
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: रामजी को दिव्यास्त्र किसने और क्यों दिए?
By: Rajendra Kapil
रामजी के धरती पर अवतार लेने के कई कारण हैं. उनमें से एक प्रमुख था, दुष्टों का उपसंहार. एक और प्रमुख कारण, जो वाल्मीकि रामायण में वर्णित है, वह यह कि, प्रभु राम ने, ऋषि दम्पति कश्यप और अदिति को उनकी तपस्या के बाद, एक वरदान दिया था. उस वरदान में दम्पति ने, रामजी से उन्हीं के जैसा पुत्र माँगा था. प्रभु मधुर स्वर में बोले, ‘अब मैं अपने जैसा बेटा कहाँ से लाऊँ?‘ मैं स्वयं आपका पुत्र बन कर आऊँगा. अगले जन्म में आप दशरथ और कौशल्या के रूप में आयेंगे और मैं आपका बेटा राम बन कर जन्म लूँगा. और आगे चल कर ठीक ऐसा ही हुआ.
कस्यप अदिति महातप कीन्हा, तिन्ह कहूँ मैं पूरब बर दीन्हा
ते दसरथ कौसल्या रूपा, कोसलपुरी प्रगट नरभूपा
दूसरा, जो बड़ा कारण राम जन्म का है, वह है, इस संसार से पापियों और दुष्टों का विनाश. जब धरती पर अत्याचार बढ़ जाता है, तो प्रभु धरती के उस, बोझ को हटाने के लिए भी जन्म लेते हैं. उस समय भी स्थिति कुछ ऐसी ही थी.
अतिसय देखी धरम की ग्लानि, परम सभीत धरा अकुलानी
धेनु रूप धरि हृदय बिचारि, गई तहाँ जहॉं सुर मुनि झारी
इनके अतिरिक्त और भी बहुत से कारण थे, जिसके लिए प्रभु को, इस धरती पर अवतरित होना पड़ा. भगवद् गीता में भी, भगवान कृष्ण ने उदघोषणा की है कि,
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽअत्मानं सृजाम्यहम्।।
मैं दुष्टों के संहार के लिए तथा धर्म की पुन: स्थापना के लिए जन्म लेता हूँ. रामजी को भी इन दुष्ट राक्षसों के संहार के लिए, कुछ विशेष अस्त्र शस्त्र चाहिए थे. और अब प्रश्न यह उठता है कि, उन्हें यह दिव्यास्त्र प्रदान कौन करेगा? उसके लिए एक सुयोग्य गुरुवर की आवश्यकता थी. वाल्मीकि रामायण की इस कथा में, यहाँ प्रगट होते हैं, त्रिकालदर्शी ऋषि विश्वामित्र. यह ऋषि बड़े दूरदर्शी हुआ करते थे. उन्हें पता होता था कि, कब प्रभु अवतरित होंगे. उन्हें कब और कैसे प्रशिक्षित करना है. उसके लिए वह पहले से ही तैयार रहते थे.
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड में आता है कि, जब रामजी अपने भाइयों सहित युवा हो गए, तो ऋषि विश्वामित्र राजा दशरथ के दरबार में जा पहुँचे, और महाराज से प्रार्थना करने लगे कि, उन्हें वनों में दुष्टों में संहार के लिए, राम और लखन की सहायता की आवश्यकता है. राजा दशरथ को, ऋषिवर का यह आग्रह अच्छा नहीं लगा. उन्होंने ऋषि के सम्मुख अपनी सेना अर्पित कर दी, लेकिन ऋषि विश्वामित्र केवल राम लखन की माँग पर टिके रहे. क्योंकि केवल ऋषिवर को पता था कि, रामजी का जन्म एक बड़े उद्देश्य के लिए हुआ है. इसके लिए इन्हें कुछ दिव्यास्त्रों की आवश्यकता पड़ेगी, जिसे केवल मैं ही पूरा कर सकता हूँ. जब राजा दशरथ को कोई और उपाय नहीं सूझा तो, उन्होंने, ऋषि वशिष्ठ से सलाह कर, राम लखन को ऋषि विश्वामित्र के साथ भेज दिया.
रामजी और लखन ऋषि के आश्रम में रह कर नए नए अस्त्र शस्त्र सीखने लगे. एक दिन उस आश्रम के निकट, एक बहुत भयंकर राक्षसी ताड़का आ धमकी.
तां दृष्टा राघवः क्रां विकृतां विकृताननाम् । प्रमाणेनातिह॒ृद्धां च लक्ष्मणं सोऽभ्यभाषत ॥६॥
पश्य लक्ष्मण यक्षिण्या भैरवं दारुणं वपु; । मिद्यरन्दशनादस्या भीरूणां हृदयानि च ॥१०॥
उस बड़ी लंबी चौड़ी, घोर विकराल रूप वाली, कुपित राक्षसी को देख, श्री रामचन्द्र जी ने लक्ष्मण जी से कहा, देखो लक्ष्मण, इस यक्षिणी का शरीर कैसा भयङ्कर और विकट है। इसे देखते ही डरपोकों के हृदय तो काँप उठते होंगे.
उस राक्षसी को देख, दोनों भाई सजग हो गए, लेकिन उनके क्षत्रिय मन ने कहा कि, यह तो स्त्री है, इसे मारने में कोई पौरष नहीं होगा. लेकिन ऋषि विश्वामित्र जानते थे कि, यह एक बड़ी दुष्ट एवं उपद्रवी राक्षसी है.
विश्वामित्रस्तु ब्रह्मर्षिहुङ्कारेणाभिभत्स्ये ताम् । स्वस्ति राघबयोरस्तु जयं चेवाभ्यभाषत ॥१४॥
गुरुदेव के आदेश पर दोनों भाइयों ने ताड़का पर आक्रमण कर दिया. राम लखन के तीरों ने ताड़का के हाथ काट डाले, और वह घायल हो कर गिर पड़ी.
शरेणोरसि विव्याध सा पपात ममार च। तां हतां भीमसंकाशां दृष्टा सुरपतिस्तदा ॥२६॥
रामजी के वाणों से ताड़का की छाती छलनी हो गई, और वह धरती पर मूर्छित हो गिर पड़ी. थोड़ी देर में उसने प्राण त्याग दिये. इस प्रकार ताड़का का अंत हो गया.
अब ऋषि विश्वामित्र को भरोसा हो गया कि, यही समय है जबकि, रामजी जो दिव्यास्त्र प्रदान किए जा सकते हैं. तो एक दिन सुबह ऋषिवर ने दोनों भाइयों को निकट बुलाया, और बड़े मधुर स्वर में बोले,
अथ तां रजनीपुष्य विश्वामित्रा महायशाः । हस्य राघवं वावयमुवाच मधुराक्षरम् ॥१॥
परितुष्टोऽस्मि भद्र ते राजपुत्र महायशः । पीत्या परमया युक्तो ददाम्यस्राणि सर्वेशः ॥२॥
मैं तुम्हारे पराकर्म से बहुत खुश हूँ. अब मैं तुम्हें कुछ दिव्यास्त्र देना चाहता हूँ. इनकी सहायता से, तुम लोग, आने वाले दिनों में, बहुत सारे राक्षसयों का संहार कर पाओगे. यह दिव्यास्त्र तुम्हारी हर संकट की घड़ी में सहायता करेंगे. तुम्हें तुम्हारे उद्देश्य तक पहुँचने में सहायक होंगे. ऐसा कह कर, ऋषिवर ने रामजी को नन्दन नाम की एक दिव्य खड्ग प्रदान की.
वायव्यं प्रथनं नाम ददामि च तवानघ । | अस्त्रं हयशिरो नाम क्रोश्चमस्त्रं तथेव च ॥११॥
शक्तिद्वयं च काङुत्स्थ ददामि तव राघव । कङ्कालं मुसलं घोरं कपालमथ कङ्कणम् ॥१२॥
उसके बाद उन्होंने कंकाल, मूसल, कपाल, तथा किंकणी आदि दिव्य अस्त्र प्रदान किए, और उन्हें चलाने की विधि भी समझाई. राम लखन यह सब पाकर बड़े प्रसन्न हुए.
संवर्त चेव दुधर्ष मोसलं च नृपात्मज । सत्यमस्त्रं महाबाहो तथा मायाधर परम् ॥१८॥
घोरं तेजःप्रभं नाम परतेजोपकषंशम् । सोम्यास्त्रं शिशिरं नाम त्वाष्ट्रमस्त्रं सुदामनम् ॥१६॥
दारूणं च भगस्यापि शीतेषुमथ मानवम् । एतान्राम महाबाहो कामरूपान्महावलान् ॥२
फिर ऋषि ने उन्हें ‘तामस, महाबली सौमन, संवर्त, दुर्जय, मोसल, और सत्य नामक अति प्रभावशाली शस्त्र प्रदान किए. साथ ही दिया, सूर्य देवता का तेज: पुंजअस्त्र. रामजी को सोम देवता का शिशिर नामक अस्त्र भी प्राप्त हुआ. विश्वकर्मा का दारुण ‘शीतेशु’ नामक शस्त्र भी उन्हें दिया गया.
अगले दिन मुनि देव विश्वामित्र ने, दोनों भाइयों को पास बिठा कर, प्रत्येक अस्त्र और शस्त्र को चलाने की पूर्ण विधि को विस्तार से समझाया. राम और लखन के हर संदेह को दूर किया. उनके हर प्रश्न का धैर्य से उत्तर दिया. गुरु से यह विधिवत शिक्षा पाकर दोनों भाई बड़े अनुगृहीत हुए.
प्रतिगृह्य तंतोऽख्नाणि प्रहृएवदनः शुचिः । गच्छन्नेव च काकुत्स्थो विश्वामित्रमथाब्रवीत् ॥१॥
गृहीता्रोऽस्मि भगवन्दुराधपः सुरासुरेः । अखाणां खहमिच्छामि संहारं मुनिपुङ्गव ॥२॥
और बड़े विनम्र भाव से बोले, ‘ गुरुवर, हम आपकी कृपा से यह सब प्राप्त कर, बड़े सबल एवं दुर्जय हो गए हैं.’ हम आपके आभारी हैं. हम आपका यह ऋण कभी नहीं उतार पायेंगे. हम आपको यह आश्वासन देते हैं की, हम इस शिक्षा एवं अस्त्रों का उपयोग, केवल जन कल्याण के लिए ही करेंगे. हमारा प्रणाम स्वीकार करें. ऐसा कह दोनों भाई गुरु के चरणों में लोट पोट हो गए. ऐसे महान गुरुओं को हमारा सादर नमन. ‘ जय श्री राम’