IndoUS Tribune : असम के मंदिरों की यात्रा — तीसरा पड़ाव (हयग्रीव माधव मंदिर, हाजो)

IndoUS Tribune : असम के मंदिरों की यात्रा — तीसरा पड़ाव (हयग्रीव माधव मंदिर, हाजो)

उमानंद मंदिर की शांत, अलौकिक और आध्यात्मिक अनुभूति के पश्चात IndoUS Tribune की यह पावन यात्रा अब अपने तीसरे पड़ाव की ओर अग्रसर होती है। ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित शिवधाम ने जहाँ मन को स्थिरता, शांति और भक्ति का अद्भुत अनुभव कराया, वहीं अब हमारी यात्रा हमें ऐसे दिव्य स्थल पर ले आती है जहाँ ज्ञान, आस्था, समन्वय और सभ्यता का अद्वितीय संगम दिखाई देता है।

हमारा अगला पड़ाव है हाजो का प्रसिद्ध हयग्रीव माधव मंदिर, जो न केवल असम, बल्कि सम्पूर्ण भारत की बहुधार्मिक चेतना, सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रतीक है। यह वह स्थल है जहाँ हिंदू श्रद्धा और बौद्ध आस्था एक साथ नतमस्तक होती हैं।

तीसरा पड़ाव – हयग्रीव माधव मंदिर, हाजो

असम के कामरूप जिले में स्थित ऐतिहासिक नगर हाजो, गुवाहाटी से लगभग 30 किलोमीटर पश्चिम दिशा में स्थित है। यह नगर सदियों से धार्मिक सहअस्तित्व, आध्यात्मिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए विख्यात रहा है। इसी पवित्र भूमि पर मणिकूट पहाड़ी के शिखर पर स्थित है भव्य हयग्रीव माधव मंदिर, जो भगवान विष्णु के अश्वमुख अवतार हयग्रीव को समर्पित है।

“हयग्रीव” शब्द दो भागों से मिलकर बना है—

  • हय अर्थात घोड़ा 
  • ग्रीव अर्थात गर्दन या मुख 

अर्थात यह भगवान विष्णु का वह स्वरूप है जिसमें वे अश्वमुख धारण कर दिव्य ज्ञान और वेदों की रक्षा करते हैं। भारतीय दर्शन में हयग्रीव को विद्या, बुद्धि, स्मरण शक्ति और ज्ञान के देवता के रूप में भी पूजा जाता है।

हिंदू और बौद्ध आस्था का दुर्लभ संगम

हयग्रीव माधव मंदिर की सबसे अनूठी विशेषता यह है कि यह मंदिर हिंदू और बौद्ध—दोनों परंपराओं के लिए समान रूप से पूजनीय है।

हिंदू श्रद्धालु इसे भगवान विष्णु का पवित्र धाम मानते हैं, वहीं अनेक तिब्बती, भूटानी और स्थानीय बौद्ध अनुयायी विश्वास करते हैं कि यही वह स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध ने महापरिनिर्वाण प्राप्त किया था

इसी कारण यहाँ देश-विदेश से बौद्ध भिक्षु, साधक और पर्यटक भी दर्शन हेतु आते हैं। यह दृश्य भारत की उस सनातन भावना को दर्शाता है जहाँ विभिन्न मार्ग अंततः एक ही सत्य की ओर जाते हैं।

इतिहास की परतों में समाया मंदिर

इतिहासकारों का मत है कि इस मंदिर की मूल स्थापना पाल वंश के शासनकाल में 6वीं से 10वीं शताब्दी के बीच हुई थी। बाद में समय, आक्रमणों और प्राकृतिक क्षति के कारण मूल संरचना प्रभावित हुई।

वर्तमान भव्य पत्थर निर्मित मंदिर का पुनर्निर्माण कोच वंश के राजा रघुदेव नारायण ने वर्ष 1583 ईस्वी में कराया। इसके बाद भी मंदिर को विभिन्न राजवंशों का संरक्षण प्राप्त होता रहा।

अहोम राजाओं ने भी मंदिर की व्यवस्था, दीप प्रज्ज्वलन, भूमि दान और धार्मिक गतिविधियों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। यही कारण है कि यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि असम के राजनैतिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी साक्षी है।

स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना

हयग्रीव माधव मंदिर का स्थापत्य असम की प्राचीन कला, शिल्पकौशल और धार्मिक प्रतीकों का उत्कृष्ट उदाहरण है।

मंदिर की प्रमुख विशेषताएँ:

  • पत्थरों से निर्मित मजबूत संरचना 
  • ऊँचा शिखर, जो दूर से ही आकर्षित करता है 
  • निचले भाग में हाथियों की निरंतर उकेरी गई कतार 
  • बाहरी दीवारों पर विष्णु के दशावतार 
  • रामायण और महाभारत के दृश्य 
  • भक्तों, देवताओं और यक्ष आकृतियों की नक्काशी 
  • गर्भगृह में स्थापित काले पत्थर की दिव्य मूर्ति 

मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई हाथियों की कतारें शक्ति, स्थिरता और समृद्धि का प्रतीक मानी जाती हैं। विद्वानों के अनुसार इसकी शिल्पशैली एलोरा और पूर्वोत्तर भारतीय मंदिर परंपरा की झलक भी प्रस्तुत करती है।

पौराणिक कथा – वेदों की पुनर्प्राप्ति

कालिका पुराण तथा अन्य वैष्णव ग्रंथों के अनुसार एक समय दैत्य मधु और कैटभ ने ब्रह्माजी से वेदों का अपहरण कर लिया। संसार अज्ञान में डूबने लगा।

तब भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप धारण किया, पाताल लोक में जाकर उन दैत्यों का वध किया और वेदों को पुनः प्राप्त कर संसार को ज्ञान का प्रकाश लौटाया।

इसी विजय के प्रतीक रूप में भगवान यहाँ विराजमान हुए। इसलिए यह मंदिर ज्ञान, धर्म और सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है।

मणिकूट पहाड़ी का आध्यात्मिक वातावरण

मंदिर जिस मणिकूट पहाड़ी पर स्थित है, वहाँ पहुँचते ही वातावरण बदल जाता है। ऊपर चढ़ते समय वृक्षों की हरियाली, पक्षियों की ध्वनि, मंद वायु और घंटियों की अनुगूँज मन को भक्ति भाव से भर देती है।

पहाड़ी से दूर तक फैले असम के हरित दृश्य और ब्रह्मपुत्र क्षेत्र का मनोहारी विस्तार दिखाई देता है। सूर्योदय और संध्या के समय यह स्थल विशेष रूप से दिव्य प्रतीत होता है।

माधव पोखरी – श्रद्धा और प्रकृति का संगम

मंदिर के निकट स्थित विशाल जलाशय माधव पोखरी भी इस तीर्थ का प्रमुख आकर्षण है।

यहाँ पाए जाने वाले दुर्लभ काले नरम कवच वाले कछुए भक्तों द्वारा पवित्र माने जाते हैं। श्रद्धालु इन्हें आहार कराते हैं और शुभ मानते हैं।

यह पोखरी केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।

उत्सव और मेले

हयग्रीव माधव मंदिर वर्ष भर भक्ति और उत्सवों से जीवंत रहता है। प्रमुख पर्वों में शामिल हैं:

दौल उत्सव (होली)

यहाँ होली को “दौल उत्सव” के रूप में अत्यंत भव्यता से मनाया जाता है। भजन, कीर्तन, शोभायात्रा और रंगोत्सव वातावरण को भक्तिमय बना देते हैं।

जन्माष्टमी

भगवान कृष्ण जन्मोत्सव पर हजारों श्रद्धालु रात्रि जागरण और पूजा में सम्मिलित होते हैं।

बिहू

असम का प्रमुख सांस्कृतिक पर्व बिहू भी यहाँ विशेष उल्लास के साथ मनाया जाता है।

नवरात्रि और अन्य वैष्णव पर्व

पूरे वर्ष विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और सामूहिक पूजाएँ आयोजित होती रहती हैं।

हाजो – धार्मिक एकता की भूमि

हाजो केवल हयग्रीव माधव मंदिर तक सीमित नहीं है। यह नगर भारत की गंगा-जमुनी संस्कृति का अद्भुत उदाहरण है।

यहाँ स्थित हैं:

  • पौआ मक्का दरगाह – मुस्लिम श्रद्धालुओं का प्रमुख स्थल 
  • केदारेश्वर मंदिर – शिव धाम 
  • अन्य अनेक प्राचीन तीर्थ 

इस प्रकार हाजो वह भूमि है जहाँ मंदिर, मस्जिद और आध्यात्मिक धरोहरें एक साथ मिलकर सहिष्णुता का संदेश देती हैं।

यात्रियों के लिए उपयोगी जानकारी

कैसे पहुँचें:

  • गुवाहाटी से सड़क मार्ग द्वारा 45 मिनट से 1 घंटा 
  • टैक्सी, निजी वाहन और स्थानीय बस उपलब्ध 

दर्शन समय:

  • प्रातःकाल और संध्या सर्वोत्तम समय माने जाते हैं 

आध्यात्मिक संदेश

हयग्रीव माधव मंदिर हमें सिखाता है कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि श्रद्धा, विनम्रता और सत्य के मार्ग पर चलने में है। यह मंदिर बताता है कि धर्म का सार विभाजन नहीं, बल्कि समन्वय है।

यहाँ विष्णु की उपासना भी है, बुद्ध की स्मृति भी; परंपरा भी है, आधुनिक चेतना भी; इतिहास भी है, और भविष्य के लिए प्रेरणा भी।

निष्कर्ष

हयग्रीव माधव मंदिर की यह यात्रा हमें यह अनुभव कराती है कि भारत की आध्यात्मिक विरासत केवल भव्य मंदिरों में नहीं, बल्कि उन स्थलों में बसती है जहाँ ज्ञान, सद्भाव और आस्था साथ-साथ फलते-फूलते हैं।

मणिकूट पहाड़ी पर स्थित यह दिव्य धाम आज भी सदियों पुरानी परंपराओं, सांस्कृतिक सौंदर्य और धार्मिक समरसता का प्रकाश स्तंभ बना हुआ है।

IndoUS Tribune की असम यात्रा का यह तीसरा पड़ाव हमें यह संदेश देता है कि भारत की आत्मा उसकी विविधता में निहित है। जहाँ अनेक मार्ग हैं, पर गंतव्य एक है।

अब हमारी यह दिव्य यात्रा आगे बढ़ेगी असम के पूर्वोत्तर अंचल में स्थित रहस्यमयी, शक्तिपूर्ण और ऐतिहासिक ताम्रेश्वरी मंदिर की ओर, जहाँ प्राचीन शक्ति साधना और इतिहास के अद्भुत अध्याय हमारा इंतजार कर रहे हैं।

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