
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: सीता जी के दूसरे वनवास का असली कारण
By: Rajendra Kapil
हम सब जानते हैं कि, सीता जी ने अपने जीवनकाल में दो वनवास भोगे. एक तो रामजी के साथ, चौदह वर्षों का, उनका वचन निभाने के लिए, और दूसरा रामजी के राज्याभिषेक के बाद, जब वह गर्भवती थी. दूसरे वनवास के बारे में, आम धारणा यह है कि, उस समय समाज में रामजी की निंदा आरम्भ हो गई थी कि, वह एक ऐसी स्त्री को घर ले आए थे. जो बहुत दिनों तक रावण के आधीन थी. उसके चरित्र को पवित्र नहीं माना गया. इस कथा को तुलसी बाबा ने बिल्कुल नहीं उठाया. लेकिन वाल्मीकि रामायण में जब यह कथा आती है, तो वहाँ एक श्राप का उल्लेख आता है जिसके चलते, प्रभु राम को यह वियोग झेलना पड़ा. इस लेख में हम इसी विषय को विस्तार से परखने का प्रयास करेंगे.
सीता जी पवित्रता को लेकर तुलसी बाबा बड़े सजग थे. तुलसी के रामचरितमानस में जब अरण्यकाण्ड में रामजी राक्षसों से घिर गए, तो उन्हें यह आभास हो गया था कि, सीता पर कोई महान संकट आने वाला है. इसी लिए उन्होंने एक दिन, जब लक्ष्मण जी फल फूल लेने बाहर गए हुए थे, तो सीता से अग्नि में प्रवेश करने के सलाह दी. ताकि जो कुछ भी घटित हो, वह सीता की प्रतिछाया के साथ ही घटित हो. तुलसी बाबा के अनुसार, जब रावण ने सीता का अपहरण किया, तो केवल छाया का अपहरण किया. रावण युद्ध के बाद जब सीता जी रामजी के निकट लाई गई, तो उन्हें अग्नि परीक्षा देने को कहा गया, ताकि सब का संदेह दूर हो सके.
सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुसीला, मैं कछु करबि ललित नरलीला
तुम्ह पावक महूँ करहु निवासा, जों लगि करों निसाचर नासा
जबहि राम सब कहा बखानी, प्रभु पद धरि हियँ अनल समानी
निज प्रतिबिंब राखि तहँ सीता, तैसइ सील रूप सुविनीता
लेकिन जब रामजी वनवास के बाद अयोध्या लौट आए, तो उनका राज्याभिषेक बड़ी धूम धाम के साथ किया गया. पूरी अयोध्या ने दीपावली मनाई. इसके बाद सभी भाई बड़े आनन्द से रहने लगे. जीवन का सुख वैभव भोगने लगे. उसी बीच सीता जी गर्भवती हो गई. लोकपवाद से जुड़े होने के कारण, तुलसी बाबा ने, इसके बाद की कथा को आगे नहीं बढ़ाया. लेकिन ऋषि वाल्मीकि ने इसका विस्तार से उल्लेख किया.
एक दिन जब रामजी अकेले थे, तब उनके सचिव भद्र ने रामजी से, सीता के चरित्र को लेकर, समाज हो रही बहुत सी बातों का ज़िक्र, उनसे किया. उसमें रामजी की छवि धूमिल पड़ रही थी.
कीदशं हृदये तस्य सीतासं भोगजं सुखम् । अङ्कमारोप्य तु पुरा रावणेन बलाद्धताम्॥ १७॥
लङ्कामपि पुरा नीतामशाकवनिकां गताम्। रक्षसां वशमापन्नां कथं रामो न कुत्स्यति ॥१८॥
अस्माकमपि दारेषु सहनीयं भविष्यति .। यथा हि कुरुते राजा प्रजा स्तमनुवर्तते ॥१९॥
प्रजा खुले आम सीता के बारे बातें कर रही थी. पहले तो रावण सीता को बलपूर्वक गोदी में उठा कर लँका ले आया. उसे कुछ दिन अपने अँत:पुर में रखा, फिर उसको, अशोक वन में, बन्दी बनाए रखा, इस सबके बाद भी रामजी सीता को, आदर सहित स्वीकार कर, अयोध्या लिवा लाए, और अपनी रानी का सर्वोच्च पद प्रदान किया. इस सबका हमारी स्त्रियों पर बुरा असर पड़ रहा है. हमारे राजा का यह व्यवहार उचित नहीं है.
यह कहानी जगत्प्रसिद्ध है कि, रामजी ने लोकपवाद से बचने के लिए तथा राज्य की मर्यादा को बनाए रखने के लिए, सब परिवारजनों से सलाह के बाद सीता को दूसरी बार वनवास दिया. लेकिन यही एक मात्र कारण? वाल्मीकि ऋषि के अनुसार नहीं है. दूसरी बार भी सीता को वनवास भेजने का दायित्व लक्ष्मण को सौंपा गया.
ऋषीणां चैव सर्वेषामपापां जनकात्मजाम् । एवं शुद्धसमाचारा देव गन्धर्व सन्नियो ॥ ९ ॥
लङ्काद्वीपे महेन्द्रेण मम हस्ते निवेशिता ।अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम् ॥१०॥
रामजी भली भाँति जानते थे कि, सीता पूरी तरह से पवित्र है. पर उनपर मर्यादा की रक्षा का भार
था. उन्होंने सीता को अपनी दुविधा बताई. सीता ने पति के कर्तव्य के लिए, एक बार फिर बलिदान दिया. जब रामजी ने सभी भाइयों से सलाह की तो, कोई भी सीता माँ को वनवास भेजने के पक्ष में नहीं था. सभी ने अपवाद को अनदेखा करने की सलाह दी. लेकिन रामजी अपने कर्तव्य पर अडिग टिके रहे.
जब लक्ष्मण थोड़ी आनाकानी करने लगा, रामजी ने उसे एक राजा की भाँति आदेश देकर विवश कर दिया. लक्ष्मण जी माँ सीता के पास जाकर, अपनी विवशता प्रगट करने लगे. सीता जी ने मुस्कुराते हुए, उसे अपने कर्तव्य का पालन करने को प्रोत्साहित किया.
एवमुक्तः सुमन्त्रेण राजवेश्मनि लक्ष्मण: । प्रविश्य सीतामासाद्य व्याजहार नरषभः ॥६॥
स्वया किलेष नूपतिवर वे याचितः प्रभु: । नृपेण च प्रतिज्ञातमाज्ञप्तश्नाश्रमं प्रति ॥ ७॥
लक्ष्मण ने अयोध्या के सचिव और सारथी सुमन्त्र जी से रथ तैयार करने का अनुरोध किया. रथ के आते ही, वह माँ सीता के सम्मुख जा खड़े हुए, और प्रार्थना करने लगे.
सीता जी के मुख पर तनिक भी रोष या अप्रसन्नता नहीं थी. वह पति की आज्ञा के पालन को सहर्ष तत्पर दिखाई पड़ी. उन्हें यह विश्वास था कि, यह सब जान कल्याण के लिए किया जा रहा है. और वह इस पुण्य कार्य में सहयोग दे पा रही है. लेकिन लक्ष्मण जी इस काम को बड़े उदास मन से कर रहे थे.
जब लक्ष्मण सीता जी को ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में छोड़ कर लौट रहा था, तो उसके मन में बहुत ग्लानि थी. उसका उदास मुँह देख सारथी सुमन्त्र उसे समझाने लगे:
दृष्टा तु मेथिलीं सीतामाश्रमे संप्रवेशिताम् । सन्तापमगमदघोरं लक्ष्मणो दीनचेतनः ॥ १ ॥
सुमन्त्र लक्ष्मण को को एक रहस्यमयी कथा सुना कर उसे सांत्वना देने का प्रयास करने लगे. सुमन्त्र ने बताया कि, उन्हें एक कथा ज्ञात है, जिसे महाराज दशरथ ने गुप्त रखने को कहा था. लेकिन मैं आज तुम्हारा विषाद देख कर उसे तुम पर प्रगट करने को विवश हूँ. इस कथा में सुमन्त्र ने एक श्राप का उल्लेख किया, जो राम सीता के वियोग का प्रमुख कारण था. आख़िर वह श्राप था क्या?
यद्यप्यहं नरेन्द्रेण रहस्यं श्रावितं पुरा । तथाप्युदाहरिष्यामि दैवं हि दुरतिक्रमम् ॥१८॥
येनेदमीदृशं प्राप्त दुःखं शोकसमन्वितम् । न त्वया भरतस्याग्रे शत्रु ध्नस्यापि सन्निधौ ॥१९॥
एक बार महाराज दशरथ दुर्वासा आदि ऋषियों के पास बैठे थे और सत्संग चल रह था. वहाँ गुरुवर वशिष्ठ भी थे. राजा दशरथ ने अपने पुत्र राम के भविष्य के बारे में कुछ प्रश्न पूछे. उसके उत्तर में ऋषि अत्रि पुत्र दुर्वासा बोले.
प्राचीन काल में एक देवासुर संग्राम में देवता और दैत्य भिड़ पड़े. देवताओं से मार खाने पर, दैत्य सेना ऋषि भृगु की पत्नी के पास शरण माँगने आई. दयालु ऋषि पत्नी ने उन्हें शरण देकर, अभय दान दे दिया. जब भगवान विष्णु को, भृगु पत्नी के इस कार्य के बारे में पता चला तो वह कुपित हो गए. उस क्रोध के आवेश में उन्होंने ऋषि पत्नी का सिर अपने सुदर्शन चक्र से काट डाला.
ततस्तां निहतां दृष्टा पत्नी भृगुकुलोद्रह; । शशाप सहसा क्रुद्धो विष्णं रिपुकुलादेनम् ॥१४॥
यस्मादवध्यां मे पत्नीमवधीः क्रोधमूच्छितः तस्मात्वं मानुषे लोके जनिष्यसि जनादंन॥१५॥
जब ऋषि भृगु आश्रम लौटे तो अपनी पत्नी को मृत देख मूर्छित हो गए. जब उन्हें होश आया और विष्णु जी के कृत्य का पूरा पता चला तो वह भी कुपित हो गए. रोते हुए बोले, महाराज विष्णु, मेरी पत्नी वध योग्य नहीं थी. आपने क्रोध वश उसका वध कर दिया. अब मैं भी आपको श्राप देता हूँ कि, आपको त्रेतायुग में राम अवतार लेना होगा, और वहाँ आपको लम्बे काल तक पत्नी वियोग सहन करना होगा. जैसे मैं पत्नी विरह में तड़प रहा हूँ, एक दिन तुम्हें भी पत्नी वियोग सहना होगा. वोह भी अकारण, तुमसे दूर चली जाएगी. तब तक भगवान विष्णु का क्रोध शान्त ही चुका था, उन्हें अपनी भूल का अहसास भी हुआ, लेकिन तब तक काफ़ी देर हो चुकी थी. सामने महा तपस्वी ऋषि भृगु थे. उनकी तपस्या को सम्मान देना अति आवश्यक था. और इस प्रकार विष्णु महाराज ने श्राप सहज स्वीकार कर लिया.
लोकानां क्वसंप्रियाथ तु तं शापं ग्रह्ममुक्तवान् । इति शप्तो महातेजा भूगुणा पूर्वजन्मनि ॥१८ ॥
इहागते हि पुत्र त्वं तव पार्थिवसत्तम । राम इत्यभिविख्यातस्रिषु लोकेषु मानद ॥ १९ ॥
इस प्रकार त्रेता युग में महाराज विष्णु राम अवतार में अवतरित हुए और ऋषि भृगु के श्राप का मान रखते हुए, जन कल्याण एवं सामाजिक मर्यादा के लिए तरह तरह के कष्ट झेले. ऐसे प्रभु राम जो अपने भक्तों के लिए कुछ भी कर सकते हैं, हमें अपनी कृपा से, हमेशा सुरक्षा कवच प्रदान करते रहें. प्रभु के श्री चरणों में मेरा सादर प्रणाम!! “जय श्री राम”