IndoUS  Tribune की भारत के मंदिरों की यात्रा — गोवा अध्याय

IndoUS  Tribune की भारत के मंदिरों की यात्रा — गोवा अध्याय

पाँचवाँ और अंतिम पड़ाव : श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर, नारवे — भगवान शिव का प्राचीन और गौरवशाली धाम

गोवा से विशेष

IndoUS Tribune की विशेष श्रृंखला “भारत के मंदिरों की यात्रा” के गोवा अध्याय में हमारी आध्यात्मिक यात्रा अब अपने पाँचवें और अंतिम पड़ाव पर पहुँच गई है। पहले पड़ाव में हमने श्री मंगेशी मंदिर में भगवान शिव की प्राचीन आराधना और गोवा की धार्मिक परंपरा को जाना। दूसरे पड़ाव में श्री शांतादुर्गा मंदिर, कवलेम ने हमें शक्ति, शांति और समन्वय की परंपरा से परिचित कराया। तीसरे पड़ाव में श्री महालसा नारायणी मंदिर, मर्दोल ने विष्णु के मोहिनी स्वरूप और वैष्णव-शैव समन्वय की अद्भुत विरासत दिखाई, जबकि चौथे पड़ाव में श्री नागेशी मंदिर, बांदोड़ा ने स्वयंभू नागनाथ के रूप में भगवान शिव की प्राचीन आस्था से परिचित कराया।

अब इस यात्रा का अंतिम पड़ाव हमें नारवे स्थित श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर तक ले जाता है—गोवा के उन प्राचीन शिवधामों में से एक, जिसका इतिहास कदंब राजवंश, विजयनगर साम्राज्य, पुर्तगाली शासन और मराठा पुनरुत्थान की अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुड़ा हुआ है।

सप्तकोटेश्वर नाम की मान्यता

सप्तकोटेश्वर भगवान शिव का एक प्राचीन स्वरूप हैं और कदंब राजवंश के कुलदेवता माने जाते थे। स्कंद पुराण के सह्याद्रि खंड से जुड़ी मान्यता के अनुसार सात ऋषियों—सप्तर्षियों—ने यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी दीर्घ साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और इस स्थान पर सप्तकोटेश्वर नाम से विराजमान होने का वर दिया।

“सप्तकोटेश्वर” नाम का संबंध सात ऋषियों और उनकी दीर्घकालीन तपस्या से जोड़ा जाता है। यह स्थान कोंकण क्षेत्र के प्रमुख शिव तीर्थों में भी गिना जाता है।

कदंब राजवंश से गहरा संबंध

सप्तकोटेश्वर कदंब राजाओं के आराध्य देव थे। कदंब शासकों ने अपने सिक्कों पर भी भगवान सप्तकोटेश्वर की कृपा का उल्लेख कराया। उनके स्वर्ण सिक्कों पर अंकित “सप्तकोटिश्वरलब्ध वरप्रसाद” का अर्थ भगवान सप्तकोटेश्वर की कृपा से प्राप्त वरदान से जुड़ा है।

मूल मंदिर दिवर द्वीप के नारोआ में स्थित था। 14वीं शताब्दी में बहमनी सत्ता के आक्रमण के दौरान मंदिर को क्षति पहुँची और शिवलिंग को भी नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया गया। बाद में विजयनगर साम्राज्य के काल में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया।

पुर्तगाली काल और शिवलिंग की रक्षा

गोवा के इतिहास का सबसे पीड़ादायक अध्याय मंदिर के पुर्तगाली काल से जुड़ा है। 16वीं शताब्दी में दिवर द्वीप स्थित मूल मंदिर को नष्ट कर दिया गया। परंतु श्रद्धालुओं ने भगवान के पवित्र शिवलिंग को सुरक्षित रखने का प्रयास किया।

लोकपरंपरा के अनुसार, शिवलिंग को गुप्त रूप से निकालकर वर्तमान नारवे क्षेत्र में लाया गया। यह केवल एक धार्मिक प्रतीक की रक्षा नहीं थी, बल्कि उस समय अपनी आस्था, पहचान और सांस्कृतिक विरासत को बचाने का संघर्ष भी था।

छत्रपति शिवाजी महाराज और पुनर्निर्माण

सप्तकोटेश्वर मंदिर के इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। वर्ष 1668 में उन्होंने वर्तमान मंदिर के पुनर्निर्माण और विस्तार का आदेश दिया। परंपरा के अनुसार शिवाजी महाराज स्वयं इस मंदिर में आए थे और इसकी जर्जर स्थिति देखकर इसके पुनरुद्धार का निर्णय लिया।

इस पुनर्निर्माण ने मंदिर को केवल नया स्वरूप ही नहीं दिया, बल्कि गोवा में हिंदू धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं के पुनर्जागरण का भी प्रतीक बनाया।

स्थापत्य की विशिष्टता

श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर का स्थापत्य गोवा की विशिष्ट मंदिर परंपरा और विभिन्न ऐतिहासिक प्रभावों का सुंदर मिश्रण है। मंदिर में यूरोपीय शैली का मंडप, ढलानदार टाइलों वाली छत, अष्टकोणीय आधार पर बना गुंबद और ऊंचा दीपस्तंभ विशेष आकर्षण हैं।

मंदिर परिसर में भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं के छोटे मंदिर भी हैं। आसपास के क्षेत्र में प्राचीन पत्थर और लेटराइट संरचनाओं के अवशेष इस क्षेत्र की पुरातात्विक महत्ता को भी दर्शाते हैं।

मंदिर के निकट स्थित पंचगंगा तीर्थ भी श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण है। प्राकृतिक जलस्रोत से जुड़े इस पवित्र जलाशय का धार्मिक और स्थानीय सांस्कृतिक जीवन में विशेष स्थान है।

आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता

सप्तकोटेश्वर मंदिर का इतिहास हमें बताता है कि मंदिर केवल पूजा के स्थान नहीं होते। वे किसी समाज की स्मृति, पहचान, संघर्ष और सांस्कृतिक निरंतरता के केंद्र भी होते हैं।

कदंबों के कुलदेवता से लेकर पुर्तगाली काल में संरक्षण के संघर्ष और शिवाजी महाराज द्वारा पुनर्निर्माण तक, सप्तकोटेश्वर की यात्रा गोवा की सनातन परंपरा की दृढ़ता और जीवंतता की कहानी कहती है।

गोवा अध्याय का समापन — अब गुजरात की ओर

IndoUS Tribune की “भारत के मंदिरों की यात्रा” का गोवा अध्याय श्री सप्तकोटेश्वर के पावन धाम के साथ अपने पाँचवें और अंतिम पड़ाव पर पूर्ण होता है। श्री मंगेशी, शांतादुर्गा, महालसा नारायणी, नागेशी और सप्तकोटेश्वर—इन मंदिरों के माध्यम से हमने जाना कि गोवा की पहचान केवल समुद्र तटों और पर्यटन तक सीमित नहीं है। इसकी धरती पर सदियों पुरानी सनातन आस्था, मंदिर परंपरा और सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत है।

लेकिन “भारत के मंदिरों की यात्रा” अभी समाप्त नहीं हुई है। अगले सप्ताह IndoUS Tribune इस आध्यात्मिक यात्रा को एक नए राज्य गुजरात की ओर ले जाएगा। गुजरात के प्राचीन और प्रसिद्ध मंदिरों के माध्यम से हम वहां की आस्था, इतिहास, स्थापत्य, लोककथाओं और सनातन परंपराओं को अपने पाठकों तक पहुँचाएंगे।

अगले सप्ताह—भारत के मंदिरों की यात्रा का नया अध्याय: गुजरात।

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