौराणिक कथाओं में यह भी कहा जाता है कि श्रीकृष्ण ने समुद्र से भूमि प्राप्त कर द्वारका नगरी का निर्माण कराया। इसी कारण द्वारका केवल एक मंदिर-नगर नहीं, बल्कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन और उनकी राजधर्म परंपरा से जुड़ा महत्वपूर्ण तीर्थ माना जाता है।
द्वारका का अर्थ सामान्य रूप से “द्वार” या प्रवेश का स्थान माना जाता है। धार्मिक परंपरा में इसे मोक्ष की नगरी भी कहा जाता है। आज भी देश-विदेश से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां भगवान द्वारकाधीश के दर्शन के लिए आते हैं।
द्वारकाधीश मंदिर का इतिहास
द्वारकाधीश मंदिर को जगत मंदिर और त्रिलोक सुंदर मंदिर भी कहा जाता है। गुजरात पर्यटन के अनुसार, परंपरा में मंदिर की स्थापना भगवान श्रीकृष्ण के पौत्र वज्रनाभ से जोड़ी जाती है। मंदिर का वर्तमान स्वरूप कई चरणों में विकसित हुआ और इसकी प्राचीन परंपरा सदियों पुरानी है।
देवभूमि द्वारका जिला प्रशासन के अनुसार, मंदिर का पुराना ढांचा समय के साथ नष्ट हुआ और बाद में इसका पुनर्निर्माण हुआ। वर्तमान मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से पत्थर और चूना-पत्थर से हुआ है तथा इसमें प्राचीन स्थापत्य की सुंदर नक्काशी दिखाई देती है।
भव्य स्थापत्य और मंदिर की पहचान
द्वारकाधीश मंदिर की ऊंची शिखर संरचना दूर से ही दिखाई देती है। मंदिर की ऊंचाई लगभग 43 मीटर बताई जाती है और इसके ऊपर लगा विशाल ध्वज इसकी सबसे पहचान योग्य विशेषताओं में से एक है। मंदिर में प्रवेश के लिए दो प्रमुख द्वार हैं—स्वर्ग द्वार और मोक्ष द्वार।
स्वर्ग द्वार से श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करते हैं, जबकि मोक्ष द्वार की ओर से बाहर निकलने की परंपरा है। मंदिर के पीछे की ओर गोमती नदी के घाटों तक जाने के लिए सीढ़ियां हैं।
मंदिर की दीवारों पर सुंदर नक्काशी और धार्मिक प्रतीकों को देखा जा सकता है। मुख्य गर्भगृह में भगवान श्रीकृष्ण की पूजा द्वारकाधीश के रूप में होती है। मंदिर परिसर में अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी हैं।
चार धाम में विशेष स्थान
द्वारकाधीश मंदिर का सबसे बड़ा धार्मिक महत्व यह है कि यह भारत के चार धामों में शामिल है। अन्य तीन धाम हैं—बद्रीनाथ, पुरी और रामेश्वरम। चारों धाम भारत की चार दिशाओं में स्थित हैं और इनके दर्शन को हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है।
द्वारका का संबंध आदि शंकराचार्य से भी जुड़ा है। परंपरा के अनुसार उन्होंने भारत की चार दिशाओं में चार प्रमुख पीठ स्थापित किए, जिनमें द्वारका का शारदा पीठ पश्चिमी पीठ माना जाता है। इससे द्वारका का महत्व केवल वैष्णव भक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि भारतीय धार्मिक और दार्शनिक परंपरा में भी इसका महत्वपूर्ण स्थान बनता है।
आस्था, उत्सव और तीर्थ परंपरा
द्वारकाधीश मंदिर में जन्माष्टमी का पर्व विशेष उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के अवसर पर मंदिर और पूरा द्वारका नगर भक्ति के रंग में रंग जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन, पूजा और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हैं।
द्वारका आने वाले श्रद्धालु केवल द्वारकाधीश मंदिर ही नहीं, बल्कि गोमती घाट, रुक्मिणी मंदिर, बेट द्वारका और अन्य धार्मिक स्थलों के भी दर्शन करते हैं। इस कारण द्वारका एक व्यापक तीर्थ क्षेत्र के रूप में विकसित हुआ है।
समुद्र और पुरातत्व से जुड़ी द्वारका
द्वारका का महत्व केवल धार्मिक कथाओं तक सीमित नहीं है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण सहित विभिन्न संस्थाओं ने द्वारका और इसके आसपास समुद्र के भीतर पुरातात्विक खोजें की हैं। जिला प्रशासन के अनुसार, इन जांचों में समुद्र के भीतर प्राचीन बस्तियों, पत्थर की संरचनाओं और बंदरगाह से जुड़े अवशेषों के संकेत मिले हैं।
इससे द्वारका धार्मिक आस्था के साथ-साथ भारत के प्राचीन समुद्री इतिहास और पुरातत्व में भी रुचि का केंद्र बनी हुई है।
यात्रा का महत्व
IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” का उद्देश्य केवल मंदिरों के दर्शन कराना नहीं, बल्कि उनसे जुड़े इतिहास, मान्यताओं, स्थापत्य, पूजा परंपराओं और भारतीय संस्कृति में उनके योगदान को पाठकों तक पहुँचाना है।
सोमनाथ के बाद द्वारकाधीश मंदिर का यह पड़ाव हमें भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति, द्वारका की प्राचीन परंपरा और भारत की चार धाम यात्रा की व्यापक धार्मिक भावना से परिचित कराता है।
अगला पड़ाव — अंबाजी मंदिर, बनासकांठा
द्वारका के बाद हमारी गुजरात यात्रा अब बनासकांठा स्थित प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर की ओर बढ़ेगी। अगले पड़ाव में हम जानेंगे अंबाजी धाम का इतिहास, माता अंबा की मान्यताएं, मंदिर का धार्मिक महत्व और गुजरात की देवी उपासना परंपरा में इसके विशेष स्थान के बारे में।
गुजरात की इस आध्यात्मिक यात्रा में हमारे साथ बने रहिए।