IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” — बिहार अध्याय

IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” — बिहार अध्याय

तीसरा पड़ाव — मुंडेश्वरी देवी मंदिर, कैमूर

IndoUS Tribune की विशेष श्रृंखला “भारत के मंदिरों की यात्रा” के अंतर्गत बिहार की हमारी आध्यात्मिक यात्रा अब एक ऐसे दिव्य और ऐतिहासिक तीर्थ तक पहुँच रही है, जिसे विश्व का सबसे प्राचीन जीवित हिंदू मंदिर माना जाता है। महाबोधि मंदिर, बोधगया और विष्णुपद मंदिर, गया की पावन यात्रा के बाद अब हमारा तीसरा पड़ाव है — बिहार के कैमूर जिले की पहाड़ियों पर स्थित अद्भुत और रहस्यमयी मुंडेश्वरी देवी मंदिर

बिहार की यह भूमि केवल ज्ञान, मोक्ष और तपस्या की धरती ही नहीं, बल्कि शक्ति साधना, तंत्र उपासना और सनातन संस्कृति की हजारों वर्षों पुरानी परंपराओं का जीवंत केंद्र भी रही है। कैमूर पर्वतमाला की पौनरा पहाड़ी पर लगभग 608 फीट की ऊँचाई पर स्थित यह मंदिर भारतीय सभ्यता, वास्तुकला और अखंड आस्था का अनमोल प्रतीक है। यहाँ सदियों से निरंतर पूजा-अर्चना होती आ रही है, जो इसे विश्व के सबसे प्राचीन सक्रिय हिंदू मंदिरों में विशेष स्थान प्रदान करती है।

विश्व का सबसे प्राचीन जीवित हिंदू मंदिर

मुंडेश्वरी देवी मंदिर को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) तथा बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड द्वारा विश्व के सबसे पुराने कार्यरत हिंदू मंदिरों में शामिल माना गया है। ASI के अनुसार इस मंदिर की प्राचीनता लगभग 108 ईस्वी तक पहुँचती है, जबकि कई इतिहासकार इसकी वर्तमान स्थापत्य संरचना को 6वीं–7वीं शताब्दी का मानते हैं।

यह मंदिर 1915 से ASI द्वारा संरक्षित स्मारक घोषित है। यहाँ की विशेषता केवल इसकी प्राचीनता नहीं, बल्कि लगभग दो हजार वर्षों से निरंतर चल रही पूजा-पद्धति और धार्मिक परंपरा भी है।

माँ मुंडेश्वरी की पौराणिक कथा

पुराणों के अनुसार इस क्षेत्र में चंड और मुंड नामक असुरों का अत्याचार बढ़ गया था। देवी दुर्गा ने अपने उग्र रूप में प्रकट होकर इन दैत्यों का संहार किया। कहा जाता है कि देवी ने मुंड का वध इसी पर्वत पर किया था, जिसके कारण उनका नाम “मुंडेश्वरी” पड़ा।

मंदिर में विराजमान देवी की प्रतिमा महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में है। माँ को दस भुजाओं के साथ भैंसे पर आरूढ़ दर्शाया गया है, जो बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।

शिव और शक्ति का अद्भुत संगम

मुंडेश्वरी मंदिर की सबसे बड़ी आध्यात्मिक विशेषता यह है कि यहाँ शिव और शक्ति दोनों की संयुक्त उपासना होती है। मंदिर के गर्भगृह के केंद्र में पंचमुखी शिवलिंग स्थापित है, जबकि देवी मुंडेश्वरी की प्रतिमा दक्षिण दिशा में स्थित है।

यह शिव-शक्ति का अद्वितीय संगम पूर्वी भारत की तांत्रिक साधना परंपराओं का भी महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है। यहाँ आज भी शक्ति उपासना और तांत्रिक परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

रंग बदलने वाला पंचमुखी शिवलिंग

मंदिर का पंचमुखी शिवलिंग श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं दोनों के लिए रहस्य और आकर्षण का विषय बना हुआ है। मान्यता है कि यह विशेष पत्थर से निर्मित शिवलिंग दिनभर सूर्य की किरणों के अनुसार अपना रंग बदलता प्रतीत होता है।

सुबह, दोपहर और शाम के समय शिवलिंग के रंगों में सूक्ष्म परिवर्तन देखने को मिलते हैं, जिसे श्रद्धालु दिव्य चमत्कार मानते हैं।

अनोखी “निर्जीव बलि” परंपरा

मुंडेश्वरी मंदिर की एक अत्यंत अनूठी परंपरा पशु बलि से जुड़ी है। यहाँ बलि के लिए लाए गए बकरे की हत्या नहीं की जाती। विशेष मंत्रोच्चार और धार्मिक प्रक्रिया के दौरान बकरा कुछ समय के लिए अचेत हो जाता है और बाद में उसे जीवित छोड़ दिया जाता है।

यह अनोखी परंपरा पूरे भारत में विरले ही देखने को मिलती है और श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था का विषय है।

अद्भुत स्थापत्य कला

मुंडेश्वरी मंदिर बिहार की प्रारंभिक नागर शैली वास्तुकला का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यह मंदिर पूरी तरह पत्थरों से निर्मित है और इसकी सबसे अनोखी विशेषता इसका अष्टकोणीय (Octagonal) आकार है, जो भारतीय मंदिर स्थापत्य में अत्यंत दुर्लभ माना जाता है।

मंदिर में चार प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से एक बंद और एक आंशिक रूप से खुला है। दीवारों पर सुंदर नक्काशी, द्वारपाल, गंगा-यमुना की मूर्तियाँ तथा पुष्प अलंकरण मंदिर की प्राचीन कलात्मक समृद्धि को दर्शाते हैं।

मुख्य प्रवेश द्वार के पश्चिम दिशा में विशाल नंदी की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर परिसर में गणेश, सूर्य और विष्णु की प्रतिमाएँ भी विद्यमान हैं।

ह्वेनसांग और विदेशी यात्रियों का उल्लेख

चीनी यात्री ह्वेनसांग ने 7वीं शताब्दी में अपनी भारत यात्रा के दौरान एक चमकते हुए पहाड़ी मंदिर का उल्लेख किया था, जिसे इतिहासकार मुंडेश्वरी मंदिर से जोड़ते हैं।

ब्रिटिश यात्रियों फ्रांसिस बुकानन, आर.एन. मार्टिन तथा डेनियल बंधुओं ने भी 18वीं और 19वीं शताब्दी में इस मंदिर का वर्णन किया था। 1790 में थॉमस डेनियल द्वारा बनाई गई मंदिर की चित्रकारी आज भी ऐतिहासिक दस्तावेज मानी जाती है।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

रामनवमी, महाशिवरात्रि और नवरात्रि के दौरान यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुँचते हैं। नवरात्रि के समय लगने वाला विशाल मेला पूरे बिहार और पूर्वी भारत में प्रसिद्ध है।

यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक निरंतरता, सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक है।

यात्रा और पहुँच

• स्थान — पौनरा पहाड़ी, रामगढ़ गाँव, कैमूर जिला, बिहार
• ऊँचाई — लगभग 608 फीट
• निकटतम रेलवे स्टेशन — मोहनिया-भभुआ रोड (लगभग 22 किमी)
• निकटतम हवाई अड्डा — लाल बहादुर शास्त्री अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, वाराणसी (लगभग 102 किमी)
• भभुआ जिला मुख्यालय से दूरी — लगभग 10–12 किमी
• पहाड़ी तक पहुँचने के लिए सीढ़ियाँ और सरकारी रोपवे सुविधा उपलब्ध

सितंबर से अप्रैल तक का समय यात्रा के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।

संरक्षण और पुनरुद्धार

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने मंदिर के संरक्षण और पुनरुद्धार के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। मंदिर के अंदर सफाई, प्राचीन मूर्तियों की मरम्मत, बिखरे पत्थरों का दस्तावेजीकरण, सौर ऊर्जा आधारित प्रकाश व्यवस्था और श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं का विकास किया गया है।

बिहार सरकार ने भी मंदिर तक बेहतर पहुँच और पर्यटन सुविधाओं के लिए विशेष बजट आवंटित किया है।

निष्कर्ष

कैमूर की पहाड़ियों पर स्थित मुंडेश्वरी देवी मंदिर केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारत की हजारों वर्षों पुरानी सनातन चेतना, शक्ति साधना और सांस्कृतिक निरंतरता का जीवंत प्रमाण है। यहाँ की अखंड पूजा परंपरा, रहस्यमयी शिवलिंग, अद्वितीय स्थापत्य कला और माँ मुंडेश्वरी की दिव्य उपस्थिति श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक ऊर्जा और आस्था से भर देती है।

IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” का बिहार अध्याय हमें लगातार भारत की अद्भुत धार्मिक विरासत, प्राचीन इतिहास और आध्यात्मिक वैभव से परिचित करा रहा है।

अब हमारी यह पावन यात्रा आगे बढ़ेगी गया स्थित प्राचीन और रहस्यमयी पातालेश्वर नाथ मंदिर की ओर, जहाँ भगवान शिव की अद्भुत पाताल परंपरा, धार्मिक मान्यताओं और आध्यात्मिक रहस्यों के एक और अनोखे अध्याय से हम परिचित होंगे।

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