
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: रावण का मायाजाल – रामजी का कटा हुआ मस्तक
By: Rajendra Kapil
रावण ज्ञानी था. रावण तपस्वी था. साथ ही रावण बहुत सारी सिद्धियों में पारंगत था. उसकी इतनी सफलता का रहस्य यह था कि, वह हर तरह के पैंतरे काम में लाता था. विपक्षी को परास्त करने में उसे साम, दान, दंड, भेद में से जो भी हथियार इस्तेमाल करना पड़े, वह चूकता नहीं था. राम रावण युद्ध में भी उसने कई तरह के खेल खेले.
रावण, शापवश सीता जी को, जो उसके अधीन थी, छू तक नहीं सकता था. सीता जी की इच्छा के विरुद्ध वह जा नहीं सकता था. लेकिन सीता का मनोबल तोड़नें का उसने हर सम्भव प्रयास किया. उन्हीं में से एक था कि, एक दिन वह माया निर्मित, रामजी का कटा हुआ सिर लेकर सीता के सामने आ खड़ा हुआ. उसने अपने एक राक्षस मित्र, विद्यु जिह्व से मंत्रणा की, जो अपनी मायावी कौशल्य से किसी का हूबहू मस्तक बना सकता था. युद्धकाण्ड सर्ग-31/7
विद्युज्िहं च मायाश्षमत्रवीद् राक्षसाधिपः । मोहयिष्यावहे सीतां मायया जनकात्मजाम् ॥७॥
कुछ दिनों की मेहनत से विद्यु जिह्व रामजी का कटा हुआ मस्तक बना कर रावण के पास ले आया. उसे देखते ही रावण की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा. रावण उसे सीता को दिखाने, अशोक वाटिका में चला आया. उसे देखते ही सीता घबरा गई. रावण को लगा कि, इससे निराश हो कर सीता, अपने आप को मुझे सौंप देगी. युद्ध काण्ड सर्ग 31/13-16
इद च बचन धृष्टमुवाच जनकात्मजाम ॥१३॥
सान्त्व्यमाना मया भद्दे यमाश्रित्य विमन््यसे ॥१४॥ खरहन्ता स ते भरता राघवः खसमरे हतः।
छिन्नें ते सर्वथा मूल दर्षश्व निहतो मया॥ ९५॥ व्यसनेनाव्मनः सीते मम भाया भविष्यसि । विसजैतां मति मूंढे कि सतेन करिष्यसि ॥ १६ ॥
रावण बड़े सांत्वना भरे स्वर में बोला, हे भद्रे, जिन रामजी का तुम दिन रात ध्यान करती रहती हो. वह खर और दूषण का वध करने वाले, महावीर राम समरभूमि में मारे गए हैं. वह जो तुम्हारे विश्वास का आधार थे, तुम्हारा एक मात्र आश्रय थे, तुम्हें छोड़ कर चले गए हैं. आप उनका ध्यान त्याग दो. अब तुम मेरी सभी रानियों की पटरानी बन कर, मेरी पत्नी बन जाओ. मैं तुम्हें विश्व
का हर सुख प्रदान करने का प्रयत्न करूँगा. मेरा अपार वैभव अब तुम्हारे चरणों में अर्पित है.
सीता जी ने बड़े आश्चर्य चकित भाव से रामजी के मस्तक की ओर देखती जा रही थी. उसे बिल्कुल ही विश्वास नहीं हो रहा था कि, राम और उनकी सेना को, इतनी आसानी से हराया जा सकता है. सीता ने रावण से कहा कि, मुझे यक़ीन नहीं हो रहा. मैं अभी भी नहीं मानती, इसमें ज़रूर कोई न कोई तुम्हारी चाल है. युद्ध काण्ड सर्ग 31/20-21
अधाध्यनि परिश्रान्तमधरात्रे स्थितं बलम् । सुखसुप्त समासाद्य चरितं शत्रथ्म चरेः ॥ २० ॥
तत्परहस्तप्रणीतेन बेन महता मम | बलमस्य हत॑ रात्रो यत्र रामः सलक्ष्मणः ॥ २१॥
रावण अपनी सफ़ाई देने लगा. कुछ दिन पहले मेरा सेनापति प्रहस्त, अपनी सेना सहित रणभूमि पर गया, तो उस समय आधी रात हो चुकी थी. राम लखन सहित सारी सेना, थकी माँदी सो रही थी. ऐसे में मेरी सेना ने उनपर आक्रमण कर दिया और राम लखन सहित सारी सेना के एक बड़े भाग को नष्ट कर दिया. लेकिन प्रहस्त प्रमाण स्वरूप रामजी का सिर काट कर साथ लेता आया. तभी रावण ने अपने सेवक को आदेश दिया कि, वह रामजी का कटा हुआ मस्तक सीता के पास रख दे. साथ ही रामजी का मायावी धनुष भी था. इतने सारे प्रमाण किसी को भी भ्रमित कर सकते थे. सीता पर भी उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा. युद्ध काण्ड सर्ग –
३१/ ४२-४३
एवमुक्त तु तद् रक्षः शिरस्तत् प्रियद्शनम् । उपनिक्षिप्प सीतायाः क्षिप्रमन््तरधीयत ॥ ४२॥
रावणश्वापि चिक्षेप भाखरं कामुक महत्। त्रिषु छोकेषु विख्यातं रामस्येतदिति बवन् ॥ ४३॥
इस प्रकार रावण ने अपने मायाजाल से सीता जी को भ्रमित करने का पूरा पूरा प्रयास किया. और कुछ देर के लिए, सीता को भी विश्वास हो चला कि, वास्तव में कहीं मेरे प्रिय राम मारे तो नहीं गए. वह मस्तक को देख ज़ोर से विलाप करने लगी. उस विलाप में थोड़ा क्रोध भी था. क्रोध सीधा माता कैकेयी पर निकला. वह को कोसने लगी, जिसके कारण यह वनवास और अब वनवास में रामजी को मृत्यु का सामना करना पड़ा. युद्ध काण्ड सर्ग ३२/१-३
सा सीता तच्छिरों दृष्ठा तच्च कारमुंकमुत्तमम् । सुग्रीवप्रतिसंसगंमाख्यातं च हनूमता ॥ * ॥ नयने मुखवण च भतुस्तत्लदर्श मुखम | केशान केशाल्तदेश च त॑ च चूडामणिशुभम् ॥ २ ॥ पतैः. सर्वेरभिज्ञानेरभिज्ञाय खुदुखिता । विजगह कत्र कैकेयी क्रोशन्ती कुररी यथा॥ ३ ॥
विलाप करते करते सीता कुछ देर के लिए मूर्छित हो गई. पास खड़ी राक्षस सेविकाओं ने उन्हें सम्भाला. चेतना लौटने पर सीता का रोना और भी बढ़ गया. युद्ध काण्ड सर्ग ३२/८-९
हा हतास्मि महाबाहों वीरतमनुव्र॒त। इमां ते पश्चिमावस्थां गतास्मि विधवा कृता ॥ ८ ॥
प्रथम मरणं नाया भरतुर्वेशुण्यमुच्यते। खुवृत्तः साधुवृत्तायाः संवृत्तस्त्वं ममाग्नतः ॥ ९ ॥
वह विलाप में कहने लगी, हे प्रभु, मैंने आप पर भरोसा किया. आपने मेरी रक्षा का भार सम्भाला हुआ था. अब मैं किसके सहारे जिऊँगी? आप वीर व्रत का पालन करने वाले महान योद्धा थे. आज मुझे आपकी यह अवस्था देखनी पड़ रही है. आपने मुझे विधवा बना दिया. स्त्री का धर्म होता है वह पति से पहले ही स्वर्गलोक चली जाए, लेकिन आपने मुझे इस सौभाग्य से भी वंचित कर दिया. यह मेरे लिए बहुत ही दुख की बात है. युद्ध काण्ड सर्ग 32/34
एवं लालप्यमानायां सीतायां तत्र राक्षसः | अभिचक्राम भतीरमनीकस्थः कृताअलिः ॥ ३४ ॥
जब सीता का यह विलाप चल रहा था तो उसी समय रावण का एक सेवक आ कर सूचना देता है कि, सेनापति प्रहस्त आपसे तुरन्त मिलना चाहते हैं. उन्हें आपसे कोई ज़रूरी मन्त्रणा करनी है. इसको सुनते ही, रावण ने वहाँ उपस्थित राक्षसियों को कुछ निर्देश दिए और वहाँ से निकल गया. उसके जाते ही: युद्ध काण्ड सर्ग ३२/४०
अन्तधौनं तु॒ तच्छीष तच्च कामुंकमुत्तमम् ! ज़गाम रावणस्थैव निर्याणसमनन्तरम् ॥ ४० ॥
वहाँ पड़ा हुआ रामजी का मस्तक और उनका धनुष एकाएक अदृश्य हो गए.
रोती हुई सीता ने जब यह देखा तो, वह अचम्भे में पड़ गई. कुछ क्षणों के लिए उसे कुछ समझ नहीं आया कि, क्या हो रहा है? ऐसे में पास खड़ी एक सरमा नाम की सेविका ने सीता को समझाने का प्रयास किया. यद्यपि सरमा थी तो, रावण की परिचारिका, लेकिन वह रावण के मायावी प्रभाव से काफ़ी परिचित थी. उसे सीता जी के साथ बहुत सहानुभूति थी. ३२/५-६
सरमा ने सीता को समझाया कि, धीरज रखो. यह जो तुमने पिछले कुछ पलों में देखा है, वह सब मायाजाल था. मैंने छुप कर रावण और उसके मायावी मित्र विद्यु जिह्व की सारी बातें सुन ली थी, जिसमें उन्होंने यह मायावी योजना बनाई थी. यह सब तुम्हें भ्रमित करने के लिए किया गया था, ताकि तुम रावण की प्रति समर्पण कर दो. इसमें कोई सच्चाई नहीं थी. इससे पहले कि उसकी पोल खुलती, वह यहाँ से भाग निकला. युद्ध काण्ड सर्ग ३३/८
न शक्यं सौोध्तिकं करतुं रामस्य विद्तात्मनः । वधश्वच॒पुरुषव्यात्र तस्मिन् नेबोपपद्यते ॥ < ॥
आपके पति भगवान श्री राम पूर्णतः सकुशल हैं. उनका सोते समय कोई वध नहीं कर सकता. यह बिल्कुल असम्भव कार्य है. वानर सेना भी सुरक्षित है. तुम किसी प्रकार की चिन्ता मत करो, जल्द ही सब ठीक हो जाएगा. यह सब रावण की एक मायावी चाल थी. उसने तुम पर अपनी माया का जाल बिछाने का प्रयास किया ताकि तुम उसकी पटरानी बन सको. यह मस्तक और धनुष माया द्वारा निर्मित थे, इसीलिए कुछ ही देर में अदृश्य हो गए.
रामजी अपनी से सेना के साथ समुद्र के इस पार आ पहुँचे हैं और जल्द ही रावण को परास्त कर तुम्हें इस अशोक वाटिका की क़ैद से मुक्त करा कर ले जाएँगे. सरमा की बातें सुन सीता जी कि जान में जान आई और वह उसका बारम्बार धन्यवाद करने लगी. उस घटना के बाद सीता पुन: अपने नित्य प्रति के कार्य कलाप में व्यस्त रहने लगी और प्रभु राम का दिन रात ध्यान चिन्तन करने लगी. यह थी वाल्मीकि रामायण में छुपी एक रोचक कहानी.
“जय श्री राम”