बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: विराध -एक राक्षस या रामभक्त गन्धर्व

बाल्मीकि रामायण में छुपे कुछ विरले प्रसंग: विराध -एक राक्षस या रामभक्त गन्धर्व

By: Rajendra Kapil

रामायण में ऐसी बहुत सी कथाएँ आती हैं, जहाँ राक्षसों का आतंक पूरे ज़ोर शोर पर नज़र आता है. क्या यह सभी राक्षस वाकई राक्षस थे, या किसी श्राप के कारण ऐसा जीवन जी रहे थे?  इन कथाओं को गहराई से पढ़ने पर लगता है कि, यह किसी न किसी मुनि के श्राप से ग्रस्त, राक्षस योनि जी रहे थे. रामजी को इसलिए भी पूजा जाता है कि, उन्होंने वनों में जाकर ऐसे बहुत सारे राक्षसों का वध किया. इनमें से एक, बहुत ही अत्याचारी और निर्दयी राक्षस  था, जिसका नाम था, विराध.  जिसने वन में बहुत ही आतंक मचाया हुआ था. जब रामजी उस अरण्य में पहुँचे, तो ऋषि मुनियों ने अपनी दुख भरी कहानी उन्हें सुनाई.  वाल्मीकि जी ने इस राक्षस की कथा, अरण्य काण्ड में,  बड़े  विस्तार से कही है.

रामचरितमानस के सुंदरकांड में भी एक प्रसंग आता है, जहाँ अगस्त्य ऋषि के श्राप से पीड़ित, रावण  के भेजे, दो राक्षस रामजी के ख़ेमे में आते हैं, और पकड़े जाते हैं. जब उन्हें दण्ड मिलने लगता है तो वह रामजी कि शरण में समर्पण कर, क्षमा माँगने लगते हैं. दयालु रामजी उन्हें क्षमा कर देते हैं. ऐसे में तुलसी बाबा रहस्योद्घाटन करते हैं, कि, यह दोनों राक्षस अगस्त्य ऋषि के श्राप से, राक्षस योनि में थे. लेकिन रामजी की शरणागति के कारण, उन्हें मुक्ति मिली और यह दोनों अपने आश्रम लौट गए. 

ऋषि अगस्ति की साप भवानी, राछस भयउ रहा मुनि गयानी

बंदी राम पद बारहि बारा, मुनि निज आश्रम कहूँ पगु धारा

इसी प्रकार विराध भी एक भयंकर दीखने वाला राक्षस था. 

गभीराक्षं महावक्त्रं विकटं विकटोदरम्‌। बीभत्सं विषमं दीर्घं विकृतं घोरदर्शनम्‌  ॥ ५॥

सानं चर्म वैयाघ्रं वसार रुधिरोक्षितम्‌। त्रासनं सर्वभूतानां व्यादितास्यमिवान्तकम्‌ II ६II

वाल्मीकि जी लिखते हैं, उसकी आँखें भयावह, आकर विकट, और विशाल बाहु थी. वह बहुत ही भयंकर दीखने वाला राक्षस था. उसने खून से भीगा, व्याघ चर्म का  वस्त्र पहना हुआ था. समस्त मुनियों को त्रास देने वाला, यह राक्षस, यमराज के समान, मुँह बाये खड़ा था. ऐसी भयंकर आकृति वाला राक्षस विराध, जब वनों में घूमता, तो ऋषि मुनियों में एक भय छा जाता. जब रामजी इस वन में लक्ष्मण और सीता जी के साथ रहने आये, तो उन्होंने ऋषियों को यह आश्वासन दिया कि, वह उनकी इन दुष्ट राक्षसों से रक्षा करेंगे. प्रभु तो हैं ही दुःख भंजनहार.

स रामं लक्ष्मणं चैव सीतां दृष्ट्वा च मैथिलीम्‌।अभ्यधावत्‌ सुसंक्रुद्धः प्रजाः काल इवान्तकः॥ ८॥ स कृत्वा भैरवं नादं चालयन्निव मेदिनीम्‌॥

कुछ दिन बाद जब परिवार सहित वन में घूम रहे थे तो, विराध वहाँ आ धमकता है. सीता जी के सौंदर्य को देख, विस्मित हो उठता है. लेकिन अपने राक्षस स्वभाव के कारण, गर्जना कर, रामजी और लक्ष्मण को डराने लगता है. सीता जी घबरा जाती हैं. बस फिर क्या था,  विराध सीताजी को अपनी गोद में उठा लेता है. 

अङ्केनादाय वैदेहीमपक्रम्य तदान्रवीत्‌। युवां जटाचीरधरौ सभायौ क्षीणजीवितौ॥ १०॥

और दोनों भाइयों को उपदेश देने लगता है कि, हे, जटाधारियों तुमको एक स्त्री से क्या लेना देना? यह तो हम राक्षसों का काम है. यह तो बहुत सुन्दर है, इसे मैं अपनी भार्या (पत्नी) बनाऊँगा.  इसे तुम मेरे लिए छोड़, लौट जाओ. नहीं तो ख़ामख़ा, तुम्हें अपने जीवन से हाथ धोना पड़ेगा. मेरा नाम विराध है, और मैं इस वन का स्वामी हूँ.

सीता जी को राक्षस के चंगुल में देख, रामजी सजग और क्रोधित हो उठते हैं. लक्ष्मण को संबोधित करते हुए कहते हैं कि, हे लक्ष्मण मेरी सीधी सादी एवं शुभ लक्षणा सीता संकट में है. 

पश्य सौम्य नरेन्द्रस्य जनकस्यात्मसम्भवाम्‌। मम भार्यां शुभाचारां विराधाङ्के प्रवेशिताम्‌॥१७II

रामजी का यह दुख देख, लक्ष्मण भी क्रोधित हो उठता है. अपने भाई को सांत्वना देते हुए बोलते  हैं, हे भैया, आपको मेरे रहते हुए किसी प्रकार की चिंता नहीं करनी चाहिए. मैं अभी इस दुष्ट राक्षस का, अपने वाणों से वध करता हूँ.

शरेण निहतस्याद्य मया क्रुद्धेन रक्षसः। विराधस्य गतासोर्हि मही पास्यति शोणितम्‌॥ २४॥

यह कह, वह मन ही मन प्रार्थना करने लगे, हे प्रभु, मुझे इतना बल दीजिए कि, मेरे बाण इस विराध राक्षस के शरीर को छलनी कर दें. इसका जीवन अभी अभी समाप्त हो जाए. ताकि यह ऋषिओं को और अधिक संतप्त नहीं कर पाए. इतने में कुछ देर बाद, विराध का व्यवहार कुछ नरम पड़ जाता है, तो वह रामजी के निकट आ, उनसे उनका परिचय पूछने लगता है.  

अथोवाच पुनर्वाक्यं विराधः पूरयन्‌ वनम्‌। पृच्छतो मम हि ब्रूतं कौ युवां क्व गमिष्यथः॥ १॥

तब रामजी ने बड़े शान्त स्वर में विराध को अपना परिचय दिया कि, मैं इक्ष्वाकु कुल में जन्मा दशरथ पुत्र राम हूँ और मेरे साथ यह मेरा छोटा भाई लक्ष्मण है. हम अयोध्या नगरी से आए, क्षत्रिय कुल में जन्मे राज कुमार हैं. अब तुम बताओ कि, तुम्हारा क्या परिचय है?  

पुत्रः किल जवस्याहं माता मम शतहृदा। विराध इति मामाहुः पृथिव्यां सर्वराक्षसाः॥ ५॥ 

तपसा चाभिसम्प्राप्ता ब्रह्मणो हि प्रसादजा। शस्त्रेणावध्यता लोकेऽच्छेद्याभेद्यत्वमेव च॥६II

तब विराध ने भी अपना परिचय दिया कि, मैं “जव” नामक राक्षस का बेटा हूँ. मेरी माता का नाम “शतहृदा” है. मुझे लोग विराध नाम से जानते हैं. मैंने बचपन में बड़ी तपस्या की थी, तभी ब्रह्माजी ने मुझे वरदान दिया था कि, तुम्हारा किसी अस्त्र या शस्त्र से नाश नहीं हो पाएगा. उन्होंने मुझे सदा के लिए अछेद्य और अभेद्य बना दिया. तुम दोनों यहाँ से भाग जाओ और इस स्त्री को मेरे लिए छोड़ दो, नहीं तो मैं तुम दोनों के प्राण हर लूँगा.

यह सब सुन, रामजी बड़े क्रोधित हो उठे, और बोले, हे दुर्बुद्धि तेरा अभिप्राय बहुत ही खोटा है. लगता है, तेरा अंत निकट आ गया है. यह कह, रामजी ने उसे अपने बाणों से बीधना आरम्भ कर दिया. उधर विराध ने सीता को धरती पर बैठा कर, रामजी का सामना करना आरंभ कर दिया. लेकिन चूँकि उसे ब्रह्माजी से वरदान  प्राप्त था, इसलिए उस पर रामजी के बाणों का ज़्यादा असर नहीं हो रह था. देखते ही देखते उसने दोनों भाईयों को अपने कंधों पर उठा, गर्जना करने लगा. सीताजी यह सब देख काफ़ी डर गई. 

तावारोप्य ततः स्कन्धं राघवौ रजनीचरः। विराधो विनदन्‌ घोरं जगामाभिमुखो वनम्‌॥ २५॥

आख़िर विराध वह कौन था, और उसका अन्त कैसे हुआ?

जब सीता ने राम और लखन को विराध के कन्धे पर देखा, तो डर से चिल्लाने लगी.

हियमाणौ तु काकुत्स्थौ दृष्ट्वा सीता रघूत्तमौ। उच्चैः स्वरेण चुक्रोश प्रगृह्य सुमहाभुजौ॥ १॥

सीता को रोते देख, रामजी को लगा कि, जल्दी कुछ करना होगा. उन्होंने लक्ष्मण को इशारा किया कि, इसके कंधों पर वार कर इसे नीचे गिराया जाए. फिर दोनों भाईयों ने, विराध के दोनों कंधों पर इतना कड़ा वार किया किया कि, विराध के कन्धे टूट गये और वह घायल हो नीचे गिर पड़ा. तब रामजी ने लक्ष्मण से कहा, इसको मारने का दूसरा उपाय सूचना होगा. उन्होंने लक्ष्मण से एक बड़ा खड्डा खोदने के लिए कहा. और स्वयं विराध की गर्दन पर पैर रख उसे दबोच लिया. यह सब होता देख, विराध को अपना अन्त साफ़ दिखाई पड़ने लगा. उसके अंतर्मन से रामजी के ब्रह्म स्वरूप को पहचान लिया. तब वह बड़े विनम्र भाव से बोला, हे प्रभु।  

अभिशापादहं घोरां प्रविष्टो राक्षसीं तनुम्‌। तुम्बुरुर्नाम गन्धर्वः शस्तो वैश्रवणेन हि॥ १६॥

मुझे श्रापवश इस राक्षस योनि में आना पड़ा, वरना मैं  ‘तुम्बूरू’ नाम का एक गंधर्व हूँ. एक बार, मैं रम्भा नामक एक अप्सरा पर मोहित हो गया था और उसके साथ मैंने बलात् सम्बन्ध भी बनाये, इसीलिए कुबेर जी ने मुझे राक्षस होने का श्राप दे दिया था. जब मैंने उनसे दया की याचना की, तो उन्होंने कहा, यह राक्षस का शरीर तो तुमको भोगना पड़ेगा, लेकिन इसी शरीर में तुम्हारा साक्षात्कार प्रभु राम से होगा. उनके हाथों तुम्हारा वध होगा और तभी तुम श्राप मुक्त होगे. मुझे लगता है, वह क्षण अब मेरे सामने है. मैं अपने आप को आपकी शरण में समर्पित करता हूँ. 

तव प्रसादान्मुक्तोऽहमभिशापात्‌सुदारुणात्‌॥ १९॥ भुवनं स्वं गमिष्यामि स्वस्ति वोऽस्तु परंतप।

हे प्रभु, आप मुझे इस खड्डे में गाड़ दो. यह मृत्यु मुझे स्वीकार्य है. इससे मैं श्राप मुक्त हो जाऊँगा. आप बाक़ी का समय, यहाँ बसे, ऋषियों के आश्रम में जाकर  व्यतीत कीजिए. सभी ऋषियों को अभय दान दीजिए. अब उन्हें कोई अनावश्यक परेशान नहीं करेगा. मैं आपका हृदय से आभारी हूँ कि, आपने इस दुष्ट आत्मा को मुक्ति प्रदान की.

इस प्रकार, एक बार फिर एक गंधर्व, जो मायावश भटक गया था, प्रभु कृपा से, सुमार्ग पर लौट आया. ऐसी थी राक्षस विराध की कथा. दयालु रामजी ने, उसे भी क्षमाकर, अपने धाम में स्थान दिया. ऐसे, मेरे परम  इष्ट रामजी को, मेरा कोटि कोटि प्रणाम.  “जय श्री राम”

             

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