बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: हनुमान जी का बचपन

बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: हनुमान जी का बचपन

By: Rajendra Kapil

रामचरितमानस में हनुमान जी के जन्म या बचपन के बारे में कोई उल्लेख नहीं है. मानस में हनुमानजी का प्रवेश पहली बार किष्किन्धा काण्ड में तब होता है, जब रामजी और लखन सीता को खोजते खोजते ऋषयमूक पर्वत के निकट जा पहुँचते हैं. उन्हें देख, पर्वत पर बैठे सुग्रीव को चिंता होती है, तब वह हनुमान जी को, इन दोनों वीर योद्धाओं की असलियत जानने के लिए, भेजते हैं. हनुमान जी एक ब्राह्मण का वेश बना, राम लखन से उनका परिचय पूछने के लिए प्रगट होते हैं.

को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा, छत्रीरूप फिरहु बन बीरा

हनुमान जी उनके दिव्य स्वरूप को देख मन्त्रमुग्ध हो जाते है और पूछ बैठते हैं?

मृदुल मनोहर सुन्दर गाता,  सहत दुसह बन आतप  बाता

कि तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ,  नर नारायन  की तुम्ह दोऊ

प्रभु राम की असलियत जान, हनुमान जी दोनों भाइयों को सुग्रीव के पास ले जाते हैं, उन दोनों की मित्रता करवाते हैं. और उसके बाद, सुग्रीव अपने दल बल के साथ, रामजी के साथ मिल कर, सीता खोज अभियान में पूरी तरह से सम्मिलित हो जाते हैं.

लेकिन वाल्मीकि रामायण के उत्तराकाण्ड में हनुमान जी के जन्म और उनके बचपन को लेकर विस्तार से चर्चा है. एक बार रामजी के दरबार में ऋषि अगस्त आये, तो चर्चा हनुमान जी को लेकर आरम्भ हो गई. रामजी हनुमान जी के प्रति बड़े कृतज्ञ भाव से, उनकी हर प्रकार की सहायता की, प्रशंसा करते जा रहे थे. ऋषि अगस्त्य ने रामजी से पूछा, क्या आप उनके बचपन के बारे जानना चाहते हैं?  रामजी के आग्रह पर ऋषि अगस्त्य हनुमान जी का पावन चरित सुनाने लगे.

ऋषि अगस्त्य हनुमान जी की कहानी सुनाने लगे:

ऋषि कहने लगे, हम सब भली भाँति जानते हैं कि, हनुमान जी वायुदेव महाराज केसरी और उनकी पत्नी अंजना के दिव्य पुत्र हैं. इसीलिए मारुति नन्दन भी कहा जाता है. मारुति का अर्थ है, वायुदेव. वायुदेव के पुत्र पवनपुत्र भी कहे जाते हैं. हनुमान जी में बचपन से ही बहुत सी दिव्य शक्तियाँ थी. ऋषि अगस्त्य ने आगे बताया:

सत्यमेतद्रघुश्रेष्ट यदूबवीषि हनूमतः । न बले विद्यते तुल्या न गता न मता परः ॥ १५॥

हनुमान जी अद्भुत बल बुद्धि एवं तीव्र गति थी. इन सब क्षेत्रों में हनुमान जी की बराबरी कोई और नहीं कर पाता था.  ऋषि ने आगे बताया-

सुमेरु नाम का एक स्वर्णमय पर्वत था. उस पर केसरी नाम के एक महान राजा राज्य करते थे. उनकी पत्नी का नाम अंजना था. बहुत तपस्या के बाद, अंजना के गर्भ से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ. उसका नाम हनुमान रखा गया. जब हनुमान जी छोटे थे, तो एक दिन उनकी माता अंजना, वन में फल लेने गई और देर तक नहीं लौटी.

शालिशूकनिभाभासं प्रासूतेमं तदाऽञ्जना । र फलान्याहतकामा वै निष्क्रान्ता गहनेचरा ॥ २१ ॥ 

जब माँ देर तक नहीं लौटी तो, बालक हनुमान को भूख लगी. ख़ाना न मिलने पर वह ज़ोर ज़ोर से रोने लगे. सामने उन्हें लाल रंग का सूर्य उदित होता दिखाई पड़ा. उन्होंने उसे एक फल समझ लिया और उसे पाने के लिए उसकी ओर उड़ चले. वह उसे अपने मुख में डालना चाहते थे.    

बालाकाभियुखो बालो बाळाक इव मूर्तिमान्‌ । ग्रहीतुकामो बालाक छुवतेऽम्बरमध्यगः ॥ २४ ॥

पर सूर्य तो काफ़ी दूर थे. हनुमान जी उसे पाने की कोशिश में उसकी ओर तेज़ी से उड़ने लगे. यह बहुत ही अद्भुत दृश्य था. जब देवताओं ने इस दृश्य को देखा तो, उन्हें बड़ा विस्मय हुआ. वह सब सोचने लगे कि, यह वेग तो बड़ा अद्भुत है. हमने ऐसा वेग किसी और देव या मनुष्य में नहीं देखा. यह तो अभी बालक है और इसकी गति इतनी तीव्र है, जब यह युवा हो जायेगा, तब इसका वेग तो अद्वितीय होगा. इस दृश्य को हनुमान जी के पिता केसरी ने भी देखा. वह पुत्र की कुशलता को लेकर चिंतित हो गए. उन्हें लगा कि, अगर यह सूर्य के अधिक निकट गया तो, सूर्य के तेज से झुलस भी सकता है. 

तमनुपुवते वायुः पुवन्त पुत्रमात्मानः । सर्यदाहभयाद्रक्षस्तुपारचयशी तल! ॥ २८

उन्होंने अपने पुत्र को बचाने के लिए, वायुदेव केसरी भी हनुमान के पीछे पीछे  चलने लगे. साथ ही उन्होंने अपनी वायु को बर्फ जैसा सर्द बना दिया. इधर जब सूर्यदेव ने इस बालक हनुमान को अपनी ओर आते देखा तो वह भी सजग हो गए. वह विचार करने लगे कि, यह अबोध बालक, जिसे अभी अपने अच्छे बुरे का ज्ञान  नहीं है, इसे बचाना चाहिए. इसके साथ साथ उन्होंने अपने दिव्य ज्ञान से यह पता लगा लिया कि, इसे आगे चल कर रामजी के बहुत से आवश्यक 

काम  भी करने वाले हैं. उस उद्देश्य को मध्य रख, हनुमान जी की हर प्रकार से रक्षा होनी चाहिए.

बालमीकि रामायण के एक और प्रसंग के अनुसार, जब हनुमान जी सूर्य को निगलने जा रहे थे, तो उसी समय राहू भी सूर्य ग्रहण के लिए उद्धत हो रहा था.

यमेव दिवसं होष ग्रहीतुं भास्करं प्लुतः । तमेव दिवसं राहुर्जिघुक्षति दिवाकरम्‌ ॥ ३१॥ 

अनेन च परामृष्टो राहुः सूयरथापरि । अपक्रान्तस्ततस्रस्तो राहुथन्द्राकमद्‌नः ॥ ३२ ॥

लेकिन जैसे ही हनुमान जी ने सूर्य देव के रथ के ऊपरी भाग को स्पर्श किया, तो राहु भयभीत हो कर वहाँ से भाग खड़ा हुआ.  राहू देवराज इन्द्र के पास सहायता माँगने जा पहुँचा. महाराज इन्द्र अपने एरावत पर सवार हो, मदद करने चल पड़े. उन्होंने अपने शस्त्र वज्र का प्रयोग किया, जो हनुमान जी की ठुड्डी पर जा लगा. इसलिए आज भी हनुमान जी की ठुड्डी पर उस घाव के निशान शेष हैं.

जैसे इंद्र में वर्षा को रोक कर प्रजा को परेशान करने की ताक़त थी, वैसे ही, केसरी महाराज मारुति में भी, पवन के वेग को रोक, प्रजा के लिए परेशानी उत्पन्न करने की क्षमता थी.  इस घटना के दौरान, देवराज इन्द्र से नाराज़ होकर , जब मारुति ने पवन को रोका, तो चारों ओर त्राहि त्राहि मच गई. बाक़ी सभी देवता,  वायुदेव केसरी के सम्मुख आ क्षमा याचना करने लगे. जनहित की दुहाई दे कर, उन्हें अपनी गति को पुन: प्रवाहित करने की प्रार्थना करने लगे. महाराज केसरी तुरन्त प्रसन्न हो गए, और अपनी गति से सभी के प्राणों के रक्षक बन गए.

राहोर्वचनमास्थाय ततः स कुपितोऽनिलः । अशरीर! शरीरेषु वायुश्चरति पाळयन्‌॥ ६० ॥

शरीरं हि विना वायं समतां याति दारुभिः वायः प्राणः सुखं बायर्वायुः सवेमिदं जगत्‌ ॥ ६१॥

केसरी महाराज ने सबको बताया कि, अब से वह सूक्ष्म रूप से (अशरीरी भाव) से सभी प्राणियों में, श्वास रूप में विद्यमान रहेंगे. हम सब जानते हैं कि, तब से यही वायु ही, इस जगत का आधार है. वायु के बिना जीवन के अस्तित्व जी कल्पना भी नहीं की जा सकती. और इस प्रकार, हनुमान जी के बचपन के इन प्रसंगों के कारण, हनुमान जी पवनपुत्र कहाए जाने लगे. और सभी उनकी शक्ति एवं गति का लोहा मानने लगे.

युवावस्था में, जब हनुमान जी रामजी से मिले, तो सीता जी की खोज के लिए इसी गति का  प्रयोग कर, महा पयोधि लाँघ गए. जब राम रावण युद्ध के बीच, लक्ष्मण जी मूर्छित ही गए, तो हनुमान जी अपनी तीव्र गति से हिमालय से संजीवनी बूटी उठा लाए. हनुमान जी बल बुद्धि में भी सबसे अग्रणी हैं. भक्तों का कोई ऐसा काम नहीं, जो हनुमान जी पूरा नहीं कर सकते. इसीलिए तुलसी बाबा ने हनुमान जी के बारे में लिखा:

कवन सो काज कठिन जग माहि, जो नहीं तात होई तुम्ह पाहि

और

हनुमान जी भी रामकाज का नाम सुनते ही तत्पर हो उठते हैं:

रामकाज लगि तव अवतारा,  सुनतहि भयहु परवता कारा

रामभक्त हनुमान जी को मेरा सादर प्रणाम. जय श्री राम !!!

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