
बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: क्या रावण सीताजी को पूर्व जन्म में भी मिल चुका था?
By: Rajendra Kapil
वाल्मीकि रामायण के अनुसार उपरोक्त प्रश्न का उत्तर है, हाँ. रामचरितमानस में इस प्रसंग का कोई विवरण नहीं है. लेकिन वाल्मीकि रामायण के उत्तर काण्ड के सत्रवहें सर्ग में इसका उल्लेख विस्तार से है. इस सर्ग में ऋषि अगस्त्य एक कथा सुना रहे हैं, जिसका प्रसंग रावण का युवाकाल है. इस कथा के अनुसार, एक बार, रावण अपनी युवावस्था में हिमालय के आसपास विचरण कर रहा था. वहाँ पर एक परम तेजस्विनी कन्या, जिसने अपने शरीर पर, काले रंग का मृगचर्म पहना हुआ था, तपस्या में लीन थी. उस तपस्विनी का रूप सौंदर्य अप्रतिम था. जब रावण की दृष्टि उस रूप सुंदरी पर पड़ी, तो वह उसे पाने को, आतुर हो उठा. उस पर कामजनित मोह हावी हो गया. उस कन्या का नाम था, वेदवती.
स दृष्टा रूपसम्पन्नां कन्यां तां सुमहात्रताम् । काममोहपरीतात्मा पप्रच्छ प्रहसन्निव ॥ 3॥
वह उसके निकट जाकर उपदेश देने लगा. हे परम सुंदरी, इस युवावस्था में इतना घोर तप? यह तुम्हारे लिए उचित नहीं है. तुम्हारा रूप सौंदर्य अति दिव्य है. तुम्हें तो युवा पुरुषों के मनों पर राज करना चाहिए.
कस्यासि किमिदं भद्दे कश्च भर्ता वरानने । येन सम्भुञ्यसे भीरु स नर; पुण्यभाग्मुबि ॥ ६ ॥
हे सुमुखी अपना परिचय दो. तुम किसकी पुत्री हो? तुम यह इतना कठोर व्रत क्यों कर रही हो? क्या कोई पुरुष तुम्हारा पति है? इस तपस्या के माध्यम से तुम क्या पाना चाहती हो?
यह सब देख सुनकर, वेदवती ने उठकर अतिथि का आदर सत्कार किया. बैठने के लिए उचित आसन दिया, और बोली:
कुशध्वज नाम पिता ब्रह्मर्षिरमितपभः । ब्रुहस्पतिसुतः श्रीमान्बुद्धया तुल्यो बृहस्पतेः ।।८॥
तस्याहं कुवतो नित्यं वेदाभ्यासं महात्मनः सम्भूता वाङमयी कन्या नाम्ना वेदवती स्मता ॥९॥
महाराज, मैं ऋषि कुशध्वज की पुत्री हूँ, जोकि देवगुरु बृहस्पति के पुत्र थे. उन्हीं के समान बुद्धिमान एवं ऋषि समाज में पूजे जाते थे. मेरा नाम वेदवती है. जब मैं बड़ी हुई, तो बहुत सारे देव, गंधर्व और यक्ष आदि मेरे पिता से मेरा हाथ माँगने आए, तो पिता ने सबको साफ़ मना कर दिया. मुझे तप आदि की शिक्षा दीक्षा दे, एक शुद्ध बुद्ध तपस्विनी बनाने में लगे रहे. मेरे पिता मुझे किसी देव या यक्ष के हाथ इसलिए नहीं सौपना चाहते थे कि, उनके मन में, मेरे लिए एक विशेष दामाद की मनोकामना थी. वह मेरा विवाह, जगदपति विष्णु से करवाना चाहते थे. यह बात, जब उस समय के महा अभिमानी दैत्यराज शम्भु को पता चली, तो वह कुपित हो उठा.
तेन रात्रौ शयाने मे पिता पापेन हिंसितः ॥ १४॥
ततो मे जननी दीना तच्छरीरं पितुर्मम । परिष्वज्य महाभागा प्रविष्ठा हव्यवाहनम् ॥ १५ ॥
उस कुपित दैत्यराज ने रात को सोते हुए, मेरे पिता की हत्या कर दी. इससे मेरी माँ को बहुत दुख हुआ. और वह भी पिता के साथ चिता अग्नि में समाहित हो गई. और मैं अकेली रह गई. तबसे मैंने यह प्रतिज्ञा कर ली कि, मैं घोर तपस्या कर, पिता की मनोवांछा को पूरा करने का प्रयास करूँगी. अगर मेरा विवाह होगा तो, केवल त्रिलोकपति विष्णु से ही होगा, अन्यथा विवाह ही नहीं होगा. इसीलिए हे राजन, मैं यह विकट तपस्या कर रही हूँ.
उस कन्या की इतनी सुलझी हुई बातें सुनकर रावण, उसे पाने को, और भी अधीर हो उठा. बड़े अभिमान के साथ बोला, हे सुंदरी, तुम मुझे नहीं जानती. मैं अति बलशाली एवं समृद्ध राजा हूँ. मेरी बात पर ध्यान दो. यह तप आदि काम बूढ़ी स्त्रियों को शोभा देते हैं, तुम जैसी यौवना को नहीं. तुम जैसी सौंदर्या को मेरे जैसे राजा के साथ भोग विलास करना चाहिए.
अहं लंकापतिमद्र दशग्रीव इति श्रतः तस्य मे भवभार्या त्वं भंक्ष्व भोगान्यथासुखम् ॥२३॥
सुनो सुमुखि, मैं लंकापति का महाराज दशग्रीव हूँ. तुम मेरी पत्नी बन जाओ और सुख पूर्वक उत्तम भोगों को भोगते हुए, जीवन का आनन्द उठाओ. क्या तुम जानती हो कि, जिसे तुम त्रिलोकनाथ या नारायण कहती हो, वह हैं कौन? क्या वह विष्णु महाराज, बल और पराक्रम में मेरी समानता कर सकते हैं? क्या कभी तुमने उन्हें देखा है? क्या वह मेरे समान वैभवशाली हैं? वेदवती रावण की, अभिमानी बातें सुन कर थोड़ा घबरा सी गई. रावण से बोली, नहीं, मैंने उन्हें देखा तो नहीं, लेकिन मैं नारायण के सिवाय किसी और के बारे में, सोच भी नहीं सकती. नारायण इस विश्व के अधिपति हैं. सारा संसार उनकी आराधना करता है. वह सर्वगुण सम्पन्न हैं. मेरे पिता मेरे लिए ग़लत नहीं हो सकते. मैं उसी विष्णु की हूँ, और उन्हीं की हो कर रहूँगी.
ततो वेदवती कुद्धा केशान्हस्तेन साच्छिनत्।असिभूत्वा करस्तस्याः केशांरिछन्नास्तदा करोत् ॥
सा ज्वलन्तीव रोषेण दहन्तीव निशाचरम् । उवाचाग्निं समाधाय मरणाय कृतत्वरा ॥ २९ ॥
वेदवती की यह बातें सुनकर रावण को बड़ा क्रोध आया. उसने वेदवती को बालों से पकड़ कर झिंझोड़ दिया और फिर अपनी तलवार से उसके केश काट डाले. अब वेदवती रोष से, रौद्र रूप में आ गई. क्रोध से हुँकारते हुए बोली, हे नीच राक्षस, तूने ये मेरा तिरस्कार किया. तूने मुझे कुरूप बनाने का प्रयास किया? मेरे तेरे हाथ कभी नहीं आऊँगी. मुझे तो अब यह मेरा शरीर ही, अपवित्र लगने लगा है. मुझे इस जीवन का मोह नहीं रह गया. मैं अभी, तेरे सम्मुख अग्नि में प्रवेश करने जा रही हूँ. लेकिन जाने से पहले तुम्हें चेतावनी देना चाहती हूँ कि, अगले जन्म में, फिर तुमसे मिलूँगी और इस दुष्टता के लिए, तुम्हारी मृत्यु का कारण बनूँगी.
यस्मात्त धर्षिता चाहं त्वया पापात्मना वने । तस्मात्तव वधार्थं हि समुत्पत्स्यत्यहं पुनः ॥ ३१ ॥
नहि शक्यः स्त्रिया हन्तुं पुरुषा पाप निश्चयः। शापे त्वयि मयेत्छष्टे तपसश्च व्ययो भवेत् ॥३२॥
तुझ जैसी पापात्मा ने मेरा अपमान किया है. एक स्त्री शारीरिक शक्ति से, तेरे जैसे पापाचारी का अंत नहीं कर सकती. अगर मैं तुम्हें श्राप दूँ तो, मेरी तपस्या का फल क्षीण हो जाएगा. इसलिए बस इतना ही कहूँगी कि, अभी में जा रही हूँ, और जल्द ही अगले जन्म में प्रगट हो, तुझ से जल्द ही मिलूँगी. यह कह वेदवती अग्नि में समा गई, और चारों तरफ़ से पुष्पों की वर्षा होने लगी. इस प्रकार सीता धरती में विलीन हो गई.
एक दिन राजा जनक अपने महल के पास हाल चला रहे थे, तो हल धरती में किसी चीज़ से टकराया, तो वहाँ एक लड़की प्रगट हुई. इस लड़की को पहले भूमिजा कहा गया. जिसका अर्थ है, भूमि से जन्म लेने वाली. बाद में माता पिता ने उसका नाम सीता रखा. आगे चल कर इसी सीता का स्वयंवर हुआ, जिसमें अयोध्या नरेश रामजी ने स्वयंवर की शर्त पूरी कर, सीता को वरण किया. अयोध्या पहुँच, सीता जी को एक और परीक्षा से गुजरना पड़ा. रामजी को पिता की आज्ञा अनुसार, चौदह वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा. सीताजी भी पति के साथ वनों में पहुँच गई. वहीं एक बार फिर रावण ने सीता के सौंदर्य की चर्चा पुन: सुनी, और उसका मन उसे पाने के लिए अधीर हो उठा. उसने मारीच की सहायता से पंचवटी से, सीता का अपहरण कर लिया और उसे लँका ले आया.
अब तक सीता का एक मनोरथ, त्रिलोकपति नारायण ( रामजी ) को पति रूप में पाना, पूरा हो चुका था. लेकिन दूसरा मनोरथ, लंकापति की मृत्यु का कारण बनना अभी शेष था. रामजी ने रावण को कई शान्ति प्रस्ताव भेजे, लेकिन रावण नहीं माना. रावण ने सीता को अपनी पटरानी बनाने के भी कई प्रलोभन दिए, लेकिन सीता ने उसकी एक नहीं मानी. अंततः रामजी ने अपनी पत्नी को पाने के लिए रावण से युद्ध किया. और इस प्रकार सीता उसकी मृत्यु का कारण बनी. यह था वाल्मीकि रामायण में छिपा एक और विरला प्रसंग, जिसकी चर्चा कहीं और नहीं मिलती.