
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: लँका में हनुमान जी ने मरने के लिए, क्यों सोचा?
By: Rajendra Kapil
रामचरितमानस और वाल्मीकि रामायण में जो सबसे बड़ा अंतर है, वह यह है कि, वाल्मीकि रामायण हर घटना को विस्तार से प्रस्तुत करती है. हर पात्र की भावनाओं को गहराई से कुरेदने की कोशिश करती है. ऋषि वाल्मीकि ने, हर पात्र को गहराई से परखा, और उसकी भावनाओं को एक सशक्त वाणी प्रदान की. जैसे हम इस लेख में देखेंगे, हनुमान जी जब लँका में, सीता खोज में लगे हुए थे, तो किन विचारों की उथल पुथल से गुजरे. उन्होंने अपनी निराशा में, यहाँ तक सोच लिया कि, असफल हो कर वापिस लौटने से बेहतर है कि, यहाँ पर अपने प्राण त्याग दूँ.
रामचरितमानस में यह प्रसंग सुंदरकाण्ड में है. जिसे तुलसी बाबा ने कुछ ही चौपाइयों में समाप्त कर दिया. इसमें हनुमान जी पहले विभीषण को मिलते हैं, वह उन्हें, सीता जी के अशोक वाटिका में होने की सूचना देते हैं. हनुमान जी सीधे अशोक वाटिका पहुँचते हैं, और माँ सीता के दर्शन कर लेते हैं.
जुगुति विभीषण सकल सुनाई, चलउ पवनसुत बिदा कराई
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ, बन असोक सीता रह जहवाँ
और हनुमान जी अशोक वाटिका जा पहुँचे
देखी मनहि महु कीन्ह प्रनामा, बैठेहि बीति जात निसि जामा
कृस तनु सीस जटा इक बेनी, जपति हृदय रघुपति गुन श्रेनी
सीता जी का शरीर विरह से शिथिल हो चुका है. वह बड़े उदास मन से रात दिन रामजी का सुमिरन करती दीख पड़ती हैं. हनुमान जी सीता की यह दशा देख, बड़े दुखी होते हैं. बस इन्हीं कुछ चौपाइयों में प्रसंग समाप्त हो जाता है.
लेकिन अगर आप वाल्मीकि रामायण का अध्ययन करें, तो पता चलता है कि, हनुमान जी को, सीता जी तक पहुँचने में बड़ी मेहनत करनी पड़ी. और इस प्रक्रिया में, उन्हें बहुत सारी निराशा झेलनी पड़ी. उस निराशा के क्षणों में, हनुमान जी ने किस किस के बारे में, क्या क्या सोचा, यह नीचे के श्लोकों में स्पष्ट है.
भूयिष्ठम् लोडिता लन्का रामस्य चरता प्रियम् |
न हि पश्यामि वैदेहीम् सीताम् सर्व अन्ग शोभनाम् || ५-१३-३
मैंने सीता की खोज में सारी लंका छान मारी, फिर भी सर्वांगसुंदरी सीता, कहीं दिखाई नहीं पड़ी.
कहीं मेरा समुन्दर लंघन जैसा विशाल प्रयास बेकार तो नहीं चला जाएगा.? फिर हनुमान जी सीता की कुशलता की चिंता करने लगे.
उपरि उपरि वा नूनम् सागरम् क्रमतः तदा || ५-१३-१०
विवेष्टमाना पतिता समुद्रे जनक आत्मजा
कहीं यहाँ आते समय सीता पुष्पक विमान से, नीचे गिर तो नहीं पड़ी?
कहीं सीता जी ने रावण के आलिंगन से बचने के लिए, अपने प्राण तो नहीं त्याग दिए?
कहीं आकाश मार्ग से आते आते विमान से समुन्दर में कूद, अपनी रक्षा हेतु, अपने प्राण तो नहीं गवाँ दिए?
हा राम लक्ष्मण इति एव हा अयोध्येति च मैथिली || ५-१३-१४
विलप्य बहु वैदेही न्यस्त देहा भविष्यति |
कहीं हे राम, हे लक्ष्मण पुकारती, विलाप करती सीता ने, निराशा में अपने प्राणों की आहुति तो नहीं दे दी?
इसी उधेड़ बुन में, हनुमान जी बड़ी देर तक तड़पते रहे. फिर सोचने लगे कि, अगर सीता नहीं मिली, तो यह अशुभ समाचार, रामजी को बिल्कुल नहीं दिया जा सकता. वह इससे बहुत ही हताश हो जाएँगे. मैं अब इस असफलता की स्थिति में किष्किन्धा नहीं लौट सकता. मेरे लिए यहीं रह कर मरना बेहतर होगा. हनुमान जी की निराशा अपनी चरम सीमा पर थी. वह मरने तक के लिए तैयार थे.
फिर शुरू हुई उनके मन में एक और विचार श्रृंखला. भाव था कि, अगर मेरी असफलता का समाचार किसी प्रकार रामजी के ख़ेमे में पहुँचता है तो, किस किस पर, क्या असर होगा?
गत्वा तु यदि काकुत्स्थम् वक्ष्यामि परम् अप्रियम् || ५-१३-२३
न दृष्टा इति मया सीता ततः त्यक्ष्यन्ति जीवितम् |
अगर मैंने यह अशुभ समाचार रामजी को दिया तो, वह इस विरह को नहीं सह पायेंगे. और बड़ी बात नहीं, की वह अपने प्राण भी त्याग दें. अगर रामजी ने प्राण त्याग दिए तो, उनके छोटे भाई लक्ष्मण जी, जो उन्हें प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं, भी चुप नहीं बैठेंगे. वह भी भाई के साथ स्वर्ग का रास्ता अपना लेंगे.
विनष्टौ भ्रातरौ श्रुत्वा भरतो अपि मरिष्यति || ५-१३-२६
भरतम् च मृतम् दृष्ट्वा शत्रुघ्नो न भविष्यति |
अगर इन दोनों भाइयों की मृत्यु का समाचार अयोध्या पहुँच गया, तो भरत और शत्रुघ्न भी जीवत नहीं बचेंगे.
पुत्रान् मृतान् समीक्ष्य अथ न भविष्यन्ति मातरः || ५-१३-२७
कौसल्या च सुमित्रा च कैकेयी च न संशयः |
चारों पुत्रों की मृत्यु का समाचार, तीनों माताओं को विह्वल कर देगा. पुत्रों की अनुपस्थिति में, माँ कौशल्या, माँ सुमित्रा, और माँ कैकेयी भी, शायद जीवत न रहें. यह विचार शृंखला यहीं समाप्त नहीं हुई.
रामजी की मृत्यु का समाचार सुनकर मेरे स्वामी महाराज सुग्रीव क्या जीवत रह पायेंगे? अगर महाराज सुग्रीव को कुछ हो गया, तो उनकी पत्नी रूमा का क्या होगा? यह जान सुन कर, क्या युवराज अंगद जीवत रह पायेंगे? और इस संकट की घड़ी में, जब वानर जाति के राजा लोग ही नहीं रहेंगे, तो क्या वानर सेना या वानर जाति रह पायेगी? पूरी वानर जाति के विनाश की, संभावना के विचार मात्र से, हनुमान जी काँप उठे. बस उसके आगे उन्होंने सोचना बंद कर दिया. उनका शरीर शिथिल हो गया. जब थोड़ा सँभले, तो विचार किया कि, इस तरह निराश लौटने से तो, न लौटना बेहतर है. यही कुछ समय गुज़ार कर, यहीं प्राण त्याग दूँगा, लेकिन इतने बड़े विनाश का कारण, मैं नहीं बनूँगा.
हनुमान जी मन में चल रहे, इन द्वन्दों का चित्रण, इतनी बारीकी से, वाल्मीकि जैसे महान ऋषि ही कर सकते थे.
वाल्मीकि जी ने हनुमान जी के माध्यम से निराशा और असफलता की भयावह मनोदशा को बड़ी खूबी से चित्रित किया. यह है, वाल्मीकि रामायण की शोभा और शक्ति. यही भाव राम प्रेमी भक्तों के हृदय में, भक्ति एवं श्रद्धा का संचार का कर जाता है. “जय श्री राम”