
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: जब हनुमान जी ने मंदोदरी को सीता समझ लिया
हनुमान जी की सीता खोज कि कथा, सुन्दरकाण्ड का प्रमुख विषय है. रामचरितमानस में सुन्दरकाण्ड काफ़ी संक्षिप्त है, जबकि वाल्मीकि रामायण में यह प्रसंग बड़े विस्तार से है. मानस में सीता खोज में निकले हनुमान जी जब सीता को खोज रहे थे तो, तुलसी बाबा बस इतना ही लिख पाये:
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा, देखे जहँ तहँ अगनित जोधा
गयउ दसानन मंदिर मॉहीं, अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं
सयन किए देखा कपि तेहि, मंदिर महूँ न दिखि बैदेही
बस इतना ही. हनुमान जी ने इधर उधर वैदेही को ढूँढा, उन्हें कहीं नहीं मिली. फिर वह रावण के राजमहल में चले गए. वहाँ रावण तो सोता दिखाई पड़ा, लेकिन वैदेही का कोई अतापता वहाँ नहीं था.
यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि, हनुमान जी ने इससे पहले कभी सीता जी नहीं देखा था. उनके पास सीता जी का कोई चित्र भी नहीं था. और अगर दिख भी गई तो, कन्फ़ॉर्म करने के लिए, उस युग में, वीडियो कॉल की सुविधा भी नहीं थी. इसलिए जो भी खोजा जा रहा था, वह अनुमान के भरोसे खोजा जा रहा था. हनुमान जी के हृदय में एक छवि थी कि, सीता जी एक सुंदर सुकोमल राजकुमारी है, जो उनके इष्टदेव की पत्नी है. उन्होंने वल्कल धारण किए होंगे. वह बड़ी ही उदास एवं शालीन वेशभूषा में होंगी. साथ ही यह भी भय था कि, रावण ने अपनी आधीनता में उनका वेश परिवेश परिवर्तन न कर दिया हो? सु-काण्ड -10/9,10,11
वृतमांभरणेदिव्येः सुरूपं कामरूपिणम् ॥ सवृक्षवनगुरमाद्ं प्रसुप्तमिव मन्दरम् ॥ ९ ॥ करीडित्वोपरतें रात्रौ वराभरणभूषितम् ॥ श्रियं राक्षसकन्यानां राक्षसानां सुखावहम् ॥ १० ॥ ` पीत्नाऽप्युपरतं चापि ददशं स महाकपिः ॥ भाखरे शयने वीरं प्रसुप्तं राक्षसाधिपम् ॥ ११ ॥
लंका के इस राज महल के, इस शयनागार में हनुमान जी ने एक बहुत बड़ा पलंग देखा, जिस पर महा विशालकाय रावण सोया पड़ा था. उसने सोते हुए भी, तरह तरह के अलंकार पहने हुए थे. उसके अंगों पर चन्दन का लेप लगा हुआ था. उसकी कांति मेघों के समान श्यामल रंग की थी. उसके चारों ओर कई स्त्रियाँ सो रही थी. ऐसा लगता था कि, कुछ देर पहले इन्होंने खूब मदिरा पी हो. मदिरा की गन्ध चारों ओर थी. शायद सोने से पहले रावण ने इन स्त्रियों के साथ कई तरह काम क्रीड़ा की हो. सभी मदहोश स्थिति में अस्त व्यस्त स्थिति में सो रहे थे. सु-काण्ड -10/45
काचिदाडम्बरं नारी यजसंभोगपीडितम् ॥ कत्वा कमलपत्राक्षी प्रसु्ना मदमोहिता ॥ ४५॥
रावण की छाती पर चन्दन का, एक बड़ा हार सुशोभित था. उसने नीचे के हिस्से में ढीले ढाले रेशमी वस्त्र पहन रखे थे. उसने पीले रंग की बड़ी सुंदर चादर ऊपर ली हुई थी. इतनी बारीकी से एक एक छोटी बड़ी चीज़ का वर्णन, वाल्मीकि रामायण में अद्भुत है. सु-काण्ड -11/46
रक्तचन्दनदिग्धेन तथा हारेण श्रोभिना ॥ पीनायतविज्ञालेन वक्षसाभिविरीजितम् ॥४६॥
रावण की एक तरफ़ एक कजरारे नयनों वाली एक सुकन्या एक वाद्य के साथ आलिंगन बद्ध हो कर सो रही थी. ऐसा प्रतीत होता था, मानो एक नववत्सला अपने किसी शिशु के साथ चिपक कर सो रही हो. सु-काण्ड -10/38
अन्या कक्षगतेनैव मङ्केनापितेक्षणा ॥ प्रशुक्ा भामिनी भाति बालपुत्रैव वत्सला ॥३८॥
आगे हनुमान जी ने देखा एक कमल नयनी सुंदरी वीणा के साथ आलिंगन बद्ध है. मानो, एक कामभाव से युक्त एक कामिनी, अपने प्रियतम की भुजाओं में लेटी हो.
दूसरी ओर नशे से थकी हुई एक अनिध्य सुंदरी रावण की बाँह को तकिया बनाए सो
रही थी. सु-काण्ड -10/40
कैचिदटंशं परिष्वज्य सुप्रा कमरुलीचना ॥ रहः प्रियतमं गृ सकौमेव च कामिनी ॥ ४० ॥
एक और दिशा में एक युवती निद्रावशजल से भरी सुराही को लुढ़का कर, भीगी अँगिया के साथ बेसुध पड़ी थी. उसका, सौंदर्य, बसन्त ऋतु में खिले विभिन्न रंगो के फूलों की माला के समान प्रतीत हो रहा था. सु-काण्ड -10/46
कट्शीमपविध्यान्या प्रसुप्रा भाति भामिनी ॥ वसन्ते पुष्पक्ञवला माङेव परिमाजिता ॥ ४६॥
रावण के बिल्कुल निकट, हनुमान जी को, गोरे रंग की एक और रमणी नज़र आई. उसका सौंदर्य बहुत ही मन को लुभाने वाला था. उसके अंग अंग से लावण्य फूट रहा था. वैसे तो वह रावण की पत्नी मंदोदरी थी, लेकिन हनुमान जी ऐसा अनुमान हुआ कि, यही सीता है. बस ऐसा विचार आते ही, हनुमान जी बड़े प्रसन्न हो उठे कि, उन्हें सीता मिल गई. अब केवल उसे रावण के चंगुल से बाहर निकालना शेष था. सु-काण्ड -10/52,53
गोरं कैनकवणोज्गीमिष्टामन्तःपुरेशवरीम् ॥ कपिमन्दोदरी तत्र शयानां चाररूपिणीम् ॥ ५२ ॥
स तां दृष्ट्रा महाबाहुभूषितां मारुतात्मजः ॥ तकेयामास सीतेति रूपयौवनसंपदा !!
हेण महता युक्तो ननन्द हरियूथपः ॥५३!!
यहाँ एक बात स्पष्ट हैं कि, ऋषि वाल्मीकि ने इतनी बारीक़ी से हनुमान जी की अंत:पुर की यात्रा को वर्णित किया है. उसमें शयनागार में सो रही बहुत सी स्त्रियों, जोकि मदिरा पान की अवस्था में, अस्त व्यस्त स्थिति में सोई पड़ी हैं, का वर्णन करने में बिल्कुल ही नहीं हिचकिचाए. यह वाल्मीकि जी की लेखनी का कमाल है. इससे पाठक भी थोड़ा विचलित होता है और कथा का पात्र (हनुमान जी) भी.
जब हनुमान जी शयनागार से बाहर निकले तो इन सब स्त्रियों को देख, उनके मन में कई तरह के विचार आने लगे. एक तो यह कि, कहीं मैंने कोई पाप तो नहीं कर दिया. और जिस अवस्था में उन्होंने मंदोदरी को वहाँ देखा, उसे देख उन्हें, मन मन ही मन सीता जी का भ्रम हुआ. इस पर हनुमान जी गम्भीरता से विचार करने लगे. सुन्दरकाण्ड -sarg- 11/2,3,4
न रामेण वियुक्ता सा खघुमति भामिनी ॥ न भोक्त नाप्यरंकै न पानशुपसेवित् ॥ २॥
नान्यं सरगुपसातुं सुराणामपि चेश्वरम् II ॥ न हि रामसमः कथिद्धियते त्रिदशेष्वपि ॥ ३ ॥ अन्येयमिति निधि वीनभूमो चचार सः ॥ पान भूमो हरि श्रेष्ठ: सीता संदर्श नो उत्सुक: ॥ ४॥
हनुमान जी को लगा कि, सीता जी, रामजी से बिछुड़ कर, इस तरह मदहोश स्थिति में रावण के शयनगृह में नहीं हो सकती. वह मानसिक रूप से किसी भोग विलास में लिप्त नहीं हो सकती. और किसी भी अवस्था में, मदिरा पान तो बिल्कुल भी नहीं कर सकती. वह किसी पर पुरुष के पास कदापि नहीं जायेंगी. भले ही वह पुरुष कोई देवता ही क्यों न हो. राम की पत्नी, माँ सीता मर्यादा का इतना बड़ा उल्लंघन नहीं कर सकती. यह विचार आते ही, हनुमान जी को विश्वास हो गया कि, जिसे उन्होंने रावण के शयनगृह में देखा था, वह सीता जी नहीं थी. इस विश्वास के बाद उन्होंने सीता को खोजने का कार्य पुन: आरंभ कर दिया. 11/36, 39
परदारावरोधख प्रसुप्रख निरीक्षणम् ॥ इदं खल ममादय्थं धर्म लोपम करिष्यति ॥ ३६ ॥
काममं दृष्टा मया सर्वा विश्वस्ता रावण स्त्रीय: ॥
न तु मे मनसा किंचिद वैकृत्यम उप पद्यते ॥ ३९ ॥
जहाँ जहाँ हनुमान जी हो कर आये थे, वहाँ वहाँ उन्होंने बहुत सी स्त्रियों को मदिरा के नशे में चूर, बड़ी अस्त व्यस्त, स्थिति में देखा था. ऐसे में हनुमान जी के हृदय में एक विचार कौंधा कि, उन्होंने इतनी सारी पराई स्त्रियों को अर्ध नग्न स्थिति में देखा, इससे उनके धर्म पर कोई आँच तो नहीं आयेगी? कहीं उनका धर्म विनष्ट तो नहीं हो जाएगा? मैंने इस शयन कक्ष में, बहुत सारी स्त्रियों का अपहरण करने वाले, महा पापी रावण को देखा, यह तो बहुत बड़ा पाप का कारण हो सकता है. तभी उनके मन में एक और विचार आया कि, यद्यपि मैंने इतनी सारी स्त्रियों को कामुक अवस्था में देखा हो, लेकिन मेरे मन में कोई काम विकार नहीं आया. मेरे मन में अभी भी अपने उद्देश्य की शुद्धता है. मेरा मन पूरणतया स्थिर है. इसलिए मेरा परस्त्री दर्शन, धर्म का विलोप करने वाला पाप नहीं हो सकता.
यह मानसिक संतोष आते ही, हनुमान जी ने एक नये उत्साह के साथ सीता जी को इधर उधर खोजना आरम्भ कर दिया. सहसा उन्हें एक ऐसा सुंदर घर दिखाई दिया जिसके बाहर राम नाम का चिन्ह बना हुआ था. और बाहर एक तुलसी का पौधा लहलहा रहा था. यह रावण के छोटे भाई विभीषण का घर था.
रामायुध अंकित गृह। सोभा बरनि न जाई
नव तुलसिका वृन्द तहँ, देखी हरविष कपिराई
उन्होंने दरवाज़ा खटखटाया, विभीषण जी, बाहर आए, बड़े प्रेम से मिले. हनुमान जी ने उन्हें अपना उद्देश्य बताया. विभीषण को रामदूत हनुमान जी, से मिल कर बहुत ख़ुशी हुई. उन्होंने हनुमान जी की सारी कहानी सुनी. विभीषण ने हनुमान जी को बताया कि, जब रावण यह अपराध कर के आया था, तो उसी समय भी उन्होंने रावण को सलाह दी थी कि, यह उचित नहीं है. और उन्हें सीता को तुरंत लौटा देना चाहिए. पर रावण ने उसकी एक नहीं सुनी.
फिर विभीषण ने हनुमान जी को सीता का पता बताया और तरीक़ा समझाया कि, सीता जी से कैसे मिला जा सकता है. हनुमान जी यह सब सुन बड़े प्रसन्न हुए.
जुगुति बिभीषण सकल सुनाई, चलउ पवनसुत बिदा कराई
करि सोऊ रूप गयउ पुनि तहवाँ, बन असोक सीता रह जहवाँ
इस प्रकार वाल्मीकि रामायण की एक और विरली कथा आपके सामने प्रस्तुत है. यह पढ़ सुन कर यही कहने को मन करता है, बजरंग बली की जय, पवनसुत महावीर की जय. “जय श्री राम”