भगवान शिव के प्रति गाए जाने वाले, मृत्युंजय मन्त्र की महिमा

भगवान शिव के प्रति गाए जाने वाले, मृत्युंजय मन्त्र की महिमा

By: Rajendra Kapil

हमारे सनातन धर्म में दो मंत्रों का बड़ा ही महत्व है. एक है गायत्री मन्त्र और दूसरा है मृत्युंजय मन्त्र. गायत्री मन्त्र जिसकी उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई, विश्व भर में मन की शांति के लिए गाया जाता है.

ॐ भूर्भुव॒: स्व॒: तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒
भर्गो॑ दे॒वस्य॑ धीमहि। धियो॒ यो न॑: प्रचो॒दया॑त्॥

यह मन्त्र हर श्रद्धावान को जीवन में सुबुद्धि से चलने की प्रेरणा देता है. यह इतना प्रभाव शाली है कि, स्वयं भगवान कृष्ण ने भगवद् गीता में, इसे मन्त्रों का राजा कहा है. भगवान कृष्ण ने गीता के दसवें अध्याय में स्पष्ट कहा है कि, अगर किसी को मंत्रों में मेरी छवि देखनी हो तो, गायत्री मंत्र मैं हूँ.

बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः ॥३५॥

इस प्रकार गायत्री मंत्र की महिमा विश्व के सनातन समाज में बहुत ही पूजनीय है. मन की शांति के लिए, एवं जीवन को उचित तरीके से जीने के लिए, इस मन्त्र का जाप निरन्तर किया जाता है. विश्व में बहुत से गायत्री परिवार/ संस्थाएँ हैं, जो इस महामन्त्र का प्रचार एवं प्रसार निरन्तर करते रहते हैं.

दूसरा मन्त्र जिसकी चर्चा एवं जाप निरन्तर होता है, वह है भोलेनाथ को रिझाने वाला मृत्युंजय मन्त्र:- 

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्युर्मुक्षीय माऽमृतात् ||

इस मन्त्र का सीधा सरल शब्दों में अर्थ है कि, एक मन्त्र जो मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता है. प्रश्न उठता है कि, आख़िर इस मन्त्र का आविर्भाव कब और कैसे हुआ?  पुरातन काल में एक ऋषि हुए थे, मृकांदु. उन्होंने अपनी पत्नी मनस्विनी के साथ मिल कर, भगवान शिव की बड़ी आराधना की. भगवान शिव ने उन्हें एक पुत्र का आशीर्वाद दिया. साथ ही एक प्रश्न पूछा कि, तुम्हें लम्बी आयु वाला बीमार पुत्र चाहिए अथवा छोटी आयु वाला एक स्वस्थ पुत्र. ऋषि दम्पति ने स्वस्थ पुत्र को चुना. नियति ने उसकी आयु १६ वर्ष नियुक्त की. इस पुत्र का नाम रखा गया, मार्कण्डे. ऋषि मृकांदु ने मार्कण्डे को बचपन से ही शिवभक्ति का पाठ पढ़ाना शुरू कर दिया. कुछ ही वर्षों में, यह बालक एक तेजस्वी युवक बन गया.

जब मार्कण्डे १६ वर्ष का हुआ, तो एक दिन यमराज स्वयं, उसके प्राणों को साथ ले जाने के लिए, उसके द्वार पर आ धमके. युवा मार्कण्डे घबरा गया. मृत्यु को सामने देख अच्छे अच्छे घबरा जाते हैं. मार्कण्डे को कुछ और नहीं सूझा, वह सामने पड़े शिवलिंग को लिपट कर रोने लगे. शिव से बारम्बार प्रार्थना करने लगे कि, मेरी रक्षा कीजिए. मार्कण्डे की असीम भक्ति देख, शिव वहाँ प्रगट हुए और मार्कण्डे को यमराज से बचा लिया. यमराज को शिव बोले, यह मेरा भक्त है. मैं इसको लम्बी आयु का वरदान देता हूँ. अब यह मेरी शरण में है. साथ ही भगवान शिव ने उसके कान में यह मृत्युंजय मन्त्र फूँका और कहा, इसका जप नित्य प्रति करते रहो, यह तुम्हारी एवं इसको जपने वाले किसी भी भक्त को निरोगता एवं लंबी आयु प्रदान करेगा. इसके बाद यह मन्त्र मार्कण्डे मंत्र का नाम से प्रसिद्ध हो गया.

इस मृत्युंजय की महिमा को बहुत सारे भक्तों ने अपने संकट काल में परखा. यह अपनी अचूक शक्ति के लिए हज़ारों वर्षों से शिव भक्तों का प्रिय मन्त्र बना हुआ है. इस मन्त्र के आरम्भ के भाग में त्र्यंबकेश्वर शिव की आराधना की गई है, जिनकी कृपा से शरीर का पुष्टिवर्धक एवम सुगंधित हो जाता है. त्रिनेत्रधारी प्रभु शिव, इस मन्त्र से प्रसन्न होकर, अपने भक्तों की हर बीमारी से रक्षा करते हैं, और कभी कभी तो उसकी मृत्यु को भी टाल देते हैं.

इस मन्त्र के दूसरे भाग में मृत्यु को एक सहज प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया गया है. जैसे जीवन सत्य है, ठीक वैसे ही मृत्यु भी एक सहज सत्य है. इसको टाला तो जा सकता है, लेकिन इससे बचा नहीं जा सकता. भगवद् गीता में प्रभु कृष्ण ने भी मृत्यु को बड़े सरल शब्दों में समझाया है.

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।

तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥2.22॥

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए बताया कि, मृत्यु निश्चित है,  लेकिन यह ऐसे ही है, जैसे कोई प्राणी पुराने कपड़े छोड़ नये कपड़े बदल रहा हो. यह आत्मा भी शरीर के बूढ़े हो जाने पर, मृत्यु के समय, पुराने शरीर को छोड़ नये एवं स्वस्थ शरीर में प्रवेश कर जाती है. मृत्युंजय मंत्र में, इसे दूसरी तरह से समझाया गया है. यहाँ कहा गया है, जैसे बेल पर लगी ककड़ी, जब पूर्णतया पक जाती है, तो वह बिना प्रयास किए, बेल से अलग हो जाती है. ठीक इसी प्रकार, जब भक्त जब पूर्णता को प्राप्त कर लेता है तो, उसकी आत्मा बिना किसी कष्ट के यह शरीर छोड़ कर नये शरीर में प्रवेश कर जाती है. यह एक बहुत ही सहज एवं सरल प्रक्रिया है. ऐसे में मृत्यु के समय किसी को भी दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है.

मृत्युंजय तथा महा मृत्युंजय

जैसे जैसे समय निकलता गया, कुछ विद्वानों ने इस मन्त्र की महिमा को और भी गौरवान्वित करने के लिए, इसमें कुछ और बीज शब्द जोड़ कर इसे और भी शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया. मूल मन्त्र के आगे – ऊँ जूँ  स: ऊँ भूर्भुव॒: स्व॒: और मन्त्र के अंत में –  ऊँ क्लीम

स: ह:  जैसे बीज शब्द जोड़ कर इस मन्त्र को महा मन्त्र के उच्चतम पद पर बैठा दिया.

शिव भक्ति में डूबे भक्त गण, जिनकी भोलेनाथ पर अपार श्रद्धा होती है, वह इस मन्त्र का जाप कर, अपने आप को अति भाग्यशाली मानते हैं. भोले बाबा की कृपा की अनुभूति करते हैं. और अगर कोई शारीरिक कष्ट आ जाए, तो आशुतोष की कृपा से ठीक भी हो जाते हैं.

इस प्रकार मृत्युंजय मन्त्र का प्रभाव एवं महिमा विश्वव्यापी है. जहाँ जहाँ भगवान शिव की उपासना करने वाले निवास करते रहेंगे, वहाँ वहाँ इस इस मन्त्र का उद्घोष युगों युगों तक होता रहेगा. शिव की नगरी वाराणसी में तो यह सुमधुर  मंत्रोच्चार दिन रात सुनाई पड़ता है. भोले बाबा के दयालु चरणों में हमारा कोटि कोटि नमन

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